Sunday 16 September 2007

कुनबा चार का, रहता मगर एक है

यह कोई बुझौवल नहीं है, बल्कि हकीकत है देश के नगरों-महानगरों में रहनेवाले उन कुनबों की जिनमें कम से कम दो और ज्यादा से ज्यादा चार सदस्य होते हैं। इन्हें हम न्यूक्लियर फेमिली कहते हैं, जिसमें रहते हैं मियां-बीवी और बहुत हुए तो दो बच्चे। मियां-बीवी की उम्र अमूमन 25 से 45 के बीच होती है और ज्यादातर दोनों ही काम करते हैं। ये परिवार आमतौर पर तनहा ही रहते हैं। दोनों तरफ के सास-ससुर या भाई-बंधु आते भी हैं तो पांच-दस दिन के बाद वापस चले जाते हैं।
न्यूक्लियर फेमिली के रूप में रहना इनका शौक नहीं, मजबूरी है। आर्थिक ही नहीं, मानसिक भी क्योंकि इनकी रूटीन ज़िंदगी में बाहर के किसी का दखल व्यवधान पैदा करता है जो अंतत: नए तनाव की वजह बन जाता है। इन कुनबों में रहते भले ही चार लोग हैं, लेकिन यहां एक समय में एक की ही चलती है।
अक्सर इन लोगों ने या तो प्रेम विवाह किया होता है या पांरपरिक शादी के चंद महीनों बाद ही एक-दूसरे को समर्पित हो जाते हैं, प्यार करने लगते हैं आपस में। लेकिन चार-पांच साल गुजरते ही कभी बच्चे की परवरिश, कभी रहने-खाने के तौर-तरीके, कभी करियर तो कभी साफ-सफाई जैसी मामूली बातों पर तकरार का दौर शुरू हो जाता है। फुरसत मिलते ही दोनों झगड़ना शुरू कर देते हैं। बच्चों को कुछ समझ में नहीं आता। वो चुपचाप एक अपरिचित तनाव से घिर जाते हैं। फिर एक दिन ऐसी नौबत आ जाती है कि मियां-बीवी को न तो अपनी परवाह रहती है, न ही बच्चों की और वे अलग होने का बेहद तकलीफदेह फैसला कर बैठते हैं।
ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक इस समय दिल्ली में हर साल तलाक़ के आठ-नौ हज़ार मामले दर्ज हो रहे हैं। मुंबई में तलाक़ के मामलों की सालाना संख्या करीब पांच हज़ार है। हां, बेंगालुरु और चेन्नई में हालत इतनी खराब नहीं हुई है। जानकार लोग इसकी वजह बताते हैं कि दिल्ली ज्यादातर बाहर से आकर बसे लोगों का शहर है। बगैर किसी सामाजिक दबाव के यहां के लोग जिंदगी को महज़ फायदे-नुकसान का खेल समझने लगे हैं। ज़रा-सा तनाव बढ़ते ही तलाक़ का फैसला कर लेते हैं। जबकि बेंगालुरु या चेन्नई में अधिकांश लोग अब भी पारंपरिक मूल्यों में यकीन रखते हैं। इसीलिए वहां तलाक़ कम होते हैं।
लोग कहते हैं कि पहले भी मियां-बीवी में खटपट होती थी। लेकिन वे आपस में एडजस्ट करते थे, जबकि आज ऐसा नहीं है। मेरा कहना है कि आज भी सालोंसाल तक जोड़े एक-दूसरे से एडजस्ट करते हैं। और, असली समस्या यही है। एडजस्ट करना ही रिश्तों के टूटने की बुनियादी वजह है। जब भी तकरार होती है, एक समय के बाद या तो पति झुक जाता है या पत्नी मन मसोस कर उसका तर्क मान लेती है। एडजस्टमेंट हो जाता है। विवाद तात्कालिक तौर पर निपट जाता है। लेकिन दोनों अपनी-अपनी जगह जहां थे, वहीं टिके रहते हैं।
पति उदारता बरतते हुए बार-बार खुद को पत्नी की जगह रखकर देखता है। पत्नी भी खुद को पति की जगह रखकर देखती है। आत्मवत् सर्वभूतेषु को मानकर वे दूसरे को अपने जैसा मानकर सोचते हैं। लेकिन दूसरा तो दूसरा होता है। उसके संस्कार अलग होते हैं। उसकी सोच के विकास का इतिहास अलग होता है, पैटर्न अलग होता है। बीस-बाइस-पच्चीस साल तक उसने दूसरे परिवार में अपनी ज़िंदगी जी होती है। आप लाख कोशिश कर लें, ठीक उसकी जगह अपने को रख लें, तब भी वैसा नहीं हो पाएंगे। लेकिन हम करते यही है। जब हम दूसरे की जगह खुद को रखते हैं तो पाते हैं कि उसका रिएक्शन गलत था। हम ठीक उसकी जगह होते तो ऐसा कतई नहीं करते। और, इस नतीजे पर पहुंचते के बाद पति और पत्नी का अलग-अलग कुढ़ना जारी रहता है। ऊपर मलाई जम जाती है, लेकिन अंदर उबाल चालू रहता है।
होना यह चाहिए कि हम दूसरे को अपने जैसा न समझे। उसके स्वतंत्र वजूद को स्वीकार करें। झगड़ा करें तो पूरे संजीदगी से। ‘शांति’ से तब तक झगड़ा करते रहें जब तक दूसरे के स्टैंड को साफ न समझ लें। लीपापोती करने से, एडजस्ट करने से मामला सुलझता नहीं है। हम आगे नहीं बढ़ते। रिश्तों में नवीनता नहीं आती। रिश्ते ठहर जाते हैं। और ठहरा हुआ पानी एक दिन सड़ने लगता है। उससे दुर्गंध आती है। तब उस रिश्ते को तोड़ देने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता। इसलिए मेरा कहना है झगड़ो इसलिए ताकि एक दूसरे के अंदर पैठ सको। रबर की ट्यूब पर भी पंचर लगाना होता है तो दोनों हिस्सों को पहले रेगमार से रगड़ते हैं। बिना रगड़े चिपका देंगे तो दोनों हिस्से ज़रा-सी रगड़ पर अलग हो जाएंगे।
पहले संयुक्त परिवारों में महिलाओं की उलझनें आपस में ही बात करके सुलझ जाती थीं। मुझे तो बड़ा अजीब लगता था जब गांवों में दिशा-मैदान गई औरतें खेत में एक साथ चार-पांच के समूह में गोला बनाकर बैठती थीं और हर तरह की बातें करती थीं। मेरे गांव में सीआईडी ने एक गुमशुदगी का मामला इसी तरह की औरतों की बात से सुलझाया था जब एक औरत दूसरे से कह रही थी कि फलाने की लाश कहां से मिलेगी, उसे तो हमने आंगन में ही दीवार के पास गाड़ दिया है।
आज न्यूक्लियर परिवारों के पास संयुक्त परिवारों जैसा कुशन नहीं है। मियां-बीवी को खुद ही एक दूसरे का पूरक बनना है। ऐसा वो एडजस्ट करके नहीं, लड़-झगड़कर ही कर सकते हैं। लड़ो, खूब लड़ो। मगर प्यार से, घनघोर लड़ाई के पल भी सामनेवाले को अपना समझते हुए। लड़ो इसलिए ताकि एक दूसरे के अंतर को अच्छी तरह समझ सको। फिर उसके हिसाब से खुद को बदलो। रिश्तों का रिन्यूवल उसके दीर्घजीवी होने की बुनियादी और आवश्यक शर्त है।

2 comments:

संजय तिवारी said...

हम तो परमाणु परिवार से भी आगे अणु के रूप में रहते हैं. लड़ें किससे?

अनिल रघुराज said...

संजय जी, आपका दर्द समझता हूं। आप ही लिखिए न कि छड़ों के एकाकीपन की पीड़ा क्या होती है। मैं तो कोशिश करूंगा ही...