Sunday 9 September 2007

तीन नमूने प्यार के पहले इज़हार के

परसों की बात है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का एक नया ग्रेजुएट टकरा गया। बात चली तो अंग्रेजी विभाग के प्राध्यापक शर्मा जी का जिक्र आया। इलाहाबादी ग्रेजुएट ने बातों ही बातों में पूछा – आप जानते हैं कि आपके हॉस्टल के सीनियर शर्मा जी की शादी कैसे हुई थी। मैंने कहा – नहीं पता। वह बोला – लो आप तो कोई खबर ही नहीं रखते। फिर उसने जो किस्सा बताया, वह मैं बता रहा हूं।
शर्मा जी के बारे में कहा जा सकता है कि वह नौकरशाही खानदान के हैं। उनके बड़े भाई बीएसएफ के रिटायर्ड डीजी हैं। बदकिस्मती कहिए या संयोग, हमारे शर्मा जी कई प्रयासों के बावजूद आईएएस नहीं बन पाए। यह वाकया तब का है जब शर्मा जी अंग्रेजी से एमए कर रहे थे। विभाग में एक नई लेक्चरर आई तो शर्मा जी और उनका रूम पार्टनर, दोनों ही उसे दिल दे बैठे। दोनों उसके पास सीधे प्रपोज करने जा पहुंचे। उसने कहा – देखो, तुममें से जो क्लास में टॉप कर जाएगा, उसका प्रपोजल मैं स्वीकार कर लूंगी। दोनों बंधुओं ने जमकर मेहनत की। लेकिन पहले साल टॉप नहीं कर पाए। हां, दूसरे और तीसरे नंबर पर ज़रूर रहे।
लेक्चरर महोदया ने कहा - ठीक है फाइनल इयर का मौका और है तुम लोगों के पास। दोनों और उत्साह से पढ़ने लगे। लेकिन शर्मा जी के लिए अपने रूम पार्टनर और दोस्त को काटना ज़रूरी था। सो, वे किसी न किसी तरीके से कोशिश करते कि वह पढ़ ही न पाए। शायद ऐसी ही कोशिशों का नतीजा था कि शर्मा जी फाइनल में टॉप कर गए। फिर क्या था। लेक्चरर महोदया ने अपने वादे पर अमल किया और शर्मा जी से शादी रचा ली। मजे की बात है कि कुछ साल बाद उनका रूम पार्टनर भी अंग्रेजी विभाग में लेक्चरर हो गया। अभी तीनों ही विभाग में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के साथ विद्यार्थियों को अंग्रेजी का ज्ञान-लाभ करा रहे हैं। वाकई, प्यार के पहले इज़हार का ये तरीका मुझे काफी रोचक लगा।
अब दूसरा तरीका सुनिए। मेरे एक मित्र थे और अब भी हैं। बेचारे बड़े लजाधुर हैं। ऑफिस में नई-नई लड़की काम करने आई तो उस पर लट्टू हो गए। कैसे प्रपोज करें, समझ में नहीं आया तो उन्होंने ऑफिस की ही ई-मेल आईडी से उसको एक मेल लिख मारा। मेल का मजमून कुछ यूं था – कभी-कभी कुछ कहने के लिए कुछ भी कहने की ज़रूरत नहीं होती। फिर भी अगर कोई न समझ सके तो कुछ कहने का क्या फायदा। उन्हें लगा कि बात हो सकता है सामनेवाली की समझ में न आए। सो उन्होंने इसके आगे जोड़ दिया – इन दिनों मैं आपको अक्सर मिस करने लगा हूं। मेल लड़की को मिला। उसने फौरन उसे सीनियर्स तक पहुंचा दिया। हुजूर को अच्छी-खासी डांट पड़ी। खैर, इस बात को अब तीन साल बीत चुके हैं और सुनते हैं कि उसी लड़की के साथ जल्दी ही उनकी शादी होनेवाली है।
तीसरा किस्सा हमारे प्रिय और दिवंगत कवि गोरख पांडे का है। बताते हैं कि वह किसी पंजाबी लड़की के एकतरफा प्रेम में पड़ गए। जेएनयू में तब लड़के-लड़कियों के हॉस्टल एक ही हुआ करते थे। वह लड़की देर रात तक लाइब्रेरी में पढ़ती रहती। गोरख बाबा बाहर टहलते रहते। खिड़की की रोशनी से लड़की की छाया देखते रहते। लोगों से कहते कि उसे पता है कि मैं बाहर टहल रहा हूं, तभी तो इतनी देर तक लाइब्रेरी में पढ़ती रहती है।
वह घंटों-घंटों तक अपने कमरे पर उसका इंतज़ार करते और लोगों से कहते – देखना, वह खुद मेरे पास आएगी। शाम को लोग पूछते – गोरख जी, आई थी वो। गोरख जी कहते – हां आई थी, लेकिन जब वो आई तो मैं ही बाहर सिंगरेट लेने चला गया था। क्या करती। इंतज़ार किया और चली गई। गोरख जी आखिर-आखिर तक उस पंजाबी बाला को प्रपोज नहीं कर पाए और दुनिया से कूच कर गए। असल में उन्हें लगता था कि उनके जैसे कवि और सुंदर-सुकुमार व्यक्ति के लिए किसी लड़की को प्रपोज करने की जरूरत ही नहीं है। उनका तो व्यक्तित्व ही संभ्रांत और खूबसूरत लड़कियों के लिए अपने-आप में एक प्रपोजल है।

2 comments:

Pratik said...

बढ़िया क़िस्से हैं :)

Srijan Shilpi said...

बढ़िया प्रसंग।

जेएनयू के कुछ छात्रावास अब भी को-हॉस्टल हैं। संयोग से, मुझे भी जेएनयू में वही हॉस्टल मिला, जिसमें कभी गोरख पांडेय जी रहा करते थे। हम अक्सर अपने दोस्तों के साथ गोरख जी वाले कमरे में बैठ कर उनके विफल प्रेम के अफसाने का जिक्र किया करते थे।