Monday 20 August 2007

चर्चवाले ऐसा क्यों कर रहे हैं?

जब देश भर में मठ, मंदिर, मस्जिद और चर्च हजारों-हज़ार करोड़ का टैक्स बचाने का ज़रिया बने हुए हों, तब ये खबर वाकई चौंकानेवाली है कि भारत का रोमन कैथोलिक चर्च कंपनियों के लिए कर बचाने के डबल टैक्सेशन एवॉयडेंस एग्रीमेंट्स (डीटीएए) रास्ते को बंद करने का देशव्यापी आंदोलन छेड़ने जा रहा है। अभी भारत सरकार ने दुनिया के साठ से ज्यादा देशों के साथ ऐसे समझौते कर रखे हैं। विदेशी कंपनियां इन समझौतों का जमकर फायदा उठाती हैं। इस मामले में सबसे बदनाम देश रहा है मॉरीशस, जहां अपना पंजीकरण दिखाकर तमाम एफआईआई (विदेशी संस्थागत निवेशक) करोड़ों-अरबों की कमाई करने के बावजूद एक धेले का भी टैक्स नहीं देते, न तो भारत में और न ही मॉरीशस में। इसके खिलाफ अदालत का भी दरवाजा खटखटाया जा चुका है।
अब रोमन कैथोलिक चर्च कह रहा है कि कंपनियां इस तरह टैक्स बचाकर अनैतिक काम कर रही हैं, जिन आम लोगों के बल पर वो मुनाफा कमाती हैं, उस मुनाफे पर टैक्स न देकर वो उसी अवाम को उन सुविधाओं से महरूम रख रही है, जो उन्हें टैक्स के पैसे के इस्तेमाल से मिल सकती थीं। इससे पहले एनजीओ को भी चंदा देनेवाली कंपनियों की नीयत पर सवाल उठ चुके हैं। तर्क दिया जाता है कि कंपनियां सामाजिक काम के नाम पर एनजीओ को चंदा देती हैं, लेकिन इस तरीके से वो करोड़ों का टैक्स बचा लेती हैं, जो कायदे से सार्वजनिक कामों पर खर्च किया जाता।
असल में आयकर कानून की धारा 80-जी के तहत पंजीकृत धार्मिक ट्रस्ट, कल्याणकारी संस्थाओं और एनजीओ के नाम पर कंपनियां ही नहीं, आम लोग भी टैक्स चोरी करते हैं। इस बार टैक्स-रिटर्न भरते समय एक बुजुर्ग सीए ने मुझे नुस्खा बताया कि कैसे मैं इन संस्थाओं को चेक से चंदा देकर भारी टैक्स बचा सकता हूं। अगर मैंने किसी चैरिटेबल संस्था के नाम 50,000 रुपए का चेक दिया तो सीए अपना और संस्था का 4-4 % कमीशन काटकर मुझे 46,000 रुपए नकद वापस कर देगा। मुझे इसकी पक्की रसीद दे देगा, जिस पर मैं अपने इनकम-स्लैब के आधार पर टैक्स बचा सकता हूं।
कंपनियां और बड़े व्यापारी मंदिर और धर्मशालाओं के नाम पर कैसे टैक्स बचाते हैं, इसका नमूना आप हरिद्वार या ऋषिकेश जैसे धार्मिक शहरों में जाकर देख सकते हैं। अभी बड़ा मज़ेदार वाकया महाराष्ट्र में सामने आया। राज्य सरकार ने तय किया है कि वो मंदिरों की हज़ारों एकड़ ज़मीन वापस लेकर उसका व्यावसायिक इस्तेमाल करेगी। लेकिन पेंच ये फंसा कि मंदिरों की ज़मीन उनके इष्ट देवता के नाम पर है और इस देवता का ‘पावर ऑफर एटॉर्नी’ कौन है, इसका फैसला कर पाने में घनघोर कानूनी पचड़ा है।
वैसे, टैक्स-चोरी के खिलाफ रोमन कैथोलिक चर्च की पहल वाली खबर में और आगे बढ़ने पर कुछ नए तार जुड़े हुए नज़र आते हैं। पता चला कि ये पहल रोम कैथोलिक चर्च के केंद्र वेटिकन से शुरू हुई है और इसका ऐलान पोप बेनेडिक्ट- XVI करनेवाले हैं। कहा जा रहा है कि पोप बेनेडिक्ट स्विस बैंकों में पैसा रखनेवाले दुनिया भर के नेताओं के खिलाफ भी आवाज़ उठानेवाले हैं। लेकिन कुछ लोग पोप की इस पहल को अमेरिका के राष्ट्रपति चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं। इस समय अमेरिका में टैक्स-चोरी और टैक्स की जन्नत माने जानेवाले देशों के खिलाफ जबरदस्त बहस चल रही है। एक अनुमान के मुताबिक टैक्स की जन्नत बने देशों में अमेरिकियों ने 1500 अरब डॉलर की संपत्ति छिपा रखी है। चलिए अच्छी पहल कहीं से भी हो, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। हो सकता है कि इसी बहाने कंपनियों और नेताओं की काली कमाई पर थोड़ा अंकुश लग जाए।

1 comment:

संजय बेंगाणी said...

नैतिकता व ईश्वर का ठेका लिए घुमती घार्मिक संस्थाएं ही अनैतिक कामो में शामिल होती है.

कानुनी दाँव पैचो से पैसा बचाना भी व्यापार का हिस्सा है.