Thursday 9 August 2007

संभव है बिना पंखों की उड़ान

क्या आप सपने में कभी उड़े हैं बिलकुल क्रिश फिल्म के हीरो की तरह? बचपन में तो उड़े ही होंगे! मैं तो अब भी कभी-कभी सपने में उड़ लेता हूं। पैरों पर ज़रा-सा ज़ोर डालता हूं तो एक झटके में कई पहाड़ और घाटियां पार कर लेता हूं। गिरने को होता हूं तो फिर हल्का-सा ज़ोर लगाता हूं और फिर उड़ान थोड़ा नीचे आकर ऊपर उठ जाती है। अभी बीस-पच्चीस दिन पहले ही मैंने ऐसा सपना देखा था और उत्तरांचल के किसी कस्बे के बाज़ार में जा पहुंचा था। शाम हो चुकी थी। दुकानदार अपनी दुकानें बंद कर रहे थे और लोगबाग दूर पहाड़ियों पर बने अपने घरों को लौट रहे थे। माहौल कोहरे से भरा था, अजीब सा सुकून था, ठंडक थी। मैं उड़कर एक ही फर्लांग में इन सभी से काफी आगे निकल गया।
इतना तो नहीं, पर थोड़ा-थोड़ा उड़ना या कह लीजिए जमीन से थोड़ा ऊपर हवा में तैरना अब संभव हो सकता है। और इसे संभव बनाएगा कैसिमिर प्रभाव या कैसिमिर-पोडलर बल। इस प्रभाव की खोज 1948 में ही नीदरलैंड के दो भौतिकशास्त्रियों हेंड्रिक बी जी कैसिमिर और डिर्क पोडलर ने की थी। उन्हीं के नाम पर इसे कैसिमिर प्रभाव या कैसिमिर-पोडलर बल कहा जाता है। यह चीजों के बीच में मौजूद सर्वव्यापी ऊर्जा के अनुनाद से उपजा सूक्ष्म बल होता है। यह बल चीजों में बढ़ते फासले के साथ तेज़ी से घटता जाता है। इसलिए इसे तभी नापना संभव होता है जब चीजें बेहद पास-पास होती हैं। जब दो वस्तुओं के बीच की दूरी परमाणु के 100वें हिस्से के बराबर हो जाती है, तब कैसिमिर प्रभाव एक वायुमंडलीय दबाव के बराबर बल पैदा करता है। इस बल को पहली बार 1997 में नापने में कामयाबी मिली।
शुरुआती सालों में इस खोज को ज्यादा अहमियत नहीं दी गई क्योंकि उसका व्यावहारिक इस्तेमाल दूर की कौड़ी लगता था। लेकिन नानो-टेक्नोलॉजी के आने के बाद वैज्ञानिकों का ध्यान इस पर गया और वे जुट गए इसे तकनीक में बदलने पर। अब उन्होंने बेहद छोटी वस्तुओं को हवा में तैराने का ऐसा तरीका ईजाद कर लिया है जो माइक्रो-मशीनों की डिज़ाइन में क्रांति ला सकता है। ब्रिटेन की सैंट एंड्रयूज़ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर उल्फ लियोनहार्ट और डॉ. थॉमस का कहना है कि इससे कार एयरबैग से लेकर कंप्यूटर चिप जैसी रोजमर्रा की चीजों में जबरदस्त सुधार किए जा सकते हैं।
इन वैज्ञानिकों का दावा है कि वे कैसिमिर बल के इस्तेमाल से निर्वात में दो वस्तुओं के बीच आकर्षण के बजाय विकर्षण का प्रभाव पैदा कर सकते हैं क्योंकि नानो कणों, खासकर कुछ माइक्रो-इलेक्ट्रोमेकेनिकल सिस्टम्स में घर्षण का अंतिम कारण कैसिमिर बल ही होता है। इस बल को नियंत्रित कर लिया जाए तो माइक्रो या नानो मशीनें नगण्य घर्षण के बीच काम कर सकती हैं। मामला काफी जटिल है। लेकिन इन वैज्ञानिकों के मुताबिक नानो कणों की दुनिया में चिपके रहने के प्राकृतिक गुण को दूरी बनाने के काम में लाया जा सकता है और फिर चीजें आपस में सटी रहने के बजाय थोड़ा फासला बनाकर रहने लगेंगी।
भौतिकशास्त्री डॉ. लियोनहार्ट के मुताबिक कैसिमिर प्रभाव का इस्तेमाल अभी माइक्रो यानी बेहद छोटी वस्तुओं पर ही हो सकता है। लेकिन अब भी सैद्धांतिक तौर पर माना जा सकता है कि इसकी मदद से इंसानों को भी हवा में तैराना संभव है। हां, इसमें काफी लंबा वक्त लगेगा। कितना? इसके बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन चलिए हम परीकथाओं, फिल्मों और सपनों के थोड़ा करीब तो पहुंच ही गए।

4 comments:

Pratyaksha said...

काश ऐसा जल्दी हो जाय ।

हरिराम said...

हिन्दी में इस प्रकार वैज्ञानिक लेखन की नितान्त आवश्यकता है। यह दूसरे ब्लॉगरों को भी प्रेरित करेगा।

वैसे नानो टेक्नोलॉजी से भी कई गुणा सूक्ष्म प्रौद्योगिकी सैकड़ों वर्ष पहले प्रचलित थी, जिससे सूक्ष्म शरीर से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड चक्कर लगाया जा सकता था।

हरिमोहन सिंह said...

बहुत अच्‍छी जानकारी दी है बचपन में तो सपने में उडता था लेकिन अब मैं तो हमेशा यही सपना देखते हुये सोता हूँ कि मैं उड रहा हूँ

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा जानकारी. काश, मैं कल्पनाओं के अलावा भी सचमुच उड़ पाता. आपने उम्मीद जगा दी, आभार.