Monday 3 September 2007

एक दिन भरभरा कर गिर पड़ा राष्ट्रवाद

अमेरिका में कैलिफोर्निया प्रांत के माउंटेन व्यू शहर में घर पर डिनर किया, टोक्यो में ब्रेकफास्ट, सिंगापुर में लंच, फिर डिनर के वक्त बेंगालुरू जा पहुंचा। मौसी के घर जाकर सबसे मिला। अगले दिन वापस अमेरिकी प्रवास के लिए रवाना। फिर वीकेंड में पहुंच गया कनाडा के ओंटारियो प्रांत के यॉर्क मिल्स शहर में अपने भारतीय दोस्त से मिलने। भारत में जन्मा, अमेरिका में नौकरी। दोस्त सारी दुनिया में बिखरे हुए। काम के सिलसिले में सिंगापुर से लेकर थाईलैंड, चीन और जापान में बराबर आना-जाना। फ्रांस और जर्मनी का भी दौरा लगता रहता है। हर देश के रीति-रिवाज अलग, बोली अलग, संस्कृति अलग। फिर भी वह भारतीय है। भारतीय राष्ट्रवाद उसकी रगों में दौड़ता है।
लेकिन कभी-कभी वह सोचता है कि भारतीय राष्ट्रवाद का रंग हिंदुत्व के केसरिया रंग की तरफ क्यों झुका हुआ है। ये झुकाव बौद्ध और जैन धर्म की तरफ क्यों नहीं है? भारतीय राष्ट्रवाद बौद्ध धर्म की शरण में भी तो जा सकता था। अगर भारत के ब्रिटिश विरोधी संघर्ष ने धर्म के संदर्भों में बौद्ध धर्म की दिशा पकड़ी होती तो शायद भारत आज दुनिया के सबसे विकसित देशों में शुमार होता। हम अब तक सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में बाह्मणवाद का खात्मा कर चुके होते।
फिर सोचता है, ग्लोबलाजेशन के इस दौर में किसी तरह के राष्ट्रवाद का कोई मतलब भी रह गया है क्या? हां, अपने रीति-रिवाज, खाने-पीने रहने की संस्कृति, दीवाली, होली, दशहरा और रक्षा बंधन के त्योहारों को वह चाहकर भी नहीं भुला सकता। शादी तो उसने अमेरिका में ही की अपनी मर्जी से, लेकिन बेंगालुरू में मौसी के यहां आया तो मंडप में दोबारा पूरी भारतीय पद्धति से सात फेरे लिए।
क्या वाकई आज की दुनिया उसके लिए वसुधैव कुटुंबकम् जैसी नहीं हो गई है? कहते भी हैं कि अब दुनिया गोल नहीं, फ्लैट हो गई है। इस तरह की ऊहापोह उसके मन में निरंतर चलती रहती है। इसी तरह एक शाम वह अकेला बैठा सोच रहा था कि अचानक उसका राष्ट्रवाद उसके भीतर से ऐसे भरभराकर गिर पड़ा, जैसे शरीर में लगा गीली मिट्टी का लेप सूखने पर, ज़रा-सा हिलो तो तड़क-तड़क कर गिर जाता है। उसे लगा कि वह रहा होगा कभी भारतीय, अब तो वह एक ग्लोबल सिटिजन है, सारी दुनिया जिसकी कर्मभूमि है, जिसका एक छोटा-सा हिस्सा भारत भी है।

7 comments:

संजय तिवारी said...

अच्छा हुआ जान छूटी.

अनुनाद सिंह said...

बहुत अच्चा लेख लिखा है। इसमे 'राष्ट्रवाद' के स्थान पर 'कम्युनिज्म' भर दिया जाय तो इससे भी अधिक सार्थक लगेगा।

एक देश से दूसरे देश में आसानी से आना जाना और नौकरी कर लेना ही यदि 'भूमण्डलीकरण' है तो यह पहले और भी आसान हुआ करता था। Bरिटेन के आधीन दुनिया ज्यादा भूमण्दलीकृत थी। और यदि बौद्ध धर्म की तर्फ झुकाव करने से विकास आ सकता तो श्रीलंका और भूटान को सबसे विकसित देश होना चाहिये था। और केवल समानता और असमानता ही विकास की कसौटी होती तो अमेरिका (काला-गोरा) सबसे निर्धन होता और सोवियत संघ (साम्यवाद) सबसे धनी.

Pratik said...

राष्ट्रवाद गिरा, अच्छा हुआ। लेकिन आपका धर्म वाला तर्क ज़रा गले नहीं उतरा। जिस तरह आप राष्ट्रवाद को गिराना चाहते हैं, उसी तरह 'मज़हबों' को भी गिरा दीजिए और केवल 'धर्म' रहने दीजिए, न कि हिन्दू धर्म या बौद्ध धर्म आदि। आपको क्या लगता है कि बौद्ध देश जातिप्रथा से मुक्त हैं? या दुनिया का कोई भी देश इस बुराई से अछूता है? हाँ, इतना ज़रूर है कि जातिप्रथा के रूप अलग-अलग हैं हर जगह।

अनिल रघुराज said...

अनुनाद जी, आप मेरा मन्तव्य ठीक से नहीं समझे। मैंने तो बस एक प्रक्रिया का जिक्र किया था जो ग्लोबल होती दुनिया का हिस्सा बन रहे भारतीय नौजवानों के मानस में चल रही है। रही बौद्ध धर्म की बात, तो श्रीलंका को ही क्यों देखते हैं, जापान को भी देखिए। हिंदू धर्म में निहित ब्राह्मणवाद उद्यमशीलता में बाधक है, यह बात बहुत से समाजशास्त्री कह चुके हैं। वैसे, मैंने कोई निष्कर्ष नहीं दिए हैं। बस्स एक तरह की मन:स्थिति का खाका खींचने की कोशिश की है।

अनुराग द्वारी said...

सर, निहितार्थ न समझ पाऊं तो माफी, पर शायद बुद्घ ने हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों की सबसे ज्यादा मुखालफत की थी जिसमें से एक मूर्ति पूजा भी थी ... लेकिन हकीकत ये है कि आज दुनियां में सबसे ज्यादा मूर्तियों भगवान बुद्ध की ही हैं ... खैर आपके विषय पर लौटते हुए वाकई ये दुनियां एक ग्लोबल विलेज में तब्दील हो चुकी है लेकिन सिर्फ उनके लिए जो ग्लोबल हैं या यूं कहें कि जिनकी जेब ग्लोबल होने के लिए पर्याप्त है ... बाकियों के लिए धरती गोल हो या चपटी, क्या फर्क पड़ता है।

Udan Tashtari said...

एक छोटा-सा हिस्सा भारत भी है।---शायद यह भारतीय के लिये सही नहीं है. चाहे लाख कर्म भूमि विश्व हो जाये मगर आधार में,नींव में, दिल के भीतर एक बहुत बड़ा हिस्सा भारत ही होता है.

भविष्य में भारत वापस जाने की, समय समय पर भारत जाते रहने की, हर बात को भारत से कम्पेयर करने की मानसिकता तो हमेशा साथ होती है, एकदम भीतर धंसी. बाकि सब तो उथला सा लगता है इनके सामने.

शायद ये मेरी सोच हो.

राजेश कुमार said...

अमेरिका की आलोचना करते हीं कुछ लोग रोने लगते हैं और उसके जवाब में सीधे कम्युनिज्म को गाली देते हैं। भारत कभी भी कम्युनिज्म की थ्योरी पर नहीं चला। लेकिन कम्युनिस्ट देश रुस ने हमेशा भारत का साथ दिया। चाहे विकास का मामला हो या युद्ध का। 1971 के युद्ध में रुस ने तो, सातवां बेड़े भेजने को लेकर अमेरिका को भी चुनौती दे दी थी। दोस्ती,विश्वास और एक दूसरे के मदद के लिये तैयार रहना अपने आप में बड़ी बात है। बहरहाल यहां हर कोई या तो x जात है या y जात का लेकिन कोई भी अपने आपको भारतीय नहीं कहता लेकिन गर्व से डींगे हांकेगा कि उसके पास अमेरिका का ग्रीन कार्ड है। जहां तक धर्म का सवाल है तो हर धर्म में बहुत कुछ सकारात्मक है तो कुछ ऐसी बातें है जिसे हर कोई सहज रुप से स्वीकार नहीं करता है। बहरहाल अमेरिका ने कुछ लोगों को भांग की ऐसी घूटी पीला दी कि वो कम्युनिज्म को गाली देकर खुश हो जाते है चाहे वे खाली पेट हीं क्यों न हो।