Wednesday 29 August 2007

त्रि-शूल पर अटक गई है संधि

खेमे बन चुके हैं। भारत-अमेरिका के बीच हुई परमाणु संधि पर पूरे देश का मुखर समाज तीन हिस्सों में बंट चुका है। सभी ने अपनी रूढ़ धारणाएं बना ली हैं। ऐसे में लगता है कि इस पर लिखने का कुछ फायदा है भी कि नहीं। वैसे भी जो मसले राष्ट्रवाद से जुड़ जाते हैं, उन पर सभी भावना में ही बहते हैं, तर्क कोई नहीं सुनता। फिर भी लिखने का मन हुआ और वादा भी कर रखा था तो सोचा कि लिख ही डालूं भले ही एक दिन देरी से।
तो शुरुआत इस मुद्दे पर बंटे तीन खेमों से। कुछ दिनों पहले तक इन खेमों ने म्यान से तलवारें बाहर निकाल ली थीं। लेकिन अब सभी की तलवारें म्यान के भीतर जा चुकी हैं। मनमोहन सरकार के गिरने का फिलहाल कोई खतरा नहीं है। लेफ्ट बातचीत करने के मूड में है और बीजेपी भी अमेरिका के खिलाफ कोई बखेड़ा नहीं खड़ा करना चाहती।
पहला खेमा है सरकार और उसकी तरफदारी कर रहे नेताओं और बुद्धिजीवियों का। इनका कहना है कि भारत-अमेरिका परमाणु संधि या 123 समझौते का मुख्य पहलू है भारत की परमाणु ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करना। अभी हम 2700 मेगावाट बिजली अपने परमाणु संयंत्रों से पैदा कर रहे हैं जो हमारे कुल बिजली उत्पादन का तीन फीसदी से भी कम हिस्सा है। साल 2020 तक देश मे बिजली की मांग लगभग दोगुनी हो जाएगी, तब हमें कम से कम 20,000 मेगावाट बिजली परमाणु साधनों से बनानी होगी। लेकिन हमारे पास इसके लिए ज़रूरी कच्चा माल यूरेनियम-235 नहीं है। इसे हम बाहर से ही आयात कर सकते हैं। 123 समझौता इसका पहला कदम है। इसी के बाद दुनिया के 45 देशों का न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) हमें यूरेनियम आयात की मंजूरी दे सकता है।
दूसरे खेमे का कहना है कि सरकारी अनुमान के मुताबिक 2020 में देश में बिजली की कुल मांग 2,30,000 मेगावाट की होगी। अगर हम परमाणु साधनों से 20,000 मेगावाट बिजली भी बना लेते हैं तो यह कुल मांग का 10 फीसदी हिस्सा भी नहीं होगी। इसलिए असली बात ये नहीं है। बल्कि, 123 समझौते के जरिए अमेरिका ने भारत की विदेश नीति की चाभी अपने हाथ में रख ली है। 123 समझौता अमेरिका के परमाणु ऊर्जा कानून, 1956 के तहत लाई गई एक धारा है और अमेरिकी संसद कभी भी इसके जरिए भारत पर अपनी शर्तें आरोपित कर सकती है। यहां तक इससे जुड़े हाइड एक्ट में प्रावधान है कि भारत जब भी कोई परमाणु परीक्षण करेगा, यह संधि अपने आप खत्म हो जाएगी। ये सीधे-सीधे भारत की संप्रभुता और स्वतंत्रता पर परोक्ष हमला है। इस खेमे में सीपीएम, सीपीआई और दूसरी लेफ्ट पार्टियां शामिल हैं।
तीसरा खेमा कहता है कि आज हमारा राष्ट्रीय हित अमेरिका के साथ सामरिक साझेदारी में है। जिस तरह से एशिया में चीन पाकिस्तान की मदद कर रहा है, उसे देखते हुए हमारी सुरक्षा के तार सीधे-सीधे अमेरिका से जुड़ गए हैं। इसलिए हमें अमेरिका का साथ देना चाहिए, चाहे वह चाहे वह परमाणु संधि का मसला हो या 4 सितंबर से शुरू हो रहे भारत-अमेरिका संयुक्त नौसैनिक अभ्यास का। इस खेमे में बीजेपी शामिल है। खुद बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी दो दिन पहले ऐसा बयान दे चुके हैं। और अब तो आरएसएस भी उनकी हां में हां मिला चुका है। जारी...

2 comments:

हरिराम said...

इस संधि के तहत अमेरिका को अधिकार मिल गया है कि वह भारत के हरेक परमाणु संयंत्र का जब चाहे निरीक्षण कर सकता है, साथ ही नियंत्रण भी। क्या भारत को भी यह अधिकार मिला है कि वह अमेरिका के भी परमाणु संयंत्रों का निरीक्षण कर सके???? यदि नहीं तो क्यों????

अभय तिवारी said...

अगली किस्त भेजिये..