Friday 31 August 2007

पीछे पड़े लेफ्ट को क्यों झिड़कता है मध्यवर्ग?

मध्यवर्ग के आखिर कौन-से ऐसे सरोकार हैं, जिनको लेकर हमारे देश की लेफ्ट पार्टियां चिंतित नहीं होतीं! जब-जब पेट्रोल, डीजल या रसोई गैस के दाम बढ़े हैं, उन्हें वापस लेने के लिए सबसे ज्यादा आंदोलन लेफ्ट ने ही किया है। सब्जियों के दाम बढ़ते हैं या किसी भी तरह की महंगाई आती है, लेफ्ट पार्टियां मोर्चा निकालती हैं। पढ़े-लिखे नौजवानों को नौकरी नहीं मिलती तो लेफ्ट उनकी आवाज़ उठाने में सबसे आगे रहता है। यहां तक कि तमाम विरोध के बावजूद उसने बीपीओ और कॉल सेंटर कर्मचारियों के अधिकारों के लिए यूनियन बनाने की पहल कर डाली।
लेकिन मध्यवर्ग का बहुमत लेफ्ट को अपना नहीं मानता। मध्यवर्ग को भ्रष्टाचार से हमेशा शिकायत रहती है। जहां दूसरी पार्टियों के नेता या तो खुद भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं या भ्रष्टाचार में लगे अफसरों को बचाते हैं, वहीं लेफ्ट पार्टियां वार्ड से लेकर प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ रैलियां निकालती हैं। लेफ्ट का एक भी नेता नहीं है, जिस पर भ्रष्टाचार के बड़े आरोप लगे हों। लेफ्ट के लिए महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोज़गारी लड़ाई के शाश्वत मुद्दे हैं। इन तीनों ही मुद्दों का वास्ता आम मध्यवर्ग से है। फिर भी मध्यवर्ग लेफ्ट पार्टियों को गले लगाने को तैयार नहीं।
हां, लेफ्ट से इधर नंदीग्राम और सिंगूर में कुछ गुस्ताखियां ज़रूर हुई हैं। लेकिन उसकी ये गुस्ताखियां तो किसानों के खिलाफ थीं, मध्यवर्ग के खिलाफ नहीं। बैंकों की हड़ताल, बंद या चक्का जाम से जरूर शहर के आम लोगों को परेशानी होती है, लेकिन एकाध दिन की परेशानी का मकसद नौकरीपेशा मध्यवर्ग की बेहतरी ही होता है। हमारे मध्यवर्ग को यह बात समझ में क्यों नहीं आती?
लेफ्ट के ज्यादातर नेता गांधीजी के सादा जीवन, उच्च विचार के आदर्श पर अमल करते हैं। उनके चिंतन और कर्म में आमतौर पर दोगलापन नहीं होता, पाखंड नहीं होता। जैसा सोचते हैं, वैसा बोलते हैं, भले ही इससे उन पर कोई गलत तोहमत लग जाए। गरीब-नवाज़ होते हैं। किसी गरीब को हिकारत की निगाह से नहीं देखते। जात-पांत, छुआछूत कुछ नहीं मानते। खुद नास्तिक होते हैं, लेकिन दूसरे के धार्मिक विश्वासों की कद्र करते हैं। फिर भी मध्यवर्ग के ज्यादातर लोग उन्हें अछूत जैसा मानते हैं।
आप कहेंगे कि इसकी खास वजह है कि इन्होंने जब भी नाज़ुक मौके आये हैं, अपने देश के बजाय गैर-मुल्कों की तरफदारी की है। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान इन्होंने अंग्रेज़ों का साथ दिया। 1962 में चीन का हमला हुआ तो इनके एक हिस्से ने कहा कि चीन ने नहीं, भारत ने हमला किया है। अभी भारत-अमेरिका परमाणु संधि का मसला आया तो इन्होंने चीन के इशारों पर काम किया। लेकिन इन तीनों ही मामलों में उन्होंने अपनी समझ से सच और मानवता का साथ देने की कोशिश की। उनकी समझ गलत हो सकती है, नीयत नहीं। फिर भी मध्यवर्ग को लेफ्ट की नीयत पर संदेह है। मेरे गांव के एक चाचा हमेशा कम्युनिस्टों को गाली देते हुए कहा करते थे कि रूस या चीन में पानी बरसता है तो ये स्साले भारत में छाता लगा लेते हैं।
लेफ्ट से मध्यवर्ग की ये बेरुखी क्यों? इस सवाल के बहुत सारे जवाब आपके पास हो सकते हैं। लेकिन मेरे पास इसका केवल एक जवाब है और वो यह कि लेफ्ट सपने नहीं दिखाता। वह गति को नहीं देखता, केवल स्थिरता को देखता है। वह केवल आज को देखता है, आज की समस्याओं को देखता है, कल को नहीं देखता, भविष्य के गर्भ में छिपी संभावनाओं को नहीं देखता। नब्बे के दशक में उसने बैंकों में कंप्यूटरीकरण का जबरदस्त विरोध किया। उसने ये तो देखा कि इससे कितनों की नौकरी जा सकती है, लेकिन ये नहीं देखा कि बैंकों में इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के आने से कितनी नई नौकरियां पैदा होंगी और आम खाताधारकों को कितनी सहूलियत हो जाएगी।
भारतीय मध्यवर्ग कितना भी उपभोक्तावादी हो जाए, वह त्याग और बलिदान की कद्र करना जानता है, क्रांति उसके लिए एक पवित्र शब्द है। हां, उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी ये है कि वो आज से ज्यादा कल के सपनों में जीता है। लेफ्ट को ये बात गांठ बांध लेनी चाहिए।

आम हूं, इसीलिए इतना खास हूं

आम आदमी हूं। अपने ही नहीं, औरों के भी भगवान से डरता हूं। क्या पता कब किसी मंदिर के इष्टदेव बुरा मान जाएं, मज़ार में बैठा पीर-औलिया किसी बात पर खफा हो जाए, किसी पेड़ में बसा देव नाराज़ हो जाए। इसीलिए हर किसी को आंख बंद करके प्रणाम करता हूं। अपना क्या जाता है! हां, किसी से कुछ कहने में, मांगने में ज़रा-सा भी नहीं डरता। बाबूजी कहा करते थे – अरे कोई भीख नहीं देगा तो तुमड़ी तो नहीं फोड़ देगा। इसलिए बेहिचक अपनी बात कह दिया करो। तो उनकी ये बात हमने आज तक गांठ बांध रखी है।
भूतों से डरता हूं। इतना बड़ा हो जाने के बाद भी अंधेरे में अकेले जाने से घबराता हूं। सपने में भी भूत-पिशाच, डाइन-चुड़ैल दिख जाए तो हनुमान चालीसा या गायत्री मंत्री का जाप करने लगता हूं। आज में जीता हूं, आनेवाले कल से डरता हूं, बीते हुए कल को याद करता हूं। वैसे तो सभी पर यकीन करता हूं, लेकिन कहीं कोई ऊंच-नीच न हो जाए, कोई ठग न ले, इस बात से हमेशा भयभीत रहता हूं। मैं नहीं जानता ऐसा क्यों है। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि अंग्रेजों ने दो सौ सालों तक आम हिंदुस्तानियों को दबाकर रखा और हमारे बाप-दादा खास तो थे नहीं। वो भी डरते थे तो मैं भी दब्बू हूं। ऐसा होना तो लाज़िमी था।
ओमकारा में बिपाशा के बीड़ी जलइले पर जिया हो करेजा कहकर चिल्ला सकता हूं, मुंह में अंगूठा और तर्जनी डालकर सीटी बजा सकता हूं। गोविंदा से लेकर अक्षय कुमार की फिल्में देखकर मगन हो सकता हूं। धर्मेद्र से लेकर अमिताभ और शाहरुख पर लट्टू हूं। माधुरी से लेकर शिल्पा शेट्टी पर फिदा हूं। लोकसभी टीवी से लेकर दूरदर्शन का कृषि-दर्शन तक देख सकता हूं, बाकी सीरियलों की तो बात ही क्या। जिस फिल्म को देखकर पसंद कर लूं, हिट हो जाती है और जिसे देखकर बोर हो जाऊं, समझिए उसका फ्लॉप होना तय है। फिर भी रामू अपनी आग मुझसे नहीं, प्रेस और समीक्षकों से पास करवाते हैं। इसीलिए कि मैं आम और वो लोग खास हैं।
क्या करूं आम आदमी हूं। दूसरे का दुख देखा नहीं जाता। गवने में अपनी बीवी की विदाई के वक्त उसको रोता देख मैं भी रो पड़ा था। लोकल ट्रेन में हर भिखारी को जेब में पड़े दस-बीस रुपयों में से भी एक-दो का सिक्का दे देता हूं क्योंकि लगता है कि उसके भी तो पेट में दो दाना जाना चाहिए। मेरा क्या है? मैं तो अच्छा-खासा हूं। भगवान ने सही-सलामत दो हाथ और पैर दे रखे हैं। फिर दिलवाला हूं, दिमागदार हूं। ऐसा कोई मूरख थोड़े ही हूं। सोचता ही नहीं कि भिखारियों, अपाहिजों, दीन-दुखियों और बेसहारा लोगों को सहारा देने का काम पब्लिक से टैक्स लेनेवाली सरकार का है।
आम आदमी हूं। इसीलिए किसी के भी अंदर तक पैठ सकता हूं। उसका भाव, उसकी भावना समझ सकता हूं। अटक से लेकर कटक तक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैला हूं। छोटा होते हुए भी इतना विराट हूं, इसलिए खास हूं। अब तो कांग्रेस पार्टी के मैनिफेस्टो से लेकर टाइम मैगजीन के कवर पर आ चुका है, इसीलिए इतना खास हूं।

Thursday 30 August 2007

मन्नू की नहीं सुनी तो किसकी सुनेंगे?

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आज रात 9 बजकर 40 मिनट पर मुंबई पहुंच रहे हैं और कल वो मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख और उनकी सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक करेंगे जिसमें राज्य के चार कृषि विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलर भी शिरकत करेंगे। बैठक में महाराष्ट्र में खेती-किसानी की हालत की समीक्षा की जाएगी, विचार किया जाएगा कि ऐसे क्या उपाय हो सकते हैं जिनसे 10 % सालाना औद्योगिक विकास दर वाले राज्य में कृषि की विकास दर को 1 % से उठाकर 4 % के राष्ट्रीय लक्ष्य तक पहुंचाया जा सके। लेकिन खास मुद्दा होगा कि प्रधानमंत्री ने साल भर पहले किसानों की आत्महत्या से जूझ रहे विदर्भ के लिए 3,750 करोड़ रुपए का जो पैकेज घोषित किया था, उसका अभी तक क्या हश्र हुआ है।
आइये देखते हैं इस बाबत भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट क्या कहती है। असल में सीएजी ने विदर्भ के 11 तालुकों का रैंडम सर्वे करने के बाद जो हकीकत पता लगाई है, वह हमारी अफसरशाही को झापड़ मारने का पर्याप्त आधार देती है। तय हुआ था कि विदर्भ के छह जिलों के 60,000 ऐसे चुनिंदा किसानों को कृषि लागत सामग्रियां और उपकरण मुहैया कराए जाएंगे, जिनके पास छह हेक्टेयर से कम ज़मीन है और जिनकी सालाना आमदनी 20,000 रुपए से कम है। सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक सर्वे में शामिल 18 तालुकों मे से आठ तालुकों में 1.33 करोड़ रुपए की लागत सामग्रियां और उपकरण वितरित नहीं किए गए हैं। अफसरों का कहना है चूंकि किसानों ने अपने हिस्से का पैसा नहीं दिया, इसलिए वो कुछ नहीं कर सके। लेकिन सीएजी का सवाल है कि 54 लाख की जो लागत सामग्रियां और उपकरण मुफ्त दिए जाने थे, उनका वितरण क्यों नहीं हुआ?
सीएजी की ऑडिट टीम के मुताबिक 29,000 किसानों ने लागत सामग्रियों में सब्सिडी के लिए आवेदन किया था, लेकिन इनमें से केवल 16,577 यानी 43 % किसानों को स्कीम का लाभ मिल पाया।
विदर्भ में किसानों की सबसे बड़ी समस्या बीज की थी। लेकिन पिछले साल कुल 84,119 टन की मांग के विपरीत 31,111 टन बीज ही किसानों को मिले। यानी बीज की 63 % मांग पूरी नहीं की गई। प्रधानमंत्री के पैकेज में 180 करोड़ रुपए तीन सालों के दौरान केवल बीज के वितरण के लिए रखे गए हैं। एक तरफ हालत ये है कि किसान बाज़ार और निजी कंपनियों से बीज खरीदने को मजबूर हैं, दूसरी तरफ अफसर अगले दो सालों के लिए भी बीज की सही मांग का आकलन नहीं कर पाए हैं। अफसरों की ढिलाई का फायदा राज्य सरकार को मिल रहा है, शायद इसीलिए उसको प्रधानमंत्री के पैकेज के लागू न होने से ज्यादा परेशानी नहीं हो रही है। मसलन, पशु आहार और चारे के वितरण के लिए नियत पांच करोड़ की रकम किसानों को देने के बजाय दो राष्ट्रीयकृत बैंकों में पड़ी रही, जिस पर राज्य सरकार को 14.52 लाख रुपए का ब्याज मिला है।
विलासराव देशमुख की सरकार सीएजी की इस रिपोर्ट का जवाब देने के बजाय प्रधानमंत्री के सामने उनके पैकेज पर अमल की सुनहरी तस्वीर पेश करने की तैयारी में है। उसका दावा है कि 3,750 करोड़ रुपए में से 1795.80 करोड़ रुपए विदर्भ के छह जिलों में बांटे जा चुके हैं। किसानों को कर्ज की सहूलियत बढ़ाई जा चुकी है, जिसके चलते किसानों की खुदकुशी पिछले डेढ़ साल में घटकर आधी रह गई है।
मुख्यमंत्री और अफसरों के रवैये की पड़ताल जरूरी है। लेकिन मेरे दिमाग में एक बुनियादी सवाल अब भी नाच रहा है जिसे करीब साल भर पहले राज्यसभा के सदस्य और शेतकारी संगठना के नेता शरद जोशी ने उठाया था। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने लेख में बताया था कि पिछले तीन-चार दशकों में सरकार ने एक तो दूसरे राज्यों के कपास किसानों को मोनोपोली प्रोक्योरमेंट स्कीम के तहत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से 110 % कम दाम दिया, ऊपर से विदर्भ के किसानों को इसका भी आधा दाम दिया गया। इस तरह विदर्भ के किसानों को 30,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। आप ही बताइये, क्या विदर्भ के किसानों से उनके हक के 30,000 करोड़ रुपए छीनकर 3,750 करोड़ रुपए का पैकेज देना उनके जले पर नमक छिड़कना नहीं है?

रास्ते में कहां रह गया राजकुमार?

अभी तक कोई राजकुमार सात घोड़ों पर सवार होकर आया ही नहीं। पता नहीं कहां रह गया है रास्ते में...
अगर आप पुरुष हैं तो बहुत मुमकिन है कि इन पंक्तियों को पढ़कर आपके मन में खास कुछ भी न हो, कोई सिहरन न हो। लेकिन अगर आप लड़की हैं, शादी की उम्र हो गई है या कहें कि शादी की उम्र फिसलती जा रही है तो मनमीत न मिल पाने की यह पीड़ा मन के किस गहरे कोने से कैसी सघनता से उठी होगी, आसानी से पहचान सकती हैं। मैंने भी घूमते-टहलते गलियों में, सड़कों पर, यात्राओं में, बसों में, ट्रेनों में, घरों में, रिश्तेदारियों में कभी-कभार इस पीड़ा को पढ़ा है। सुदर, सलोने चेहरों के पीछे परतों में छिपी तड़प को देखा है, पहचाना है। आंखों के अंदर से झांकती पुतलियों में, आपको आरपार पारदर्शी कांच की तरह भेदती निगाहों में। लगता है उम्रकैद पा चुका कोई निरपराध कैदी काल-कोठरी में भेजे जाने के ठीक पहले किसी अपने की तलाश कर रहा हो। दलदल में डूबने के ठीक आखिरी पल कोई किनारे खड़े शख्स से आंखों ही आंखों विदा मांग रहा हो।
ये पीड़ा सहन नहीं होती। ऐसे मौकों पर लगता है, कृष्ण ने अगर सचमुच हज़ारों गोपियों से प्रेम किया होगा, उनसे रासलीला रचाई होगी, उनके हो गए होंगे तो कृष्ण भोगी नहीं रहे होंगे। ऐसा करनेवाला तो कोई महायोगी ही हो सकता है। कृष्ण तो राधा के ही हुए, लेकिन वो प्रेम के ऐसे प्रतीक बन गए कि हर व्याकुल हृदय उनको अपना मानने लगा। कृष्ण हर किसी के ठाकुर बन गए। क्या एक से अनेक होने जाने की बह्म इच्छा भी ऐसे ही मौकों पर किसी संवदेनशील इंसान के दिल से नहीं निकली होगी?
सपनों के राजकुमार की बाट जोहते 30-30, 35-35 साल की हो गई लड़कियों की तादाद आजकल अपने घरों में बढ़ती जा रही है। पढ़ने-लिखने के बाद समझदारी बढ़ गई है, जीवनसाथी को लेकर अपेक्षाएं बढ़ गई हैं तो कोई रास ही नहीं आता। गांवों में हो सकता है कि अब भी 18 से 20 साल में लड़कियों की शादी कर दी जा रही हो, लेकिन कस्बों और शहरों के ज्यादातर पढ़े-लिखे परिवारों में कोई न कोई सलोनी अपने राजकुमार की तलाश कर रही है।
शायद यही बेचैनी है कि वर के अविवाहित होने की शर्त भी बदल रही है और लड़कियां विवाहित पुरुषों के साथ भी जाने को तैयार हो जा रही हैं। हमारा समय बड़ा कठिन है। संक्रमण का ये दौर अनकही, अन-पहचानी पीड़ाओं का दौर है। इसलिए किसी की पीड़ा को, मांग को, अपेक्षा को, गुस्से से बिफर कर नहीं, प्यार से, सहानुभूति से समझना होगा, परखना होगा। कांच के टूटने की आवाज़ आती है। लेकिन दिल भीतर ही भीतर सुबक-सुबक कर बिखरता है, कोई आवाज़ नहीं करता।

Wednesday 29 August 2007

कहते हैं शब्दों को नहीं, भावना को समझो!

भारत-अमेरिका परमाणु समझौते का सच इतना टेक्निकल और उलझा हुआ है कि उसकी तह तक पहुंचना मेरे जैसे आम इंसान के लिए बहुत मुश्किल है। मैं तो बस यही कह सकता हूं कि इस बारे में जितनी ज्यादा जानकारियां सामने लाई जाएं, उतना ही अच्छा है क्योंकि पूरे सच को ही जानकर सार्थक बहस हो सकती है, सही नतीजे पर पहुंचा जा सकता है। मगर दिक्कत ये है कि इस मुद्दे पर अमेरिका की प्रचार लॉबी पूरी तरह सक्रिय हो गई है। और इस लॉबी से मुकाबला करना कितना मुश्किल है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक भी सबूत न मिलने के बावजूद इसने दुनिया से मनवा लिया था कि इराक में जनसंहारक हथियारों का जखीरा है।
इस लॉबी के घनघोर प्रचार का ही नतीजा है कि इस बार राष्ट्रहित की बात करनेवाले लेफ्ट को ही ज्यादातर लोग राष्ट्रविरोधी और चीन के इशारों पर खेलनेवाला मानने लगे हैं। इस हद तक हल्ला मचाया गया कि बीजेपी और संघ से जुडे रहे बुद्धिजीवी सुधीर कुलकर्णी को लेफ्ट के बचाव में उतरना पड़ा।
लेफ्ट से लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री और पत्रकार अरुण शौरी ने 123 समझौते और उससे जुड़े हाइड एक्ट के ‘टेक्स्ट’ के आधार पर ही कहा था कि इसमें भारतीय संप्रभुता पर हमला किया गया है, लेकिन अमेरिकी लॉबी के कुछ बुद्धिजीवी कह रहे हैं कि टेक्स्ट को नहीं, ‘कॉन्टेक्स्ट’ को समझने की जरूरत है। किसी अंतरराष्ट्रीय संधि के बारे में इससे ज्यादा लचर तर्क कोई और हो नहीं सकता, क्योंकि कानून में ज़रा-सी गुंजाइश छोड़ दी जाए तो व्याख्याकार ठीक उसकी उल्टी बात को सच साबित कर सकते हैं।
वैसे कांग्रेस को ये बात कतई हजम नहीं हो रही है कि कोई उस पर देश की संप्रभुता के साथ समझौता करने का आरोप लगाए। विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने मोर्चा संभालते हुए कहा है कि मनमोहन सिंह जैसा प्रधानमंत्री कभी देश की संप्रभुता और अवाम के हितों के साथ समझौता नहीं कर सकता। वाकई मनमोहन सिंह दुनिया से न्यारे हैं। वे उस जॉर्ज डब्ल्यू बुश को भारत का सबसे दोस्ताना अमेरिकी राष्ट्रपति ठहरा चुके हैं, जो दुनिया में ही नहीं, अमेरिका तक में सबसे ज्यादा नफरत किया जानेवाला राष्ट्रपति है।
परमाणु संधि, अप्रसार संधि, सीटीबीटी, नाभिकीय परीक्षण...ये सब बड़े जटिल मसले हैं। लेकिन सीधी और साफ-सी बात ये है कि आज भारत को अमेरिका की नहीं, बल्कि अमेरिका को भारत की जरूरत है। इसलिए हम अमेरिका से ज्यादा से ज्यादा मोलतोल कर सकते हैं। वैसे, सरकार कह भी रही है कि उससे अमेरिका से जितना ज्यादा संभव हो सकता है, उतना हासिल किया है। लेकिन ज्यादातर लोगों को इस पर यकीन नहीं है।
इसका आगाज़ ही खराब हुआ था जब इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी की बैठक में भारत ने अमेरिकी दबाव में आकर ईरान के खिलाफ वोट दिया था। फिर ये भी कहा जा रहा है कि जहां चीन के साथ हुई परमाणु संधि में साफ कहा गया है कि संधि को खत्म करने के लिए अमेरिका के राष्ट्रीय कानूनों का सहारा नहीं लिया जाएगा, वहीं भारत-अमेरिकी संधि में इस पर चुप्पी साध रखी गई है। जहां 123 समझौता अमेरिकी संसद से पारित कानून का हिस्सा है, वहीं हमारी सरकार संसद में इस पर किसी भी सूरत में वोटिंग कराने को तैयार नहीं है। जब हमारी संप्रभुता से जुड़े इतने अहम मसले पर संसद वोट नहीं दे सकती तो क्या यह लोकतंत्र की इस सर्वोच्च संस्था की प्रासंगिकता पर ही सवालिया निशान नहीं है?
हमें एक बात और समझ लेनी चाहिए कि भले ही कहा जा रहा हो कि अमेरिका एशिया में चीन पर नकेल लगाने के लिए भारत का इस्तेमाल करना चाहता है। लेकिन अमेरिका अपनी कुछ घरेलू मजबूरियों के चलते चीन के खिलाफ बहुत दूर तक नहीं जा सकता। उसके आर्थिक हित चीन के साथ बड़ी मजबूती से जुड़े हुए हैं। अमेरिका के करीब 900 अरब डॉलर के बांड चीन के पास हैं। खुद अमेरिका के वित्त मंत्री और राष्ट्रपति बुश के करीबी दोस्त हेनरी पॉलसन आज की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में चीन को सबसे अहम किरदारों में शुमार करते हैं। चीन ने इस साल अप्रैल में जब 5.8 अरब डॉलर के अमेरिकी ट्रेजरी बांड बेच दिए तो हेनरी पॉसलन के माथे पर बल पड़ गए थे। अमेरिका में वॉलमार्ट के जरिए बिकनेवाले 70 फीसदी सामान मेड-इन चाइना हैं। अमेरिका का तकरीबन आधा आयात चीन में अमेरिकी कंपनियों के उत्पादन केंद्रों से आता है। न तो अमेरिका और न ही चीन इन आपसी रिश्तों को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं।
ऐसे में एशिया ही नहीं, फारस की खाड़ी तक में शांति और स्थायित्व बनाए रखने के लिए शक्तिशाली भारत की ज़रूरत है। दो अरब से ज्यादा बाशिंदों वाले इस भूभाग में एक मजबूत लोकतांत्रिक केंद्र चाहिए ताकि धार्मिक कट्टरता से लेकर चीन तक को बेलगाम होने से रोका जा सके। ये काम अमेरिका की मदद से नहीं किया जा सकता क्योंकि अमेरिका का अतीत दागदार है। उसने इराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और ईरान में धार्मिक कट्टरता को ही बढ़ावा दिया है।...समाप्त

त्रि-शूल पर अटक गई है संधि

खेमे बन चुके हैं। भारत-अमेरिका के बीच हुई परमाणु संधि पर पूरे देश का मुखर समाज तीन हिस्सों में बंट चुका है। सभी ने अपनी रूढ़ धारणाएं बना ली हैं। ऐसे में लगता है कि इस पर लिखने का कुछ फायदा है भी कि नहीं। वैसे भी जो मसले राष्ट्रवाद से जुड़ जाते हैं, उन पर सभी भावना में ही बहते हैं, तर्क कोई नहीं सुनता। फिर भी लिखने का मन हुआ और वादा भी कर रखा था तो सोचा कि लिख ही डालूं भले ही एक दिन देरी से।
तो शुरुआत इस मुद्दे पर बंटे तीन खेमों से। कुछ दिनों पहले तक इन खेमों ने म्यान से तलवारें बाहर निकाल ली थीं। लेकिन अब सभी की तलवारें म्यान के भीतर जा चुकी हैं। मनमोहन सरकार के गिरने का फिलहाल कोई खतरा नहीं है। लेफ्ट बातचीत करने के मूड में है और बीजेपी भी अमेरिका के खिलाफ कोई बखेड़ा नहीं खड़ा करना चाहती।
पहला खेमा है सरकार और उसकी तरफदारी कर रहे नेताओं और बुद्धिजीवियों का। इनका कहना है कि भारत-अमेरिका परमाणु संधि या 123 समझौते का मुख्य पहलू है भारत की परमाणु ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करना। अभी हम 2700 मेगावाट बिजली अपने परमाणु संयंत्रों से पैदा कर रहे हैं जो हमारे कुल बिजली उत्पादन का तीन फीसदी से भी कम हिस्सा है। साल 2020 तक देश मे बिजली की मांग लगभग दोगुनी हो जाएगी, तब हमें कम से कम 20,000 मेगावाट बिजली परमाणु साधनों से बनानी होगी। लेकिन हमारे पास इसके लिए ज़रूरी कच्चा माल यूरेनियम-235 नहीं है। इसे हम बाहर से ही आयात कर सकते हैं। 123 समझौता इसका पहला कदम है। इसी के बाद दुनिया के 45 देशों का न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) हमें यूरेनियम आयात की मंजूरी दे सकता है।
दूसरे खेमे का कहना है कि सरकारी अनुमान के मुताबिक 2020 में देश में बिजली की कुल मांग 2,30,000 मेगावाट की होगी। अगर हम परमाणु साधनों से 20,000 मेगावाट बिजली भी बना लेते हैं तो यह कुल मांग का 10 फीसदी हिस्सा भी नहीं होगी। इसलिए असली बात ये नहीं है। बल्कि, 123 समझौते के जरिए अमेरिका ने भारत की विदेश नीति की चाभी अपने हाथ में रख ली है। 123 समझौता अमेरिका के परमाणु ऊर्जा कानून, 1956 के तहत लाई गई एक धारा है और अमेरिकी संसद कभी भी इसके जरिए भारत पर अपनी शर्तें आरोपित कर सकती है। यहां तक इससे जुड़े हाइड एक्ट में प्रावधान है कि भारत जब भी कोई परमाणु परीक्षण करेगा, यह संधि अपने आप खत्म हो जाएगी। ये सीधे-सीधे भारत की संप्रभुता और स्वतंत्रता पर परोक्ष हमला है। इस खेमे में सीपीएम, सीपीआई और दूसरी लेफ्ट पार्टियां शामिल हैं।
तीसरा खेमा कहता है कि आज हमारा राष्ट्रीय हित अमेरिका के साथ सामरिक साझेदारी में है। जिस तरह से एशिया में चीन पाकिस्तान की मदद कर रहा है, उसे देखते हुए हमारी सुरक्षा के तार सीधे-सीधे अमेरिका से जुड़ गए हैं। इसलिए हमें अमेरिका का साथ देना चाहिए, चाहे वह चाहे वह परमाणु संधि का मसला हो या 4 सितंबर से शुरू हो रहे भारत-अमेरिका संयुक्त नौसैनिक अभ्यास का। इस खेमे में बीजेपी शामिल है। खुद बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी दो दिन पहले ऐसा बयान दे चुके हैं। और अब तो आरएसएस भी उनकी हां में हां मिला चुका है। जारी...

Tuesday 28 August 2007

कितने फ्लेक्सिबल हैं हम और हमारे त्योहार

रक्षाबंधन आज है। लेकिन मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों में कई भाई-बहनों ने परसों ही राखी मना ली। बहन भाई के घर गई या भाई बहन के घर आ गया। बहन ने भाई को अक्षत-रोली का तिलक लगाया, मिठाई खिलाई। भाई ने 101 या 501 रुपए का लिफाफा दे दिया। पूरी-मिठाई खाने के बाद एक-दो घंटे गपशप हुई और रक्षाबंधन खत्म। जो बाहर से आया था, वो अपने घर चला गया। बहन दूसरे शहर या गांव में है तो उसने हफ्ते भर पहले ही राखी भिजवा दी और भाई ने कोई और नहीं मिला तो अपनी बेटियों से राखी बंधवा ली। ये हैं जीवन-स्थितियों का दबाव।
लेकिन देश-दुनिया का सर्वग्रासी बाज़ार सामूहिकता के एक भी मौके को हाथ से नहीं जाने देता। जैसे ही हमारी सामूहिकता का कोई प्रतीक नज़र आया, बाज़ार उसे पकड़ने के लिए लपक पड़ता है। गणेश पर एनीमेशन फिल्म आनेवाली है तो बाज़ार गणेश की राखियों से पटा पड़ा है, जबकि गणेश और राखी का वैसे कोई लेना-देना नहीं है। इसी तरह पिछले सालों में जादू और हनुमान की राखियों की धूम थी। हालत ये है कि चीन हमारे त्योहारों के लिए पहले से तैयारी कर लेता है। नितांत भारतीय त्योहार रक्षाबंधन में मिल रही हैं मेड-इन चाइना राखियां। ये है बाज़ार का दबाव।
एक बात और। जो भारत से जितना दूर है, उसके अंदर भारतीयता का आग्रह उतना ही प्रबल है। आज अमेरिका और यूरोप में बसे अनिवासी भारतीयों में रक्षाबंधन या दूसरे त्योहारों का उत्साह कहीं ज्यादा नज़र आता है। मॉरीशस से लेकर सूरीनाम जैसे देश हमारे लोकगीतों, लोकभाषाओं और त्योहारों के हमसे कहीं ज्यादा मुरीद हैं। गांवों में चले जाइये। हर दिन की तरह वहां आज भी मायूसी छाई होगी। ये है बदलते वक्त का दबाव।
चलिए मैंने तो नहा-धोकर राखी बंधवा ली। विधि-विधान से रक्षाबंधन मनाने का कर्मकांड तो काफी विस्तृत है। लेकिन आप चाहें तो राखी बंधवाते वक्त ये श्लोक पढ़ सकते हैं –
ओम यदाबध्नन्दाक्षायणा हिरण्यं, शतानीकाय सुमनस्यमाना:।
तन्मSआबध्नामि शतशारदाय, आयुष्मांजरदृष्टिर्यथासम्।।

Monday 27 August 2007

चीन ने फिर कहा – हम तो भाई-भाई हैं

जब पूरे देश में चर्चाएं गरम है कि चीन भारत को कमज़ोर देखना चाहता है, इसीलिए वह भारत-अमेरिका परमाणु संधि में रोड़े अटका रहा है, तब खुद चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ (नाम का असली उच्चारण अभी-अभी चीन की यात्रा पूरी कर चुके अज़दक बता सकते हैं) ने आज बयान दिया कि चीन और भारत को एक-दूसरे से कोई खतरा नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत-चीन के रिश्तों की मुख्य धारा दोस्ती की है। इन दोनों देशों के बीच दो हज़ार सालों से ज्यादा के दोस्ताना संबंध हैं, जबकि रिश्तों में आई खटास की मियाद महज दो से तीन साल की रही है।
चीनी प्रधानमंत्री के मुताबिक दोनों देशों का विकास एक दूसरे का पूरक है। यह दोनों की समृद्धि और ताकत हासिल करने का मौका देगा, न कि एक दूसरे के लिए खतरा पैदा करेगा। उन्होंने कहा कि इस साल जब भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चीन की यात्रा पर आएंगे तो उनका जबरदस्त स्वागत किया जाएगा। इस ‘बिग इवेंट’ के लिए अभी से तैयारियां शुरू हो गई हैं।
दिक्कत ये है कि भारतीय जनमानस में चीनी नेताओं के बयानों को अब भी संदेह की निगाह से देखा जाता है, क्योंकि हिंदी-चीनी भाई-भाई का सबक पूरा देश 1962 में युद्ध के रूप में झेल चुका है। लेकिन हालात हमेशा एक-से नहीं रहते।
(कल पढ़िए – न्यूक्लियर डील पर नीर-क्षीर)

24 घंटे में डेढ़ लाख हिट!

जी हां। न्यूयॉर्क में रहनेवाली स्विटजरलैंड की ब्लॉगर टीना रॉथ आइजेनबर्ग को अपनी एक 'सिली पोस्ट' पर 24 घंटे में डेढ़ लाख हिट मिले हैं। वो स्विसमिस नाम का एक डिजाइन ब्लॉग चलाती हैं। उन्होंने कुछ नहीं किया, बस नीचे लगी फोटो twentyonepictures.com से साभार उठाई और उस यह शीर्षक जड़ दिया...
Every morning I am tempted to go right...
वैसे एक बात तो है कि जिन्होंने भी ये हिट किए हैं, वो सभी हम और आप जैसे ही लोग हैं जो सोमवार को ऑफिस के अलावा कहीं भी और जाना पसंद करेंगे। शनिवार-रविवार के बाद सोमवार का आना वाकई बड़ा भारी सरदर्द है। आपने शायद बैंगल्स का ‘मैनिक मंडे’ गाना सुना हो। अगर नहीं तो अब देख-सुन लीजिए।

Sunday 26 August 2007

टीम इंडिया किसकी? इसकी या उसकी?

अब आएगा मज़ा। मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। फैसला होना है कि बीसीसीआई से जुड़ी क्रिकेट टीम को ही टीम इंडिया क्यों माना जाए, नई बनी इंडियन क्रिकेट लीग (आईसीएल) को क्यों नहीं। इस पर अदालत में कल यानी सोमवार को विचार होना है। आईसीएल ने दिल्ली हाईकोर्ट में दायर अपनी याचिका में दूसरी बातों के अलावा ये भी गुजारिश की है कि बीसीसीआई को देश के झंडे और नाम का इस्तेमाल करने से रोका जाए क्योंकि बोर्ड खुद सुप्रीम कोर्ट के सामने मान चुका है कि वह एक प्राइवेट बॉडी है। और सच भी यही है कि बीसीसीआई चेन्नई में रजिस्टर्ड एक प्राइवेट क्लब है जो ब्रिटेन की एक लिमिटेड कंपनी आईसीसी से संबद्ध है।
भारतीय क्रिकेट पर बीसीआईआई के एकाधिकार और राष्ट्रीय भावना को भुनाने की उसकी कोशिशों पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। खुद मैंने सवाल उठाया है। लेकिन पहले मुझे अपना सवाल हवा में छोड़े गए तीर जैसा लगता था। लेकिन जब ज़ी समूह के मालिक सुभाष चंद्रा को राष्ट्रवादी भावना के इस उफान की कीमत समझ में आई तो उन्होंने भी एक नई संस्था बना डाली, इंडियन क्रिकेट लीग, जिसका मुखिया बनाया भारत को विश्व कप दिलानेवाले कप्तान कपिलदेव को। यही नहीं, धीरे-धीरे वो इस लीग से 51 नामी-गिरामी खिलाड़ियों को जोड़ने में कामयाब रहे हैं, जिनमें ब्रायन लारा और इंजमाम उल हक जैसे स्टार शामिल हैं।
बीसीसीआई के अधिकारी भले ही कोर्ट में मामला जाने के बाद कह रहे हों कि यह कोई बिग डील नहीं है, बीसीसीआई का बड़ा नाम है तो उसके खिलाफ हर कोई याचिका करता ही रहता है। लेकिन सच यही है कि आईसीएल के आने की आहट से ही उसके पसीने छूट रहे हैं। आईसीएल की तरफ जानेवाले खिलाड़ियों पर आखें तरेर रहा है तो अपने साथ जुड़े खिलाड़ियों की फीस बढ़ा रहा है। मजे की बात ये है कि वह खुद को नॉन-प्रॉफिट संस्था बताता है। लेकिन जब कोई प्रॉफिट ही नहीं है तो उसने अपने पूर्व अध्यक्ष जगमोहन डालमिया पर करोड़ों के गमन का आरोप कैसे लगा दिया और वो खिलाड़ियों को लाखों रुपए कहां से देता है। अब आईसीएल इसी मलाई में हिस्सा बांटने के लिए आ गया तो बीसीसीआई को जबरदस्त किरकिरी हो रही है। लेकिन खिसियानी बिल्ली की कोई खीझ काम नहीं आ रही।
हां, ये ज़रूर है कि बीसीसीआई के एकाधिकार के खत्म होने से उन करोड़ों भारतीयों का वो भ्रम टूट जाएगा, टीम इंडिया के नाम का वो सहारा छूट जाएगा जिसके जरिए वो जीतने की उमंग में हिलोरे लेने लगते थे। आखिर भारत और भारतीयता की जीत के कितने प्रतीक ही हैं हमारे पास? लेकिन झूठी तसल्लियों और झूठे प्रतीकों में फंसे रहने से अच्छा है कि हम खुलकर सच का मुकाबला करें। सचमुच बाज़ार इतनी बुरी चीज़ नहीं है, जितना हम समझते हैं। यह बाज़ार में मची होड़ ही है जो सालों-साल से भारतीय राष्ट्रवाद की भावना को मजे से भुनाने वाले प्राइवेट क्लब के मंसूबों पर पानी फेरने जा रही है।

Saturday 25 August 2007

सुब्बण्णा, संगीत और मुक्ति

हमारे शास्त्रीय संगीत और आध्यात्मिक मुक्ति में बड़ा गहरा नाता है। संगीत के स्वर नाड़ी तंत्र में ऐसा अनुनाद पैदा करते हैं कि आपको लगता है अंदर के तनाव और हर दुखती रग पर किसी ने प्यार से मरहम लगा दिया हो। संगीत और मुक्ति के इसी जीवंत रिश्ते को स्थापित करता है ज्ञानपीठ से सम्मानित जानेमाने कन्नड़ कथाकार मास्ति वेंकटेश अय्यंगार का लघु उपन्यास सुब्बण्णा। सुब्बण्णा का छोटा-सा अंतिम अध्याय...

मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यदि मुक्ति कोई चीज़ है तो वह सुब्बण्णा ने अवश्य प्राप्त की होगी। मैंने एक बार पूछा था, “सुब्बण्णा जी, संगीत में सात स्वरों का प्रयोग क्यों होता है?”
वे बोले थे, “यदि हम सात समझें तो सात हैं वैसे देखें तो सौ, करोड़ों स्वर हो सकते है, नहीं तो एक ही।” जब वे बेला बजाते थे तो उनकी यह बात कुछ समझ में आती थी।
और एक बार मैंने पूछा था, “सुब्बण्णा जी, अद्वैत अच्छा है या द्वैत?” तब उन्होंने कहा था, “मेरी स्थिति से देखें तो अद्वैत ठीक लगता है। पर उनकी स्थिति से देखें तो द्वैत ठीक लगता है।” मैं चुप हो गया। उनकी बातचीत का ढंग ही कुछ वैसा था। मैं जानता था कि आदरसूचक ‘उनके’ शब्द का प्रयोग वे किसके लिए करते थे।
कुछ देर बाद वे बोले, “देखिए मरते समय उन्होंने कहा था, इतने दिनों तक मैंने आपकी छाया में गौरी-पूजा की। अब वही मुझे अपने पास बुला रही हैं। आपको अकेले छोड़ते दुख होता है। अपने पेट के बच्चे ही नहीं रहे तो क्या होगा? कर्म पूरा होते ही आप भी वहां आएंगे। दोनों वहीं रहेंगे। दोनों मिलकर देवी की सेवा में लग जाएंगे। उनका विश्वास और उनके जीवन को देखें तो द्वैत ही ठीक लगता है। मेरे जीवन को देखें तो लगता है कि यह खेल जितना जल्दी समाप्त हो जाए उतना ही अच्छा है। इसके बाद अद्वैत बनकर रह जाएंगे।”
और एक बार मैंने पूछा, “सुब्बण्णा जी, शिव बड़ा है या विष्णु?”
सुब्बण्णा जी ने कुछ भी नहीं कहा। मैंने सोचा कि उन्होंने मेरी बात की ओर ध्यान नहीं दिया। कोई पौन घंटे के बाद उन्होंने बेला लेकर एक घंटे तक आनंदविभोर होकर राग शंकराभरण बजाया। पिछले दिनों ऐसा ही राग भैरवी भी बजाया था। उनका शंकराभरण सुनकर मैं अपनी बात भूल गया था। मैं बोला, “कैसा सुंदर आलाप है? कितना मधुर है?” उन्होंने पूछा, “कल की भैरवी कैसी थी?” मैं बोला, “वह भी इतनी ही अच्छी थी।” वे बोले, “भैरवी अच्छी थी या शंकराभरण?” वह मेरे प्रश्न का उत्तर था।
सुब्बण्णा को गायन के द्वारा ही सब मालूम हो गया था। ऐसा ज्ञान! ऐसी साधना! इस ज्ञान और इस साधना के बाद जो स्थिति होगी वह मुक्ति के अतिरिक्त और क्या हो सकती है?
(इस उपन्यास का हिंदी अनुवाद भारतीय ज्ञानपीठ ने सुब्बण्णा शीर्षक से छापा है। बहुत ही प्यारा अनुवाद है)

Friday 24 August 2007

वाह रे तेज़ी कि फु्र्ती भी शरमा जाए

वाकई, माया मेमसाहब ने गज़ब की तेज़ी दिखाई है। 3 अगस्त को नई कृषि नीति बनाई और 23 अगस्त को उसे वापस भी ले लिया। यानी, जन्मने के बीस दिन बाद ही कृषि-प्रधान उत्तर प्रदेश ने कृषि नीति को दफ्न कर दिया। मुख्यमंत्री कहती हैं कि उनकी सरकार ने इस नीति को बनाया तो था बहुत सोच-समझ कर, लेकिन फिर सोच-समझ ही राज्य के खुफिया विभाग से कहा कि वो सभी 70 जिलों में जाकर पता लगाए कि किसान इस नीति को कितना पसंद कर रहे हैं। और कमाल की बात ये है कि दो हफ्ते में ही खुफिया विभाग ने दो लाख 36 हज़ार 286 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले राज्य में अपने सूत्रों से पता लगा लिया कि 60 फीसदी किसान इस नीति के खिलाफ हैं। बस, यह पता लगते ही सरकार ने नई कृषि नीति को वापस लेने का फैसला ले लिया क्योंकि वह किसानों की इच्छाओं के खिलाफ कभी जाने की सोच ही नहीं सकती। धन्य है मायावती का यह किसान-प्रेम!
इस कृषि नीति में साफ-साफ मेरिट के आधार पर कृषि जोत में 12.5 एकड़ की सीलिंग सीमा में छूट देने की बात कही गई थी, लेकिन अब मायावती कह रही हैं कि विपक्षी अफवाह फैला रहे थे कि नई नीति में सीलिंग की सीमा घटाई जा रही है। क्या वाकई उत्तर प्रदेश में विपक्षी इतने संघी हो गए हैं कि सच के बजाय झूठ का ढिढोरा पीट रहे हैं? माया जी, वाकई आपकी माया निराली है कि जो करने जा रही थीं, उसी की उल्टी बात का खंडन कर रही हैं, वह भी विपक्षियों के नाम पर।
अब एक और कमाल देखिए। मायावती की नई कृषि में बिचौलियों को खत्म करने की बात से सभी ने निष्कर्ष निकाला था कि असल में सरकार किसानों के नाम पर संगठित रिटेल में उतर रहे उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने जा रही है। तो, अब मायावती ने मुकेश अंबानी के रिलायंस फ्रेश से लेकर आरपी गोयनका ग्रुप के स्पेंसर स्टोर्स को बंद करने का फरमान जारी कर दिया है। कहा जा रहा है कि ये एक तात्कालिक कदम है और इसे कानून-व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है क्योंकि पिछले कुछ दिनों में मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी ने इन रिटेल स्टोर्स के खिलाफ तोड़फोड़ की थी। हो सकता है कि अनिल अंबानी मुलायम और अमर सिंह के खास-म-खास हैं, इसलिए उन्होंने बड़े भाई के रिलायंस फ्रेश के खिलाफ इनसे राजनीतिक उपद्रव कराया हो, लेकिन बहनजी बीस दिन में ही कैसे अपनी नीयत से बदल गईं, समझ में आना मुश्किल है। वाकई, माया की माया तो भगवान भी नहीं समझ सके, तो हम इंसान क्या चीज़ हैं?
खैर, बहनजी ने इस मसले पर कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह की अध्यक्षता में एक कमिटी बना दी है जो कानून-व्यवस्था ही नहीं, स्वास्थ्य और सफाई जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देकर एक महीने के भीतर रिटेल स्टोरों पर नई सिफारिशें पेश करेगी। मजे की बात ये है कि जिन अंग्रेजी अखबारों और उद्योग चैंबर्स ने कृषि नीति पर मायावती के कसीदे काढ़े थे, उनकी बोलती अब बंद हो गई है। उनसे न कुछ निगलते बन रहा है और न ही उगलते। हम भी मायूस हैं क्योंकि हमें ज़रा-सा भी इलहाम नहीं था कि इस नीति पर लिखे हमारे लेख बीस दिन में ही अप्रासंगिक हो जाएंगे।

सुख की संजीवनी है सत्ता-संपन्नता

सुख क्या है, सुखी कौन है? यह एक शाश्वत सवाल है। लेकिन कल जब विमल ने काहे की मुक्ति में अपनी चाहत का इजहार किया कि मेरे पास सारी ऐशोआराम की चीज़ें हों, सिर पर कोई ज़िम्मेदारी न हो, बात करने के लिए ढेर सारे दोस्त हों तो मुझे लगा कि इस शाश्वत सवाल का जवाब देश, काल और परिस्थिति सापेक्ष है। मेरे बाबा परम संतोषी जीव थे। कहा करते थे : गोधन, गजधन, बाजिधन और रतनधन खान, जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान। लेकिन ये किसान अर्थव्यवस्था और परिवेश का सुख था। आज के महानगरीय जीवन में ढेर सारे दोस्तों का होना मर्सिडीज होने से कम बड़ी बात नहीं है।
लेकिन हमारे समय और देश के मौजूदा हालात में मुझे लगता है कि इम्पावरमेंट, सत्ता संपन्नता सुख की बुनियादी शर्त है। ज़रा याद कीजिए कि प्रधानमंत्री रहने के दौरान अटल बिहारी बाजपेयी का चेहरा कैसा चमकता था, चलने में दिक्कत थी, लेकिन उतनी नहीं। नरसिंह राव से लेकर कब्र में पैर लटकाए मोरारजी देसाई कैसे प्रधानमंत्री बनते ही हरे-भरे हो गए थे! बुढ़ापे में भी नारायण दत्त तिवारी के चेहरे से कैसा नूर टपकता है। मायावती के भी चेहरे की रौनक सत्ता में वापसी के बाद दिन-ब-दिन निखरती जा रही है। चंद्रशेखर मरे तो कैंसर से। लेकिन सत्ता में न रहते हुए भी वो हमेशा सत्ता में रहते थे। यही वजह है कि उनका शरीर और चेहरा हमेशा दमकता रहा। दूसरी तरफ उनकी धर्मपत्नी कभी उनके बगल में दिख जाती थीं तो लगता था कि उनकी मां बैठी हुई हैं। जो बात नेताओं पर लागू होती है, वह हम और आप जैसे तमाम आम लोगों के लिए भी सही है।
मैंने अपने अनुभव से जाना है कि सुखी होने के लिए आपका स्वस्थ रहना जरूरी है। लेकिन सत्ता आते ही आपका स्वास्थ्य खुद-ब-खुद सुधार के रास्ते पर चल निकलता है। जब तक आप दीन-हीन और दबे-कुचले रहते हैं, तब तक आपका स्वास्थ्य बिगड़ता ही चला जाता है। लेकिन घर या दफ्तर में सत्ता मिलते ही कैसे आपकी चहक कूद-कूदकर बाहर निकलती है। आप किसी को सत्ता दे दो, वह अपने सुख का रास्ता खुद ही खोज निकालेगा। आपको झंझट करने की कोई ज़रूरत नहीं है। इसीलिए सुखी रहने का सवाल महज दर्शन का ही नहीं, राजनीति का भी सवाल है और आज इसका जवाब राजनीति में तलाशा जाना चाहिए।
अभी हाल ही में ब्रिटेन की लाइसेस्टर यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों ने दुनिया के तमाम देशों के निवासियों की प्रसन्नता मापने के लिए एक पैमाना बनाया जिसमें कुल 39 कारक हैं। इसमें से कुछ खास कारक हैं : राजनीतिक स्थायित्व, बैंकिंग सेवाएं, निजी स्वातंत्र्य, कचरे का निपटारा, हवा की शुद्धता और प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति। आप समझ सकते हैं कि सुख का कितना गहरा रिश्ता आपके आसपास की चीजों से है। यह सही है कि सुख एक अनुभूति है और आत्मज्ञान इसकी कुंजी है, लेकिन इसका छोर तो तब पकड़ में आता है जब राजनीतिक सत्ता-संपन्नता से लेकर आपकी तमाम बुनियादी ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं।
वैसे, चलते-चलते जिक्र कर दूं कि जहां दुनिया के देश अपनी आर्थिक खुशहाली जानने और बताने के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का डंका पीटते हैं, वहीं हमारा पड़ोसी पिद्दी-सा देश भूटान सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता (ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस) की धारणा का पालन कर रहा है और आज से नहीं, सन् 1972 से। वहां की सड़कों पर एक बार ट्रैफिक लाइट लगाकर हटा दी गईं क्योंकि लोगों को इससे परेशानी होती थी, उन्हें तो हाथ दिखाकर ट्रैफिक बुलाता-भागता सूरमा ही सुहाता है।

Thursday 23 August 2007

हमें आदत है स्वांग को सच समझने की

आर के नारायणन ने जब गाइड उपन्यास लिखा होगा और 1965 में विजय आनंद ने इस पर शानदार फिल्म बनाई होगी तो ज़रूर सोचा होगा कि इससे भारतीय अवाम की स्वांग को सच समझने की आदत बदल सकती है। इस फिल्म को बहुतों ने देखा और सराहा, लेकिन 42 साल बाद भी हालत जस की तस है। आर्म्स एक्ट में छह साल के कठोर कारावास की सज़ा भुगत रहा मुजरिम संजय दत्त जब जेल से बेल पर छूटता है तो उसे देखने के लिए लोगों का तांता लग जाता है। यहां तक कि पुलिसवाले भी उससे हाथ मिलाने को बेताब नज़र आते हैं। हम संजय दत्त को मुन्नाभाई से अलग हटकर खलनायक मानने को तैयार ही नहीं है।
यही हाल शाहरुख खान का है। चक दे इंडिया बॉक्स ऑफिस पर हिट हो गई है। फिल्म में शाहरुख का किरदार कबीर खान भारतीय हॉकी टीम का कैप्टन था, लेकिन विश्व कप फाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ पेनाल्टी स्ट्रोक को गोल में न बदल पाने पर उसे गद्दार करार दिया गया। एक दिन वही कबीर खान कोच बनकर भारतीय महिला हॉकी टीम को विश्व कप दिलवाने में कामयाब रहता है। इस रोल ने स्वदेश के शाहरुख की राष्ट्रवादी छवि को और चमका दिया है। लेकिन हम केवल यही देखते हैं। नहीं देखते कि वही शाहरुख खान इस समय मर्दों को गोरा बनानेवाली क्रीम बेच रहा है, जबकि विज्ञान कहता है कि सांवले को गोरा बनाने का दावा सरासर गलत है। लेकिन हम छवि के गुलाम हैं। किसी को संत मान लिया तो उसे संत ही माने रहेंगे, भले ही चाहे कुछ भी हो जाए।
लोगों के अंधे प्यार का यही भरोसा है कि अमिताभ बच्चन आज ललकार कर कहते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार चाहे तो उन्हें जेल में डाल दे, उन्होंने गलती की हो तो उन्हें गोली मार दी जाए। उन्हें यकीन है कि अगर ऐसा किया गया तो उनके फैन अपने ‘भगवान’ के लिए कुछ भी कर गुजरेंगे। यूपी में दम है क्योंकि जुर्म यहां कम है जैसे झूठे विज्ञापन पर उनसे पूछा गया तो अमिताभ ने साफ कह दिया कि वो तो अभिनेता है, स्क्रिप्ट में जो लिखा होगा वैसा ही बोलेंगे। असल ज़िदगी में अमिताभ बच्चन क्या हैं, सेट पर उनकी शामें कैसे गुजरती हैं, इसे उनके साथ काम करनेवाले कलाकारों और प्रोड्यूसरों से पूछा जा सकता है। कई सालों से फिल्में कवर करनेवाले मेरे एक पत्रकार मित्र ने ऐसी बातें बताईं कि मुझे यकीन ही नहीं आया। अमिताभ आखिरी वक्त तक कोशिश करते रहे कि अभिषेक से ऐश्वर्या की शादी न हो पाए। वजह ऐसी है कि जिसे मैं लिख दूं तो बिग-बी से लेकर एक नामी उद्योगपति तक मुझे अदालत में घसीट ले जाएंगे।
अमिताभ बच्चन अपने बाबूजी और भारतीय संस्कारों की बराबर दुहाई देते हैं। लेकिन पिछले शनिवार (18 अगस्त) को न्यूयॉर्क में जब वे अपने उन्हीं बाबूजी की सौंवी वर्षगांठ के मनाने के समारोह में अपनी बहू के साथ पहुंचे तो क्या नज़ारा था, आप इस तस्वीर में साफ देख सकते हैं। बीबीसी की साइट पर छपी इस तस्वीर में ससुर के बगल में नई-नई बहू कैसे अपना क्लीवेज दिखा रही है, इससे आप समझ सकते हैं कि राय-बच्चन परिवार में अब भारतीय संस्कारों का कितना अवशेष बचा रह गया है। आप कह सकते हैं कि इनका तो पेशा ही अभिनय है, सेलिब्रिटी हैं तो सार्वजनिक जीवन में लोगों की मांग के हिसाब से ही चलेंगे न! बात सही है। तो इनको वहीं समझिए जो ये असल में हैं। इनके स्वांग को सच समझने का झूठ हम क्यों और कब तक ढोते रहेंगे?
अमिताभ ने जाली कागजों के दम पर बाराबंकी में ज़मीन हासिल की है तो उन पर जालसाजी का मुकदमा चलाया ही जाना चाहिए, भले ही वो कहते रहें कि इस फ्रॉड के लिए दोषी विजय कुमार शुक्ला है जिसे उन्होंने पावर ऑफ अटॉर्नी दे रखी थी।

ज़रूरतें हैं तो धंधे हैं, नहीं तो और क्या है?

बेसिकली क्या है? हम हैं, हमारे लोग हैं, हमारा परिवार है और हमारी, हम सबकी ज़रूरतें हैं। बाकी सब तो इन्हीं ज़रूरतों को पूरा करने का धंधा है। कोई हमारे खाने-पीने रहने की ज़रूरत पूरी करता है, कोई मनोरंजन की ज़रूरत पूरी करता है। हम भी अपने और अपने परिवार के अलावा दूसरों की ज़रूरतें पूरी करते हैं। चीजें और सुविधाएं सीमित हैं। इससे भी बड़ी बात है कि हम सभी में भारी ग्रीड है, लालच है। इसको कंट्रोल करने के लिए काम-धंधे बना दिए गए, मुद्रा बना दी गई। काम के बदले हमें नोट मिलते हैं ताकि हम अपनी और अपनों की ज़रूरतें पूरी कर सकें। यही सब ज़ीरो-सम गेम चल रहा है। और क्या है?
अच्छा काम, बुरा काम, ऊंचा ओहदा, नीची पोस्ट। ये सब कुछ खाली-पीली का चोंचला है। इसलिए कि एक दूसरे को काट कर आगे बढ़ने की आदम चाहत बनी रहे। लोग सक्रिय रहें, ज़िंदगी में गति बनी रहे। साहित्य, संस्कृति, सिनेमा, विज्ञापन सभी हमारी ज़रूरतों की थाह लेते हैं। सर्वे कराते है ताकि हमारी सटीक ज़रूरतों की पहचान हो सके ताकि वो उसे भुनाकर अपने हिस्से के नोट कमा सके। अपने अफसरों, कर्मचारियों को बांट सकें जिससे ये सभी अपनी और अपनों की जरूरतें पूरी कर सकें। और क्या है?
ज्यादा नोट आपके पास होंगे तो आपकी महीन-महीन सोफिस्टिकेटेड ज़रूरतें सामने आ जाती हैं। शरीर की प्राकृतिक खुशबू या बदबू की जगह कोई महंगा परफ्यूम लगाते हैं। रसोई का खाना न खाकर फाइव स्टार होटल में लंच और डिनर करते हैं। फिल्म या टेलिविजन शो न देखकर आप अपने प्राइवेट शो करवाते हैं। डांस, शराब और नशे की पार्टियां आयोजित करते हैं। आपकी पोजीशन सेफ रहे, इसके लिए सत्ता में बैठे लोगों को साधते हैं। अपने बाल-बच्चों का भविष्य सुरक्षित बनाने के लिए उन्हें हार्वर्ड, ऑक्सफोर्ड या कैम्ब्रिज में पढ़ाते हैं। छोटे से बड़े सबके लिए यही मारामारी है। और क्या है?
सब कुछ इफरात होता तो हम आज भी जंगल में रह रहे होते। कोई परिवार न होता। कोई बीवी नहीं होती। मां-बाप की सही शिनाख्त नहीं होती। सब अपने-अपने में मस्त रहते। खाते-पीते सोते। सीजन आने पर सेक्स करते। संतति को आगे बढ़ाते। न दोस्त होते, न रिश्तेदार। न सेलिब्रिटी होते, न ही होता आम और खास का विभाजन। टेलिविजन पर न कुसुम होती, न नच बलिए और न ही फिल्मों के शहंशाह और बादशाह। तब अंताक्षरी का कोई शो भी नहीं होता। ज़रूरतों को खत्म करने का प्रवचन देनेवाले बाबाओं की जमात नहीं होती। न्यूज़ चैनल्स तो होते ही नहीं। सबके सब तो हमारी ज़रूरतों को ही भुनाते हैं। और क्या है?
जो ताकतवर होता, उससे सब डरते। लेकिन डरपोक से डरपोक भी अपना गुज़ारा कर लेता। नहीं तो क्या होता? मर जाता, यही न! जीना-मरना, स्वर्ग-नरक, भगवान-यमदूत सब कुछ चोंचला है। सब हम्हीं ने बनाया है ताकि व्यवस्था बनी रहे। समाज बना रहे। ज़रूरतों के हिसाब से ज्यादातर लोगों की ज़रूरतें पूरी होती रहे। बस्स...और क्या है?

Wednesday 22 August 2007

रिश्ता तलवार की धार और कविता का

यकीनन मैं कविता का विरोधी नहीं हूं। मैं बहुत सारी देसी-विदेशी कविताओं का ऋणी हूं जिन्होंने मुझे ऐसी अनुभूतियों के दर्शन कराए जो अपनी पूरी ज़िंदगी मैं अपने दम पर नहीं कर सकता था। सच कहूं तो मेरे लिए कवि ज़िंदगी से लबालब भरा वो इंसान है, वो आदर्श है, जहां तक पहुंचने की मैं सोच भी नहीं सकता क्योंकि मैं अपने अंदर उस धैर्य, बेचैनी, सच्चाई और प्राकृतिक न्याय के प्रति समर्पण और उस जीवट का अभाव पाता हूं जो किसी कवि की ही थाती हो सकती है। मैं तुकांत-अतुकांत कविता लिख सकता हूं, लेकिन पाश की आग कहीं से उधार नहीं ला सकता। नागार्जुन का बालसुलभ उत्साह मैं खरीदकर नहीं ला सकता। गोरख पांडे की निष्छल आंखें मैं कहीं से ट्रांसप्लांट नहीं करा सकता।
मैं समझता हूं कि कवि कर्म के जरूरी शर्त है सच्चा होना, अपने प्रति ईमानदार होना। कवि हमेशा नई ज़मीन तलाशता है, पाताल भी तोड़कर नई अनुभूतियां निकाल ले आता है। वह स्वभाव से ही क्रांतिकारी होता है। इसीलिए कवि बनना बड़ा मुश्किल है। वाकई तलवार की धार पर उसे चलना पड़ता है। अंदर भी जूझना पड़ता है और बाहर भी।
लेकिन कोई यह सब न करे तो कवि बनना बड़ा आसान भी है। बिना जमकर पढ़े-लिखे कोई आलोचक नहीं बन सकता। गद्य लिखने के लिए भी आपको अपनी बातों को तथ्यों और तर्कों में पिरोना पड़ता है। लेकिन कविता लिखने के लिए शायद ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती। लोग सब्जी खरीदने निकलते हैं, इंस्पिरेशन मिल जाती है, कविता लिख मारते हैं। नुक्कड़ पर पान खाते-खाते कविता पकड़ लेते हैं। अल-सल्वाडोर से लेकर युगांडा की कोई घटना भी कविता की इंस्पिरेशन बन जाती है, ठीक उसी तरह जैसे हमारे बॉलीवुड के राइटर-डायरेक्टर विदेशी फिल्मों से इंस्पायर होते रहते हैं।
मुझे परेशानी इसी तरह की सस्ती कविता से है। वैसे, पहले मेरे साथ कवियों को लेकर एक और दिक्कत थी। वो यह कि मेरे दिमाग में कवियों की स्त्रैण जैसी ही छवि रूढ़ हो गई थी। इस छवि का पहला स्केच मेरे जेहन में नई कविता पर मुक्तिबोध को पढ़ते हुए बना था। कैसे? आप भी सुन लीजिए। मुक्तिबोध साहित्यिक की डायरी के एक लेख में नई कविता करनेवाले एक व्यक्ति का वर्णन यूं करते हैं, “उसके कंधे झूलते थे। अगर एक पैर पर ज़ोर देकर खड़ा हो जाए तो वह दूसरे पैर को उससे लपेट लेता था, हांथों को मिलाकर उन्हें जांधों में दबा लेता था।...बावजूद अपने ऊंचे कद के वह ज़रा-ज़रा-सी बात पर झेंपता था। देखनेवालों को यह ख्याल हो आता था कि इस लंबे-चौड़े कदवाले और सख्त बालों के घने जंगलवाले चौड़ेपन में, कहीं तो भी, किंतु किसी केंद्रीय स्थान पर, नारी बैठी हुई है।”
बाद में इस धारणा को लेकर खुद मेरी पत्नी खफा हो गईं। उनका कहना था कि स्त्रैण कहकर आप कवि का नहीं, पूरी स्त्री जाति का अपमान कर रहे हैं। अगर किसी के अंदर कोई नारी बैठी हुई है तो इसमें गलत क्या है? खुद महात्मा गांधी कहा करते थे कि उनके अंदर एक स्त्री है तो क्या वे मज़ाक की वस्तु बन गए। बात मेरी समझ में आ गई और मैंने अपनी भूल सुधार ली। लेकिन अभी भी यदाकदा लगता है कि कवियो में निराला जैसे पहलवान कम ही होते हैं, ज्यादातर तो सुमित्रानंदन पंत सरीखे ही होते हैं, जिन्हें रामलीला में सीता का ही पार्ट मिलता है। आजकल भी नीलाभ या बोधिबाबा जैसे पहलवान कवि कम ही हैं, ज्यादातर तो आलोक धन्वा जैसे दो पसली के चिमिरिखी पहलवान हैं।
कवियों के बारे में प्रयाग शुक्ल टाइप कवियों ने भी मेरी धारणा को बिगाड़ने का काम किया है। कई साल पहले दिल्ली के रवींद्र भवन में एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया था। इसमें नामवर सिंह सरीखे नामी आलोचक भी आए थे। प्रयाग शुक्ल ने एक कविता सुनाई जो उन्होंने शायद उन्होंने नॉरवे या किसी दूसरे यूरोपीय देश में प्रवास के दौरान लिखी थी। कुछ यूं थी उनकी कविता...मैं पार्क में बैठा था। झूले पर एक बच्ची अकेली बैठी थी। उसने कहा – झूला झुला दो, मैंने झुला दिया। कविता यहीं खत्म हो गई। फिर तमाम आलोचकों ने किराये के पंडितों के अंदाज़ में ‘कालिदास’ के अनकहे इशारों की जमकर व्याख्या की। और, मैं अपना सिर धुनता रह गया कि अगर यही कविता है तो रोज़ सोते-जागते थोक के भाव कविताएं लिखी जा सकती हैं।

आलोचनाएं सुनीं तो अब सफाई भी सुन लें

मजाक-मजाक में मजमा लग गया। तो, अब थोड़ा सीरियस हो लिया जाए। पहली बात, जो सच्चे सहृदय लोग, गृहणियां, कामकाजी लोग, भावुक नवयुवतियां या नौजवान अपनी कोमल भावनाओं को कविता के रूप में कलमबद्ध करते हैं, उनको अगर मैं फ्रॉड कहूं तो यकीनन मैं कुंभीपाक नरक का अधिकारी हूं। चंदू जैसे तमाम मित्र जो कविता को साधना की तरह साधते हैं, उनकी भावनाओं पर संदेह करना भी ब्रह्म-हत्या के दोष से कम नहीं है। मैं तो उन कवियों की बात कर रहा था जो जनता और जनवाद के नाम पर कविता की दुकान चलाते हैं। ऐसे कई समकालीन कवियों के नाम मेरी जुबान पर हैं। लेकिन शिष्टाचारवश मैं उनके नाम नहीं ले सकता।
वैसे, आपको बता दूं कि मैंने कोई अनोखी बात नहीं कही है। साहित्य से मेरा पहला परिचय गजानन माधव मुक्तिबोध की रचनाओं के माध्यम से हुआ था। उन्होंने साहित्यिक की डायरी में 1954 से लेकर 1962 के बीच लिखे गए कई लेखों में इस तरह की बातें कही हैं। आप भी उनकी बानगी देख लीजिए। मेरी अपनी बात अगली पोस्ट में।

- कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी शीर्षक वाले लेख में मुक्तिबोध ने यशराज नाम के एक चरित्र से कहलवाया है – हिंदी में बहुतेरी कविताएं हैं जो कि बिलकुल फ्रॉड हैं। जिसे तुम नई कविता कहते हो, उसमें भी फ्रॉड की कमी नहीं है।

- आश्चर्य की बात है कि जो कवि कला में एकदम भेरी या ढोल के निनाद-सरीखी ऊर्जस्वल क्रांतिवाणी गुंजाता रहता है, वही कवि ठीक व्यावहारिक जीवन में (और आंतरिक जीवन में भी) सामान्य जनों की जो नैतिक मानवीय इयत्ताएं हैं उससे भी गिरा हुआ बहुत बार पाया जाता है। ...राजनीतिक क्षेत्र के हिसाब से देखें तो यह पाया जाएगा कि ऐसे बहुत कम क्रांतिकारी कवि हैं, जिनके जीवन में राजनीतिक सिद्धांत बरते जाते हों। पूछा जाएगा कि यह तो व्यक्तिगत बात हुई, और साहित्य में इसकी कोई ज़रूरत नहीं। लेकिन असल बात यह है कि काव्य और व्यक्तित्व का संबंध आपको कहीं-न-कहीं जोड़ना होगा। यह नहीं हो सकता कि आप एक ओर सामान्य मानवीयता का त्याग करते चलें और दूसरी ओर काव्य में मानवीय बने रहें।..यह सही है कि प्रश्न उलझा हुआ है, लेकिन यह भी सही है कि यदि साहित्य जीवन का प्रतिबिंब है तो उसमें यह भी जोड़ना पड़ेगा कि कभी-कभी साहित्य जीवन के स्वांग का भी प्रतिबिंब होता है।

- काव्य में प्रकट उनके व्यक्तित्व में मानवीयता का स्पर्श अल्प होता है। उसमें किसी ऐसे भव्य रूप के दर्शन भी नहीं होते जो हमारे सामान्य जनों की भव्य मानवीयता में हमें दिखाई देते हैं। आध्यात्मिक टुटपुंजियापन आज की कविता का महत्वपूर्ण लक्षण है।

- एक सज्जन हैं। बहुत ऊंचे प्रगतिशील कवि। अभी भी बड़े, पूज्य, ज्येष्ठ और श्रेष्ठ माने जाते हैं। उनका काव्य क्रांतिकारी है। लेकिन जिस नगर में वे एक आचार्य हैं, उसकी जनता से पूछिए। जी हां, जनता से, विद्यार्थियों से, यहां तक कि कार्यकर्त्ताओं से भी। उन्होंने एक बार नहीं, कई बार हड़तालें तोड़ने का काम किया है। ...इसके बाद भी वे शोषित जनता के क्रांतिकारी कवि सिर्फ बने ही नहीं रहे, किंतु प्रगतिशील आलोचक प्रवरों ने उन्हें जयमालाएं पहनाईं, उनका शंखनाद किया।

- असल में नई कविता मानसिक तरंगों (प्रतिक्रिया) का चित्रण करती है। ये तरंगे क्षण-स्थाई हैं। उनका महत्व तो तब चिर-स्थाई होगा जब वे पूरे जीवन को प्रभावित करने लायक क्षमता धारण करेंगी।

- मनुष्य की मानसिक मनोवैज्ञानिक स्वार्थ-बुद्धि ऊंचे आदर्शों को आगे करके उनके झंडे के नीचे काम करती है। उनके मंदिर में बैठ अपना शिकार करती है, अपना धंधा करती है।


- ऊंचे से ऊंचा कलाकार भी जब असलियत को, मनुष्य के यथार्थ को, अपनी संकुचित संवेदनाओं, ओछी पीड़ाओं और अहंग्रस्त भावनाओं का आदर्शीकरण करते हुए दुनिया को देखता है, तब लेखक के प्रतिभाशील होने के कारण उसका चित्रण-कार्य प्रभावशाली होते हुए भी, उस प्रभाव का गुण ऐसा न होगा जो मनुष्य के हृदय को पिघलाकर उसकी आत्मा को उन्नत बनाए।

- साहित्य बहुत कुछ हद तक एक धोखा है। खुद को भी धोखा और दुनिया भर को धोखा। हे मेरे प्यारे पाठकों! यदि इस बात को नहीं समझोगे तो अपना ही नुकसान करोगे।

...आपत्तियां हैं मगर दमदार

मैंने तो यूं ही वह बात लिख दी थी जो मैंने हाल ही में प्रमोद और उससे दो-तीन महीने पहले बोधिसत्व से कही थी। पहले भी कई सालों से ये बात मैं दोस्तों के बीच कहता रहा था। लेकिन मुझे वाकई नहीं पता था कि इसे पोस्ट पर चढ़ाकर मैं आग में हाथ डाल रहा हूं। चलिए, आग में हाथ डाल दिया तो मरहम भी खुद ही लगाएंगे। मेरी सफाई बाद में, पहले वो आपत्तियां जो कमेंट में पड़े-पड़े छुपी-सी रहती हैं। इसलिए उन्हें खुलकर पढ़िए और गुनिए।

प्रियंकर ने कहा है :
आपकी बात में तथ्य है पर पूरा सच नहीं है। बाज़ार के सर्वग्रासी विस्तार के इस धूसर समय में हो सकता कुछ कविताएं पर्म्यूटेशन-कॉम्बीनेशन की तकनीक से बन रही हों, पर कविता फ़कत पर्म्यूटेशन-कॉम्बीनेशन और शब्दों-भावनाओं को फेंटने-लपेटने का मामला नहीं है। न ही यह कोई दिव्य-अलौकिक किस्म का आसमानी ज्वार है। प्रथमतः और अन्ततः यह अपने समय और समाज के प्रति सच्चे होने का मामला है। यह संवेदनाओं और अनुभूतियों का मामला है और विचार का भी। यह ऐसा स्वप्न है जो तर्क की उपस्थिति में देखा जाता है। हां! यह उपलब्ध भाषिक-सांस्कृतिक उपकरणों के 'आर्टीकुलेशन' के साथ इस्तेमाल का भी मामला है। दिल्ली से दमिश्क और पूर्णिया से पेरिस तक मनुष्य की अनुभूतियां, भावनाएं और संवेग एक जैसे हैं।
व्यक्तिगत सुख-दुख, आशा-निराशा, हर्ष-विषाद तो होते ही हैं, जगत-गति भी सबको व्यापती है। आपने तो फ़िर भी संख्या सौ-पचास गिना दी। हो सकता है संख्या और भी कम हो। पर इसका कोई 'मैथमैटिकल फ़ार्मूला' कभी बन सकेगा मुझे शक है। इसलिए कविता के प्रति 'सिनिकल ऐटीट्यूड' एक तरह से जीवन से असंतोष का ही एक रूप है, बीमार असंतोष का। यह मिल्टन के 'पैराडाइज़ लॉस्ट' के सैटर्न की तरह ईश्वर/आलोचक/सत्ता-प्रतिष्ठान के प्रिय कुछ कवियों की धूर्तता और चालाकी के बरक्स एक प्रकार की 'इंजर्ड मैरिट' का इज़हार भी हो सकता है। पर इस नाते इस समूची विधा पर कोई फ़तवा ज़ारी कर देना एक अहमकाना कदम होगा।
कुछ लोग इतने 'सिनिकल' हो जाते हैं कि उनके लिए जीवन में पवित्र-निर्दोष-निष्पाप या ईमानदारी-देशप्रेम जैसे शब्दों का कोई अर्थ नहीं रह जाता। यह 'सिनिसिज़्म' के सम्प्रदाय में निर्वाण जैसी ही कोई स्थिति होती होगी। पर तब वे कविता के लोकतंत्र के सहृदय सामाजिक होने की योग्यता खो देते हैं। सिनिसिज़्म की कविता से एक दूरी है। अक्सर वह व्यंग्यकारों का औज़ार होता है। शायद यही कारण है कि बहुत कम व्यंग्यकार कविता को ठीक ढंग से सराह पाते हैं, बल्कि ज्यादा 'सिनिसिज़्म' होने पर वे व्यंग्यकार भी निचले दर्ज़े के होते जाते हैं। उनकी अनास्था और उनका द्वेष इस हद तक बढ जाता है कि उन्हें आस्था और भरोसे का कहीं कोई बिंदु दिखाई ही नहीं देता। बस यहीं आकर व्यंग्य सृजनात्मक साहित्य के संसार से अपनी नागरिकता खो देता है। हां! आपकी इस बात से पूरी सहमति है कि कवि वही हो सकता है जिसने जोखिम उठाया हो या जो जोखिम उठाने को तैयार हो। कवि को आलोचक के बाड़े की बकरी नहीं होना चाहिए।

राकेश खंडेलवाल ने कहा है :
कविता को कोई लिबास पहनाने से पहले उसे समझना और जानना जरूरी है। आप जिन सबसे प्रभावित हैं - विनोदजी, धूमिल या मुक्तिबोध या विजेन्द्र, क्या आपने उन्हें और उनकी कविता को समझा है? यदि हाँ तो कपया हमारा भी मार्गदर्शन करें।

अनुनाद सिंह ने कहा है :
"चार-पांच सौ शब्द हैं। ज्यादा से ज्यादा सौ-पचास कोमल अनुभूतियां या भावनाएं हैं।"मुझे तो लगता है कि इन आंकड़ों से जो परम्युटेशन बनेगा, वह भारी-भरकम संख्या होगी। यदि कविता के विरोध का यही आधार है तो ये आधार तो बहुत कमजोर लगता है।

Tuesday 21 August 2007

कविता हमारे समय का सबसे बड़ा फ्रॉड है?

कल संजय तिवारी ने विस्फोटक सवाल उठाया कि क्या भाषा पर साहित्य बोझ है, खासकर हिन्दी में? आज अज़दक ने श्रीलाल शुक्ल की टिप्पणी के ज़रिए हिंदी पाठकों के ज्ञान की कलई उतार दी। तो, मैंने सोचा कि क्यों न बरसों से दबी हुई धारणा को उजागर कर दूं। मुझे पता है कि विद्वान साहित्यकारों को इससे मर्मांतक पीड़ा पहुंचे या न पहुंचे, वो मेरे अज्ञान पर ठठा कर ज़रूर हंसेंगे।
लेकिन यह एक आम हिंदुस्तानी की सोच है, इसलिए इस पर गौर करना ज़रूरी है। मेरी राय में कविता हमारे समय का सबसे बड़ा फ्रॉड है। चार-पांच सौ शब्द हैं। ज्यादा से ज्यादा सौ-पचास कोमल अनुभूतियां या भावनाएं हैं। उन्हीं को फेंटते रहिए। जितने परमुटेशन-कॉम्बिनेशन बन सकते हैं, उतनी कविताएं तैयार हो जाएंगी। आखिरी वाक्य मेरा नहीं, बल्कि नक्सल आंदोलन के बड़े नाम विनोद मिश्रा का है। मैं अस्सी के दशक में कही गई उनकी इस बात से आज भी सहमत हूं। मुझे लगता है कि असल में जो जिंदगी में रिस्क नहीं ले सकता, वह कविता नहीं लिख सकता।
धूमिल के शब्दों में कांख भी ढंकी रही और मुट्ठी भी तनी रहे, ऐसा संभव नहीं है। आज के दौर में जिन्होंने ये जोखिम उठाया है, उन्हीं की कविता कविता है, बाकी सब फ्रॉड है। जब जिंदगी ही सुविधाभोगी अवसरवाद पर टिकी हो तो ताज़ा अनुभूतियों का टोंटा होना लाजिमी है। फिर तो परमुटेशन-कॉम्बिनेशन ही चलता है। हां, ये जरूर है कि जब तक बड़े-बड़े नामवरों का वरदहस्त रहेगा, तब तक कविता में फ्रॉड का कोई अंत नहीं है।

पवार साहेब तो पू-रे युधिष्ठिर निकले!

शरद पवार देश के कृषि मंत्री हैं। देश की कृषि और किसानों को आगे ले जाने का बोझ उनके कंधों पर है। उनके पास भले ही घोषित तौर पर 3.6 करोड़ की संपत्ति हो, लेकिन उनकी बेटी सुप्रिया सुले के परिवार के पास 41.5 करोड़ की संपत्ति है। पवार साहब की पूरी जायदाद का ब्यौरा खोजने में तो वक्त लगेगा। लेकिन महाराष्ट्र की को-ऑपरेटिव लॉबी के वो पुरोधा हैं और अब भी किसान नहीं तो बड़े फार्मर ज़रूर हैं। इसलिए खेती-किसानी का उनका निजी अनुभव है और इसीलिए इस मुद्दे पर वो जो भी बोलते हैं, उसे सच और केवल सच माना जाता है।
उनका लोकसभा क्षेत्र बारामती है जो महाराष्ट्र के पुणे ज़िले में पड़ता है। वहां के लोग इन्हें साहेब कहते हैं। पिछले हफ्ते पवार साहेब पुणे आए तो सार्वजनिक तौर पर उन्होंने घोषित कर दिया कि अब खेती में कुछ नहीं रखा। यह घाटे का धंधा बन गई है और किसानों को जोतना-बोना जोड़कर दूसरे कामों में हाथ आजमाना चाहिए। एक किसान कृषि मंत्री की ईमानदारी तो देखिए कि उन्होंने यह तक नहीं सोचा कि देश की जिस कृषि को आगे बढ़ाने का बोझ उनके कंधों पर है, उसी कृषि के बारे में उसके मुंह से निकली ऐसी बात उनकी साख पर कितना बट्टा लगाएगी। खैर, विपक्षी कयास लगाने लगे कि पवार साहेब के अश्वत्थामा हतो कहने का अगला हिस्सा क्या है। मगर पवार साहेब उस वक्त चुप रहे।
दिल्ली पहुंचे तो इस वाक्य का अधूरा हिस्सा, नरोवा कुंजरोवा उन्होंने कह डाला। बोले, देश के 82 फीसदी किसानों के पास 2.5 एकड़ से कम ज़मीन है। किसानों का गुजारा इत्ती-सी ज़मीन से नहीं हो सकता और उनके लिए रोज़गार के वैकल्पिक साधनों की ज़रूरत है। लेकिन ये हवा (वैक्यूम) में नहीं हो सकता। ज़मीन का अधिग्रहण तो करना ही पड़ेगा। यानी, पवार साहेब, किसानों (द्रोणाचार्य) को मारने के लिए आधे सच का आधा झूठ आपकी जुबान से निकल ही गया।
शरद पवार ने ये बात मंत्रियों के उस समूह की अध्यक्षता करते हुए कही जो स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (सेज़) के लिए भूमि के अधिग्रहण और किसानों के पुनर्वास की नीति तय करने के वास्ते बनाया गया है। असल में तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने शिकायत की थी कि ज्यादा से ज्यादा उपजाऊ ज़मीन कृषि से इतर कामों में लगाई जा रही है। इसी के जवाब में पवार साहेब ने साफ किया कि खेती करने में रखा ही क्या है। विपक्षियों के कयास सही साबित हो गए। शरद पवार खेती के घाटे का सौदा बन जाने के सच का डंका इसलिए पीट रहे हैं ताकि किसान घबरा कर खुद ही राजी-खुशी अपनी ज़मीन उद्योगपतियों को सेज़ बनाने के लिए देने को तैयार हो जाएं।
द्रोणाचार्य वध के लिए महाभारत में सत्यवादी युधिष्ठिर ने ऐसा ही आंशिक सच बोला था। शरद पवार भी आज यही कर रहे हैं। अंतर ये है कि कृष्ण ने धर्म का नाश करनेवाले कौरवों को पराजित करने के लिए युधिष्ठिर से झूठ बुलवाया था, जबकि आज कृषि मंत्री शरद पवार 82 फीसदी किसानों की बोलती बंद कराने के लिए अपने किसान होने की विश्वसीनता का फायदा उठा रहे हैं।

Monday 20 August 2007

चर्चवाले ऐसा क्यों कर रहे हैं?

जब देश भर में मठ, मंदिर, मस्जिद और चर्च हजारों-हज़ार करोड़ का टैक्स बचाने का ज़रिया बने हुए हों, तब ये खबर वाकई चौंकानेवाली है कि भारत का रोमन कैथोलिक चर्च कंपनियों के लिए कर बचाने के डबल टैक्सेशन एवॉयडेंस एग्रीमेंट्स (डीटीएए) रास्ते को बंद करने का देशव्यापी आंदोलन छेड़ने जा रहा है। अभी भारत सरकार ने दुनिया के साठ से ज्यादा देशों के साथ ऐसे समझौते कर रखे हैं। विदेशी कंपनियां इन समझौतों का जमकर फायदा उठाती हैं। इस मामले में सबसे बदनाम देश रहा है मॉरीशस, जहां अपना पंजीकरण दिखाकर तमाम एफआईआई (विदेशी संस्थागत निवेशक) करोड़ों-अरबों की कमाई करने के बावजूद एक धेले का भी टैक्स नहीं देते, न तो भारत में और न ही मॉरीशस में। इसके खिलाफ अदालत का भी दरवाजा खटखटाया जा चुका है।
अब रोमन कैथोलिक चर्च कह रहा है कि कंपनियां इस तरह टैक्स बचाकर अनैतिक काम कर रही हैं, जिन आम लोगों के बल पर वो मुनाफा कमाती हैं, उस मुनाफे पर टैक्स न देकर वो उसी अवाम को उन सुविधाओं से महरूम रख रही है, जो उन्हें टैक्स के पैसे के इस्तेमाल से मिल सकती थीं। इससे पहले एनजीओ को भी चंदा देनेवाली कंपनियों की नीयत पर सवाल उठ चुके हैं। तर्क दिया जाता है कि कंपनियां सामाजिक काम के नाम पर एनजीओ को चंदा देती हैं, लेकिन इस तरीके से वो करोड़ों का टैक्स बचा लेती हैं, जो कायदे से सार्वजनिक कामों पर खर्च किया जाता।
असल में आयकर कानून की धारा 80-जी के तहत पंजीकृत धार्मिक ट्रस्ट, कल्याणकारी संस्थाओं और एनजीओ के नाम पर कंपनियां ही नहीं, आम लोग भी टैक्स चोरी करते हैं। इस बार टैक्स-रिटर्न भरते समय एक बुजुर्ग सीए ने मुझे नुस्खा बताया कि कैसे मैं इन संस्थाओं को चेक से चंदा देकर भारी टैक्स बचा सकता हूं। अगर मैंने किसी चैरिटेबल संस्था के नाम 50,000 रुपए का चेक दिया तो सीए अपना और संस्था का 4-4 % कमीशन काटकर मुझे 46,000 रुपए नकद वापस कर देगा। मुझे इसकी पक्की रसीद दे देगा, जिस पर मैं अपने इनकम-स्लैब के आधार पर टैक्स बचा सकता हूं।
कंपनियां और बड़े व्यापारी मंदिर और धर्मशालाओं के नाम पर कैसे टैक्स बचाते हैं, इसका नमूना आप हरिद्वार या ऋषिकेश जैसे धार्मिक शहरों में जाकर देख सकते हैं। अभी बड़ा मज़ेदार वाकया महाराष्ट्र में सामने आया। राज्य सरकार ने तय किया है कि वो मंदिरों की हज़ारों एकड़ ज़मीन वापस लेकर उसका व्यावसायिक इस्तेमाल करेगी। लेकिन पेंच ये फंसा कि मंदिरों की ज़मीन उनके इष्ट देवता के नाम पर है और इस देवता का ‘पावर ऑफर एटॉर्नी’ कौन है, इसका फैसला कर पाने में घनघोर कानूनी पचड़ा है।
वैसे, टैक्स-चोरी के खिलाफ रोमन कैथोलिक चर्च की पहल वाली खबर में और आगे बढ़ने पर कुछ नए तार जुड़े हुए नज़र आते हैं। पता चला कि ये पहल रोम कैथोलिक चर्च के केंद्र वेटिकन से शुरू हुई है और इसका ऐलान पोप बेनेडिक्ट- XVI करनेवाले हैं। कहा जा रहा है कि पोप बेनेडिक्ट स्विस बैंकों में पैसा रखनेवाले दुनिया भर के नेताओं के खिलाफ भी आवाज़ उठानेवाले हैं। लेकिन कुछ लोग पोप की इस पहल को अमेरिका के राष्ट्रपति चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं। इस समय अमेरिका में टैक्स-चोरी और टैक्स की जन्नत माने जानेवाले देशों के खिलाफ जबरदस्त बहस चल रही है। एक अनुमान के मुताबिक टैक्स की जन्नत बने देशों में अमेरिकियों ने 1500 अरब डॉलर की संपत्ति छिपा रखी है। चलिए अच्छी पहल कहीं से भी हो, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। हो सकता है कि इसी बहाने कंपनियों और नेताओं की काली कमाई पर थोड़ा अंकुश लग जाए।

जिज्ञासा चकरघिन्नी बना देती है इंसान को

ज्वलंत जिज्ञासा और कुतुहलवाला आदमी चीज़ों को उलट-पुलट कर देखता चाहता है। अपनी आंखें वहीं गड़ाता है, जहां लोगों का ध्यान नहीं जाता। वह सामान्यत: ‘नास्तिक’ होता है। केवल धार्मिक अर्थों में ही नहीं, सभी अर्थों में। वह विरोधी और प्रतिरोधी भी हो उठता है। वह सोचने लगता है, निष्कर्ष पर आता है, निष्कर्ष बदल देता है। इसलिए वहां भी हमेशा ‘बिगिनर’ ही होता है। जिज्ञासा उसे नए-नए क्षेत्रों में ले जाती है। इसलिए उन-उन क्षेत्रों में वह नौसिखिया ही रहता है। वह चिरंतन ‘बिगिनर’, ज्ञान का चिरंतन उम्मीदवार, और इसीलिए भौतिक अर्थों में ज़िंदगी में असफल रहता है।
वह भद्र और शिष्ट नहीं हो सकता। भद्रता और शिष्टता के लिए अपनी ही निजता से प्रसन्नता चाहिए, परिस्थिति से अच्छा-खासा सामंजस्य चाहिए। लेकिन जिज्ञासावाला आदमी उस जंगली बच्चे के समान होता है जिसे वस्तु या निज से इतनी अधिक प्रसन्नता अच्छी नहीं लगती। वह आदमी घड़ी के पुर्जे तोड़ना चाहेगा और उन्हें फिर जोड़ना और लगाना चाहेगा। उसकी एक विध्वंसक प्रवृत्ति होती है। उसकी निर्मायक वृत्ति होती है; किंतु निर्मिति दिखे या न दिखे, लोगों को उसकी विध्वसंक प्रवृत्ति पहले दिख जाती है।
जिज्ञासावाला व्यक्ति एक बर्बर और असभ्य मनुष्य होता है। वह आदिम असभ्य मानव की भांति हर एक जड़ी और वनस्पति को चखकर देखना चाहता है। जहरीली वस्तु चखने का खतरा मोल ले लेता है। इस प्रकार वह वनस्पति में खाद्य और अखाद्य का भेद कर उनका वैज्ञानिक विभाजन करता है। और, इसी के पीछे पड़ा रहता है। वह अपना ही दुश्मन होता है। वह अजीब, विचित्र, गंभीर और हास्यास्पद परिस्थिति में फंस जाता है।
इसके बावजूद लोग उसे चाहते हैं। उसकी असफलताएं भयंकर होती हैं। वे प्राणघातक हो सकती हैं। उसका विरोध, प्रतिरोध और बोध अजीब होता है। ऐसे आदमी बहुत थोड़े होते हैं।
नोट - ये मेरी नहीं, किसी बड़े लेखक की लाइनें हैं। जिस तरह लोकगीत के रचनाकार का नाम जानने की ज़रूरत नहीं होती, उसी तरह मैंने भी लेखक का नाम बताने की ज़रूरत नहीं समझी। वैसे हो सकता है आपको लेखक का नाम पता हो। नहीं तो एक जिज्ञासा तो बनी ही रहेगी।

Sunday 19 August 2007

दांत क्यों नहीं ठीक करवा लेते!

मोती जैसे दांत हर किसी को कहां मयस्सर होते हैं। लेकिन कल डेंटिस्ट के यहां बैठा हुआ था तो सामने चिपके पोस्टर से पता चला कि आपके दांत कैसे भी आड़े-तिरछे, काले-पीले, टूटे-बिखरे हों, आप उन्हें सुंदर-सजीला और मोतियों जैसा बन सकते हैं। हां, इसमें थोड़े ज्यादा पैसे ज़रूर लगते हैं। इसे मैं अच्छी तरह जानता हूं क्योंकि इधर मैं अपने दांतों के स्वास्थ्य, स्वच्छता और सौदर्यीकरण अभियान में लगा हुआ हूं। कल डॉक्टर ने खाली नीचे के दांतों की सफाई के 800 रुपए ले लिये। ऊपर-नीचे के पूरे काम के लिए उसने करीब 35,000 रुपए का बजट पेश किया है। शायद इसीलिए विदेश में दांतों के कई तरह इलाज हेल्थ इंश्योरेंस से बाहरखे जाते हैं।
लेकिन जिनके पास अकूत पैसे हैं, वे अपने दांत क्यों खराब रखते हैं? यह सवाल मेरे जेहन में सबसे पहले इफोसिस के चीफ मेंटर एनआर नारायणमूर्ति की तस्वीरों को देखकर उठा। आप भी देखिए उनके नीचे के दांत कैसे फैले-फैले और रिपल्सिव हैं, जैसे लगता है सड़क के किसी बूढ़े भिखारी के दांत हों। नारायणमूर्ति अरबपति हैं। दांत ठीक करवाने पर दस लाख भी लग जाएं तो उनकी जेब पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। फिर भी उनका ध्यान अपने दांतों पर नहीं जा रहा है। क्यों?
अपने दांतों और लुक से लापरवाह रहनेवाले दूसरे जानेमाने उद्योगपति हैं देश में लो-कॉस्ट एयरलाइन की शुरुआत करनेवाले कैप्टन जीआर गोपीनाथ। इनकी भी फोटो देखकर मुझे अजीब-सा लगा। इनके नीचे के सामनेवाले दो दांतों के बीच अच्छा-खासा फासला है जो इनके मुंह खोलने पर साफ नज़र आता है। लेकिन कैप्टन गोपीनाथ डेंटिस्ट के पास जाकर समय और पैसा खर्च करने को तैयार नहीं है। जबकि उनके पास पैसों की कोई कमी नहीं है। अभी एकाध महीने पहले ही उन्हें डेक्कन एयरवेज की बड़ी शेयरधारिता किंगफिशर ग्रुप के मालिक विजय माल्या को बेची है।
इन दोनों के बारे में चलो मान लेते हैं कि आम भारतीय मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से ऊपर उठे हैं। इसलिए कंजूसी की आदत अब भी बरकरार है। लेकिन दुनिया का सबसे अमीर शख्स जब अपने दांतों के प्रति लापरवाह रहता है तो बात मेरे एकदम गले नहीं उतरती। मैं बात कर रहा हूं बिल गेट्स को भी पीछे छोड़ देनेवाले दुनिया के सबसे बड़े अमीर व्यक्ति कार्लोस स्लिम हेलु की। मेक्सिको के टेलिकॉम सेक्टर में सक्रिय उद्योगपति स्लिम को फॉर्च्यून मैगजीन ने इसी 8 अगस्त को दुनिया का सबसे अमीर इंसान माना है। उनके पास खरबों की संपत्ति है। लेकिन ज़रा आप भी उनकी तस्वीर पर मेरी तरह गौर कीजिए। दाहिनीं तरफ ऊपर के माले का पिछला हिस्सा शायद एकदम खाली है और आगे के नमूनों की हालत भी दुरुस्त नहीं है।
मेरा तो इन तीनों से एक ही सवाल है। इतने पैसे होते हुए भी आप लोग अपने बदसूरत दांत ठीक क्यों नहीं करवा रहे?

Friday 17 August 2007

किन बूड़ा किन पाइयां गहरा गोता खाय?

भारतीय शेयर बाज़ार को कोई भंवर नीचे ही नीचे खींचे लिये जा रही है। इसी 24 जुलाई को शेयरों की कीमत को दर्शानेवाला सेनसेक्स 15,869 के शिखर पर था। लेकिन तीन दिन बाद 27 जुलाई से बाज़ार के गिरने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह थमने का नाम नहीं ले रहा। कल मुंबई स्टॉक एक्सचेंज की तीस कंपनियों पर आधारित ये सूचकांक 14,358 पर बंद हुआ था। आज ट्रेडिंग शुरू हुई तो दोपहर 12.15 बजे के आसपास ये 578 अंक और गिरकर 13,780 तक आ गया। बाजार बाद में संभल कर 14,141 अंक पर बंद हुआ, फिर भी आज की गिरावट 216 अंकों की रही। इस तरह बीस दिनों में हुई करीब 2000 अंकों की गिरावट से शेयर बाज़ार में लगी दस फीसदी से ज्यादा पूंजी स्वाहा हो गई है।
बाज़ार में मचे इस हाहाकार की कोई देसी वजह नहीं है। आज ही आंकड़े आए हैं कि बाज़ार और आम उपभोक्ता को परेशान करनेवाली महंगाई की दर 4.45 फीसदी से घटकर 4.05 फीसदी पर आ गई जो बाज़ार की उम्मीद 4.30 फीसदी से भी कम है। इस आधार पर शेयर बाज़ार को चहकना चाहिए था। लेकिन वह तो डूबा ही जा रहा है। इसकी दो खास वजहें हैं और दोनों ही विदेशी हैं। एक, अमेरिका के होमलोन बाज़ार के एक हिस्से में बढ़ता डिफॉल्ट और दो, अमेरिकी डॉलर के सापेक्ष जापानी येन का महंगा होना।
अमेरिकी होमलोन का सालाना बाज़ार करीब 3000 अरब डॉलर का है। इसका 20 फीसदी हिस्सा यानी 600 अरब डॉलर का कारोबार सब-प्राइम कारोबार का है। यही सब-प्राइम कारोबार आज पूरी दुनिया में शेयर बाज़ारों के गिरने का अहम कारण बन गया है। असल में बहुत सारे अमेरिकी ऐसे हैं, जिन्हें अच्छी और स्थाई कमाई नहीं होती। उन्हें होमलोन देने में काफी रिस्क रहता है। अमेरिकी बैंक और होमलोन कंपनियां ऐसे लोगों को बाजार या प्राइम रेट से ज्यादा रेट पर लोन देती हैं। इसे ही सब-प्राइम लोन कहा जाता है। साल 2003 में अमेरिका के हाउसिंग सेक्टर में बूम के हालात थे। सब-प्राइम लोन लेनेवालों की तादाद तेज़ी से बढ़ गई। लेकिन 2004 से 2006 के दौरान अमेरिका में ब्याज दरें काफी बढ़ गईं। अब सब-प्राइम लोन लेनेवालों के लिए ईएमआई चुकाना मुश्किल हो गया। वो डिफॉल्टर होने लगे। फिर हाउसिंग सेक्टर का बूम ज़मीन पर आ गिरा।
डिफॉल्टरों से वापस लिये गए मकानों की कीमत गिर गई। यही दुष्चक्र आज अमेरिका में बैंकों और वित्तीय सस्थाओं के लिए संकट का कारण बन गया है। इनका पैसा विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के जरिए भारत जैसे बाज़ारों में लगा हुआ है। एफआईआई बाज़ार में शेयर बेचकर पैसे निकाल रहे हैं और इस दबाव में बाज़ार गिरता जा रहा है। इसके ऊपर से जब डॉलर के सापेक्ष येन एक साल के सबसे महंगे स्तर पर पहुंच गया तो उन एफआईआई को तगड़ा झटका लगा, जिनके पुराने येन भंडार से अब कम डॉलर मिलने लगे।
ज़ाहिर-सी बात है कि अगर एफआईआई भारतीय शेयर बाज़ार में सक्रिय न होते तो सेनसेक्स में इतनी तगड़ी गिरावट नहीं आती। भारतीय निवेशकों की साढ़े तीन लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम यूं चुटकी बजाते नहीं उड़ जाती। ये कोई मामूली पूंजी नहीं है क्योंकि पूरे देश का इस साल का बजट कुल 6.80 लाख करोड़ रुपए का है और इसके आधे हिस्से से ज्यादा रकम शेयर बाज़ार के गोता खाने से गायब हुई है।
लेकिन जब भारत ने अपने बाज़ार खोलकर ओखली में सिर दे ही दिया है तो मूसल तो पड़ने ही हैं। हम आपको बता दें कि 2003-04 से ही भारत एफआईआई की नज़रों में चढ़ने लगा। उस साल भारतीय शेयर बाज़ार में उनका निवेश एकाएक 17 गुना बढ़ गया। लेकिन इनकी पूंजी का चरित्र ही चंचला है। इसका मकसद पैसे लगाकर सिर्फ और सिर्फ मुनाफा कमाना है। ये आती है और जाती है। इस समय देश में 1042 एफआईआई काम कर रहे हैं। भारतीय शेयरों में इन्होंने अब तक कुल सवा दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश कर रखा है। जाहिर है, इनकी एक उंगली भारतीय शेयर बाज़ार को जब चाहे तब अपने इशारे पर नचा सकती है। कितनी अजीब बात है। पंद्रह साल पहले हमारे शेयर बाज़ार में एक हर्षद मेहता था। अब एक हज़ार से ज़्यादा हर्षद मेहता (एफआईआई) काम रहे हैं और सरकार उनको बराबर खुला आमंत्रण दिए जा रही है।

अर्द्ध-नारीश्वर और सोलमेट की तलाश

भगवान शंकर का एक रूप अर्द्ध-नारीश्वर का भी है, जिसमें शरीर का आधा अंश शिव का है तो आधा पार्वती का। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि महान दार्शनिक प्लैटो ने भी 360 ईसा पूर्व में लिखी अपनी किताब सिम्पोजियम में इसी तरह का मिथ पेश किया है। उसके मुताबिक पृथ्वी पर सभी लोग पहले उभयलिंगी हुआ करते थे। फिर ईश्वर ने उन्हें दो हिस्सों में बांट दिया। उसी के बाद से हर हिस्सा अपने दूसरे हिस्से की तलाश में जुटा हुआ है। वह उस हिस्से की तलाश के लिए दुनिया भर में कहां-कहां नहीं भटकता।
फिर अचानक किसी को देखकर लगता है कि हां, यही है मेरा दूसरा हिस्सा, यही है मेरा सोलमेट और वह उससे मिलने के लिए बेचैन हो उठता है, उसके प्यार में पड़ जाता है। प्लैटो के कहे की असली भावना पर जाएं तो हर किसी का सोलमेट कहीं न कहीं दुनिया में ज़रूर होता है। हो सकता है अपने देश में न हो, किसी पराये मुल्क में हो। हो सकता है वह अपनी भाषा नहीं बोलता हो, कोई और भाषा बोलता हो। लेकिन अगर मान लीजिए कि किसी को उसका सोलमेट मिल जाए तो उसे पहचानेगा कैसे? फिर अगर गलत पहचान हो गई तो! तो क्या आदमी ज़िंदगी भर अपना सोलमेट तलाशने के लिए ट्रायल एंड एरर पद्धति का इस्तेमाल करता रहेगा?
दिक्कत तब होती है कि जब किसी शख्स को अपने शरीर का दूसरा हिस्सा नहीं मिल पाता, सोलमेट नहीं मिल पाता। फिर तो अंतहीन दुख का सिलसिला चलता रहता है। ये भी होता है कि अचानक एक दिन सोलमेट का भ्रम टूट जाता है। सोलमेट के पाने का ये भ्रम जिस पल टूटता है, उस पल कैसी तकलीफ होती होगी, भुक्तभोगी के अलावा किसी और के लिए इसकी कल्पना तक कर पाना मुश्किल है। दोनों ही इंसान फिर नितांत अकेले हो जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे वो पहले थे। अकेले-अकेले की दुनिया में दोनों फिर भंवर में घूमने लगते हैं। एक बार साथ का स्वाद चख लेने के बाद उनकी बेचैनी पहले से कहीं ज्यादा विकट होती है।
मुझे नहीं पता कि अर्द्ध-नारीश्वर की परिकल्पना कहां से आई होगी, या प्लैटो ने भगवान के हाथों उभयलिंगी इंसान को दो हिस्सों में क्यों बंटवाया, लेकिन मैं इतना ज़रूर मानता हूं कि ये दोनों ही धारणाएं प्यार की तलाश को, सोलमेट की तलाश को एक लॉजिक दे देती हैं। एक बात मैंने और देखी है कि महिलाएं सोलमेट को लेकर ज्यादा संवेदनशील होती हैं, बनिस्बत पुरुषों के। इसकी क्या वजह है, इसको समझने के लिए न तो मेरा कोई मनोवैज्ञानिक अध्ययन है और न ही मुझे कोई ऐसा मिथक याद है जो मेरी मदद कर सके...
वैसे पुरुष के साथ ऐसा नहीं होता होगा, ये भी नहीं कहा जा सकता। जयशंकर प्रसाद की कामायनी के मनु श्रद्धा और इड़ा के बीच झूलते हैं। फिर श्रद्धा और इड़ा में से किसी एक के मुंह से बुलवाया गया है...
तुम हो कौन और मैं क्या हूं, इसमें क्या है धरा, सुनो।
मानस-जलधि रहे चिर चुंबित, मेरे क्षितिज उदार बनो।

Thursday 16 August 2007

मजे से दूधो नहाओ, पूतो फलो

चिंता की कोई बात नहीं। ये आशीर्वाद अब बेधड़क दिया जा सकता है। आबादी का बढ़ना अब मुसीबत नहीं, भारत के लिए नेमत है। विकसित देशों की जनसंख्या वृद्धि दर ठहरी हुई है। कहीं-कहीं तो ये घटती जा रही है। जर्मनी में तो ज्यादा बच्चों पर इनसेंटिव दिया जाता है। आठ-दस बच्चे हो गए तो मियां-बीवी को नौकरी करने की कोई ज़रूरत नहीं। बच्चों की परवरिश के लिए सरकार से इतने यूरो मिल जाते हैं कि घर बैठे मौज कीजिए। अमेरिका, यूरोप और जापान से लेकर चीन तक बूढ़ों की तादाद बढ़ रही है, जबकि भारत की आधी से ज्यादा आबादी की उम्र 25 साल से कम है। कितना सुखद आश्चर्य होता है जब हम पाते हैं हमारी आधी से ज्यादा आबादी 1980 के बाद पैदा हुई है।
दुनिया में जो डेमोग्राफिक तब्दीलियां आ रही है, उसमें हालत ये हो गई है कि विकसित देशों के पास तकनीक तो है, लेकिन काम करनेवाले लोग नहीं हैं। एक अनुमान के मुताबिक साल 2020 में दुनिया भर में 4.7 करोड़ कामगारों की कमी होगी, जबकि भारत के पास 4.5 से 5 करोड़ कामगार ज्यादा रहेंगे। अगर हमने ज़रूरी कौशल वाले कामगार तैयार कर लिये तो दुनिया की इस ज़रूरत को पूरा कर सकते हैं।
विदेश में ही नहीं, देश में भी रोज़गार के नए अवसर दस्तक दे रहे हैं। अभी भारतीय आईटी उद्योग की जो विकास दर चल रही है, उसके हिसाब से अगले तीन सालों में देश में रोजगार के एक करोड़ नए अवसर पैदा होंगे। और कहा जाता है कि आईटी उद्योग के हर रोजगार से बाकी अर्थव्यवस्था में चार और नौकरियां पैदा होती हैं। यानी, अगले तीन सालों में रोजगार के कुल पांच करोड़ मौके पैदा होने वाले हैं।
इन बातों को देखकर डंके की चोट पर कहा जा सकता है कि दो सदियों से योजनाकारों से लेकर आम लोगों के दिलोदिमाग में घर बना चुके माल्थस के सिद्धांत के अब परखचे उड़ गए हैं। ब्रिटेन में 1766 में जन्मे राजनीतिक अर्थशास्त्री थॉमस रॉबर्ट माल्थस खुद अपने संपन्न मां-बाप की सात औलादों में छठे नंबर पर थे। आबादी की समस्या उनका प्रिय विषय थी। 1798 में प्रकाशित अपने मशहूर सिद्धांत में उन्होंने कहा था कि आबादी की दर ज्यामितीय गति से बढ़ती है, जबकि खाद्यान्न उत्पादन अंकगणितीय दर से बढ़ता है। इसलिए आबादी की रफ्तार रोकी नहीं गई तो एक दिन खाद्यान्न की आपूर्ति इतनी घट जाएगी कि पूरी मानव जाति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
माल्थस ने 19वीं सदी में ही ऐसा होने का अंदेशा जताया था। लेकिन रासायनिक उर्वरकों से लेकर कई अन्य वजहों से उत्पादकता में भारी वृद्धि हुई और उनकी ये भविष्यवाणी गलत साबित हो गई। मगर चार्ल्स डारविन जैसे विकासवादियों से लेकर एडम स्मिथ और डेविड रिकार्डो जैसे अर्थशास्त्री माल्थस के सिद्धांत के मुरीद बने रहे। आज भी हमारे नेताओं से लेकर आम लोग तक कहते रहते हैं कि भारत के लिए सबसे बड़ी समस्या आबादी की है। संसाधन कितने भी बढ़ा लिये जाएं, बढ़ती आबादी उन्हें निगल जाएगी। वो ये नहीं देखते कि भारत में गरीबी रेखा से नीचे रह रही करीब 30 करोड़ की आबादी संसाधनों पर कोई बोझ नहीं डालती। एक आदमी के संसाधन में ऐसे दस-बीस लोग गुजारा करते हैं। फिर वो देश के संसाधनों पर बोझ कैसे हो गए?
पहले उपनिवेशों में आबादी का पलायन हुआ तो अब ग्लोबलाइजेशन के दौर में काबिल लोगों के लिए देशों की सीमाएं खत्म हो गई हैं। अगर आज अमेरिका या यूरोप में भारत जैसे विकासशील देशों के छात्रों और प्रोफेशनल्स को वीसा में छूट दी जा रही है, तो ये उनकी कोई कृपा नहीं, मजबूरी है। जिस तरह वायुमंडल में किसी जगह दबाव कम हो जाने पर दूसरी जगह की हवाएं उस दिशा में चक्रवात की तरह बढ़ती हैं, आबादी का वैसा ही चक्रवात अब विकासशील और गरीब देशों से विकसित और अमीर देशों की तरफ चलनेवाला है। और, इसमें नुकसान किसी का नहीं, सबका फायदा है।

अंश भर अमरत्व की आस

अमरत्व किसे नहीं चाहिए। वैज्ञानिक खोज में लगे हैं कि इंसान को कैसे अजर-अमर बनाया जा सकता है। कोई जब बताता है कि हिमालय की कंदाराओं में उसके कोई गुरु 500 सालों से तपस्या कर रहे हैं तो सुनकर बड़ा अचंभा होता है और कुतूहल भी। फिर, आम इंसान यह सोचकर तसल्ली कर लेता है कि चलो आत्मा तो अमर है। हम नहीं रहेंगे, मगर हमारी आत्मा तो रहेगी। वह सर्वदृष्टा है। सब कुछ देखती रहेगी। अमरता की इस अटूट चाहत का केंद्रीय भाव यही है कि हम बने रहें। जिंदा रहें तो लोग जानें-पहचानें और मर गए तब भी दुनिया हमें याद रखे।
मैं अभी इसी अमरत्व की बात कर रहा हूं। गौतम बुद्ध अमर हो गए। कबीर अमर हो गए। महात्मा गांधी अमर हो गए। भगत सिंह अमर हो गए। इसलिए नहीं कि उनकी आत्मा जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर परमात्मा के साथ मिलकर अब भी यहीं कहीं चक्कर काटती है। बल्कि इसलिए लाखों-करोड़ों लोग अब भी उनको याद करते हैं। दूसरों के दिमाग में जगह बनाना ही अमरता है। अमिताभ बच्चन जीते जी अमर हो गए हैं। मायावती तो जिंदा रहते अपनी मूर्तियां लगवा रही हैं ताकि लोग उन्हें याद रखें।
वैसे, यह अमरता बड़ी सांसारिक किस्म की चीज़ है। और हर कोई इसे थोड़ा कम या ज्यादा हासिल ही कर सकता है। शायद ही कोई होगा जिसके भीतर नौजवानी की दहलीज़ पर कदम रखते वक्त ये विचार न आया हो।
बताते हैं कि किसी यूरोपीय शहर में एक मेयर हुआ करता था। उसने अपने घर में एक खुला हुआ ताबूत बनवा रखा था। वह जब बहुत प्रसन्नचित्त और संतुष्ट होता तो जाकर इसी ताबूत में लेट जाता और अपने जनाजे के निकलने की कल्पना करता। वह यही सोच-सोचकर मगन हो जाता कि कितने सारे लोग उसकी कितनी ज्यादा याद कर रहे हैं, उनके न होने से कितने दुखी हैं, उसकी कितनी कमी महसूस कर रहे हैं। ताबूत में बिताए ये पल उसकी ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत लम्हे हुआ करते थे। वह अपने लिए लोगों के रोने की कल्पना कर जीते-जीते अमरत्व में चला जाता था।
जाहिर है, अमरत्व के मामले में सभी लोग बराबर नहीं होते। छोटी या तुच्छ अमरता वो होती है जिसमें आपके हित-मित्र जान-पहचान वाले आपको याद रखते है। जबकि महान अमरता वो होती है जब वे लोग भी आपको याद रखते हैं जो आपको निजी तौर पर नहीं जानते। ज़िंदगी के कुछ ऐसे रास्ते होते हैं जिनमें एकदम शुरुआत से ही इस महान अमरता को हासिल करने की संभावना रहती है। हां, इसे पाना मुश्किल तो होता है, लेकिन इसे एक सिरे से नकारा नहीं जा सकता। कला, लेखन और राजनीति महान अमरत्व हासिल करने के ऐसे ही कुछ रास्ते हैं।
विचार स्रोत : मिलान कुंदेरा का उपन्यास - इममॉरटैलिटी

Wednesday 15 August 2007

उर्दू में लिखा हुआ पढ़ते हैं मनमोहन

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आज आज़ादी की 60वीं सालगिरह पर लाल किले की प्राचीर से बहुत सारी अच्छी-अच्छी बातें कीं। कुछ पुरानी घोषणाएं दोहराईं, कुछ नई घोषणाएं कीं। जैसे अनाज उत्पादन बढ़ाने के लिए खेती में 25,000 करोड़ रुपए लगाए जाएंगे। पांच नए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च, आठ नए आईआईटी, सात नए आईआईएम, 20 नए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और 1600 नए आईटीआई खोले जाएंगे। सरकार सुनिश्चित करेगी कि हर साल एक करोड़ छात्रों को वोकेशनल ट्रेनिंग दी जाए। लेकिन जब सुबह मैं उन्हे भाषण देते देख रहा था तो मेरी नज़र के कैमरे ने वह सीन कैद कर लिया, जब वे अपने लिखित भाषण के पन्ने बाएं से दाएं नहीं, बल्कि दाएं से बाएं की तरफ पलट रहे थे और उनका भाषण हिंदी या अंग्रेजी में नहीं, बल्कि उर्दू में लिखा हुआ था।
मेरा ध्यान मनमोहन सिंह की बातों से हट गया। मेरे जेहन में बचपन की बातें तैरनी लगीं। कैसे मेरे बाबूजी ने अलिफ-बे जैसे कई अक्षर सिखाने की कोशिश की थी। उनकी शुरुआती पढ़ाई उर्दू में ही हुई थी। मेरी बुआ ने भी मिडिल तक उर्दू में ही पढ़ा था। ये भी याद आया कि हमारे अवध के इलाके में आजी सलाम, बुआ सलाम, बड़की माई सलाम बोला जाता रहा है। यूनिवर्सिटी के दिनों में मेरे पहले राजनीतिक गुरु ने भी मुझे लंबा चौड़ा प्रवचन दिया था कि कैसे मूल भाषा हिंदवी या हिंदुस्तानी ही है। उन्होंने मुझे अमीर खुसरो का लागा चुनरी में दाग गाना गाकर सुनाया था।
इसके बाद उन्होंने मुझे रामविलास शर्मा से लेकर महात्मा गांधी तक के लेख पढ़ने को दिए। धीरे-धीरे मेरे मन में ये बात बैठ गई कि असल में हिंदी-उर्दू का विवाद बंटवारे की राजनीति की देन है और आम जिंदगी में फर्क है तो बस लिपियों का, लिखने के तरीकों का। हिंदी और उर्दू एक ही भाषा को इस्तेमाल करने के दो अलग-अलग तरीके हैं। उर्दू फारसी-अरबी लिपि में लिखी जाती है जिसे नस्तालिक़ कहते हैं, जबकि हिंदी देवनागरी में लिखी जाती है। कुछ जानकार लोगों ने मुझे बताया कि हिंदी-उर्दू का फर्क वैसा ही है, जैसे ब्रिटेन और अमेरिका की अंग्रेज़ी में होता है।
महात्मा गांधी ने तो यहां तक कहा था कि अगर हिंदी-उर्दू के फर्क को मिटाकर इसे एक भाषा मान लिया जाए तो आज़ाद होने पर भारत में अंग्रेजी का साम्राज्य खत्म किया जा सकता है। लेकिन विभाजन और नफरत की राजनीति ने भाषा का भी इस्तेमाल कर डाला। मगर इस हकीकत को कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता कि उर्दू हिंदुस्तान से पैदा हुई भाषा है। भारतीय उपमहाद्वीप में कम से कम 20 करोड़ लोग इसे रोजमर्रा की ज़िंदगी में इस्तेमाल करते हैं।
अच्छी बात ये है कि हमारे प्रधानमंत्री उस अवाम का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसके जेहन में अब भी उर्दू और हिंदी में कोई फर्क नहीं है। अंत में मैं हिंदुस्तानी भाषा और अवाम की बेहतरी की उम्मीद के साथ अल्लामा इक़बाल का ये मशहूर शेर दोहराना चाहता हूं कि...
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे ज़मां हमारा।।

आधा तीतर, आधा बटेर तो कभी मुर्गा छाप पटाखे

इस समय देश की आधी-सी ज्यादा आबादी की उम्र 25 साल से कम है। इसी नौजवान पीढ़ी के एक प्रतिनिधि हैं मेरे सहकर्मी आदर्श कुमार। आज़ादी की साठवीं सालगिरह वो थोड़ा भावुक हुए तो काफी हद तक यथार्थपरक भी रहे। उन्होंने अपने संदेश में हमारी राजनीति की परत-परत दर खोलकर देखी है। संदेश बड़ा था, इसलिए उसे संपादित करके पेश कर रहा हूं।

जिंदगी के 25 पतझड़-सावन-बसंत-बहार बीत चुके हैं, या यूं कहें कि मैंने अपनी उम्र की रजत जयंती मना ली है। ये पच्चीसवां पंद्रह अगस्त है, जो मेरी जिंदगी में आया है। इस पंद्रह अगस्त का कभी मुझे बेसब्री से इंतजार रहता था।
बात सन् 1987 की है, पांच साल का मासूम था। पहली अगस्त से ही मेरे स्कूल में पंद्रह अगस्त की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। तब मैं भी देशभक्ति गीतों के रियाज और क्रांतिकारी नारे लगाने में मशगूल हो जाता, एकिक नियम जाए तेल बेचने। मैं अपने स्कूल में सबसे ज्यादा जोर से इंकलाब-जिंदाबाद के नारे लगाता था। वक्त बीतता गया। इसकी गूंज रूह में समाती चली गई। पारिवारिक माहौल राजनीतिक था, धीरे-धीरे देश की दिशा-दशा समझने लगा था।
उन दिनों राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, उनके बारे में एक चुटकुला उन दिनों बेहद लोकप्रिय हुआ था। राजीव गांधी किसी सब्जी की दुकान पर गए। दुकान पर हरी और लाल दोनों तरह की मिर्च के ढे़र थे। राजीव गांधी ने दोनों तरह की मिर्च की कीमत पूछी। जब उन्हें मालूम हुआ कि लाल मिर्च ज्यादा महंगी है तो उन्होंने कहा कि लोग फिर लाल मिर्च ही क्यों नहीं उगाते, ताकि उन्हें ज्यादा कीमत हासिल हो। मामला परवरिश का था।
हमारे देश की परवरिश भी इन 60 सालों में जिनके जिम्मे थी, वो कितना भला कर पाए, इसका जवाब अगर ढूंढना हो तो गांवों में घूम आइए। बिना सवाल पूछे आपको खुद-ब-खुद जवाब मिल जाएगा। साथ ही आप लौटेंगे एक और सवाल के साथ कि हमें क्या मिला?
जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे करिश्माई छवि वाले प्रधानमंत्रियों ने इस देश के लिए अपने माथे पर कितने बल लिये, इसे कंचनी कसौटी पर कसने के लिए किताबों और पत्र-पत्रिकाओं के संदर्भों की बजाय हकीकत की जमीन तलाशने की ज्यादा जरूरत है।
1929 में लाहौर में रावी नदी के तट पर हुए कांग्रेस अधिवेशन में जब गांधी जी ने पंडित जवाहर लाल नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया था, उसी समय से गांधी जी नेहरू की नेतृत्व क्षमता में विश्वास करने लगे थे। हालांकि नेहरू जी 1919 से ही चर्चा में आ गए थे, जब वो अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव पद पर नियुक्त हुए थे। कालांतर में प्रेस की आजादी के पक्षधर नेहरु ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया और ग्लिम्पसेज ऑफ द वर्ल्ड हिस्ट्री जैसी किताबें लिखकर अपनी कलम का भी लोहा मनवा लिया। इसमें कोई शक नहीं कि उन्होंने राजनीतिक आदर्शवाद की नींव रखी, हमारे स्वाभिमान को आवाज दी, लेकिन उतना ही कड़वा सच ये भी है कि वो जमीनी विकास की बजाए विचारों की भूल-भूलैया में भटकते रहे।
बाद में चलकर उनकी सुपुत्री इंदिरा गांधी ने ही उनके स्थापित किए हुए राजनीतिक मूल्यों की तिलांजलि दे दी। वैज्ञानिकता और व्यावहारिकता की कसौटी पर नेहरू के उन सिद्धांतों को इंदिरा जी ने परखा और अपनी सूझ-बूझ का इस्तेमाल करते हुए कुछ हद तक स्थितियों को बदलने की कोशिश की। गरीबी कितनी दूर हुई, ये अलग बात है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि गांवों के लोगों के लिए वो एक महान और मजबूत नेता थीं। लोक-लुभावन राजनीति की शुरुआत का श्रेय उन्हें ही जाता है।
राजीव गांधी की आलोचना के लिए बहुत वाकये पेश किए जा सकते हैं, लेकिन तकनीकी रूप से उन्होंने भारत को बेहद समृद्ध किया। विज्ञान और तकनीक में उनकी दिलचस्पी ने हमारे राष्ट्र को तरक्की के लिए एक ठोस बुनियाद दी।
विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब 1987 में राजीव गांधी और उनके परिवार वालों पर बोफोर्स मामले में आरोप लगाना शुरू किया, तब वो अचानक चर्चा में आए और जब अगस्त, 1990 में प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशों पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी, तब वो पिछड़े वर्गों के लिए मसीहा बनकर उभरे। उनके इस योगदान के लिए पिछड़ी और अनुसूचित जातियां-जनजातियां हमेशा याद रखेंगी। उन दिनों उनकी लोकप्रियता मुर्गा छाप पटाखे की तरह बम बम थी।
फिर ठीक तीन महीने बाद आडवाणी जी ने भी हाथों में कमंडल लिया और चल पड़े राम रथ लेकर। लालू यादव ने जब बिहार में उनके रथ का चक्का पंक्चर किया तो आडवाणी ने वी पी सिंह से समर्थन खींच लिया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। मंडल का जादू चल निकला, उसका फायदा वी पी सिंह को भले ही ना हुआ हो लेकिन क्षेत्रीय नेताओं ने मंडल के नाम पर खूब मलाई काटी।
अटल बिहारी वाजपेयी मुझे हमेशा एक दिग्भ्रमित नेता लगे...गीत नया गाता हूं...गीत नहीं गाता हूं....उन पर टीका-टिप्पणी करना मैं वक्त की बर्बादी समझता हूं। सिर्फ एक बात के लिए थोड़ी दाद देना चाहूंगा कि 1977 में जब वो जनता पार्टी की सरकार में विदेश मंत्री के पद पर सुशोभित थे, उसी दरम्यान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने अपनी मातृभाषा हिंदी में भाषण दिया था। हिंदी के माथे पर चंद लम्हों के लिए बिंदी की चमक बिखेर दी।
मनमोहन सिंह को मैं करिश्माई छवि का प्रधानमंत्री नहीं मानता। उन्हें नॉन प्राइम मिनिस्टर कहने वालों की भी कमी नहीं है। मुझे उनकी काबिलियत और उनकी योजनाओं पर कतई संदेह नहीं हैं लेकिन उनके कार्यों का विश्लेषण अभी करना जल्दबाजी होगी। भारत में आर्थिक सुधारों की नींव डालनेवाले के तौर पर उन्हें याद किया जा सकता है।
कांग्रेस ने आजाद भारत में सबसे अधिक करीब साढ़े चार दशकों तक राज किया। आजादी के छह दशक बीत चुके हैं, जो लोग उनके हर कदम पर हमदम थे, उन्हें भी अब ये बात समझ आ गई है कि कांग्रेस पार्टी ने उनके बाल उल्टे छुरे से मुंड़ लिये हैं।
मार्क्स को जिन लोगों ने पढा है, उन्हें बताने की कोई जरूरत नहीं कि बुद्धदेव भट्टाचार्य जैसे वामपंथियों का उनसे क्या नाता है? सबसे ज्यादा पढे-लिखे नेताओं का दंभ भरनेवाली वामपंथी पार्टियां किस तरह राजनीतिक शक्तियों का दुरुपयोग करती है, ये अब हंसुआ-हथौ़ड़े चलानेवाले भी समझने लगे हैं।
आधा तीतर, आधा बटेर यानी खिचड़ीफरोश राजनीति ने भारतीय शासन व्यवस्था का कबाड़ा कर दिया है। हर पार्टी में अपनी डफली, अपना राग का चलन है। नेता अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं के लिए पार्टी की बखिया उघेड़ने में एक पल की भी देर नहीं लगाते।
बड़े दिनों बाद जब पापा से कुछ बहस हुई तो उन्होंने सवाल दागा कि तुमने अपनी निजी जिंदगी में इतने दिनों में क्या किया? जवाब देना पड़ा- मैंने धीमे आवाज में अपनी पांच खास उपलब्धियां गिना दीं- दिल्ली विश्वविद्यालय से गोल्ड मेडल, हिंदी अकादमी का लेखन के लिए अवार्ड, शीला दीक्षित द्वारा दिया गया बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड, देहमुक्ति की अवधारणा और हिंदी फिल्में - विषय पर शोधकार्य और बारहवीं कक्षा में विज्ञान विषय के साथ जिला में प्रथम और बिहार में तृतीय स्थान।
मेरा पेशा मेरे लिए बहुत कुछ है, उनके लिए बस मेरे जीवनयापन का जरिया। इसे वो उपलब्धि नहीं मानते। हां, मीडिया द्वारा समय-समय पर उठाए गए कुछ कदमों की तारीफ वो दिल खोलकर करते हैं, खैर..!
उनका जवाब था कि तुम्हारी इन उपलब्धियों से मुझे तो गर्व हो सकता है, समाज शायद उस हद तक गौरवान्वित ना महसूस करे। देश के लिए दलीलें देना आसान है, कुछ करना बेहद मुश्किल..देश के लिए तुमने क्या किया या फिर कभी कुछ कर पाओगे, इसका भरोसा तुम्हें है?
सवाल स्वाभाविक ही था लेकिन सच पूछिए तो मैं हिल गया। उन्होंने पूरी जिंदगी समाज के लोगों के बारे में सोचने-विचारने और समय-समय पर उनकी यथासंभव मदद करने में गुजार दी। खुद के लिए कभी सोचा ही नहीं। क्या मैं कभी देश के लिए या फिर अपने समाज के लिए ही सही, एक तिनके का भी योगदान कर पाऊंगा? जवाब जो भी हो लेकिन इस सवाल ने मुझे चीरकर रख दिया है। मैं अरसे बाद जुबान से ना सही लेखनी के जरिये ही आप सभी लोगों के साथ एक बार आवाज लगाना चाहता हूं – इंकलाब, जिंदाबाद...
मुझे इस पल गजानन माघव ‘मुक्तिबोध’ की ये पंक्तियां याद आ रही है -
तस्वीरें बनाने की इच्छा अभी बाकी हैं
जिंदगी भूरी ही नहीं, वह खाकी है
जमाने ने नगर के कंधे पर हाथ रख कह दिया साफ-साफ
पैरों के नखों से, या डंडे की नोंक से
धरती की धूल में भी रेखा खींचकर तस्वीर बनती है
बशर्ते कि जिंदगी को चित्र-सी बनाने का चाव हो
श्रद्धा हो, भाव हो..!

क्या तरक्की है हाउसवाइफ की!

दो दिन पहले मेरी वाइफ-हाउसवाइफ को ऐसी सूचना हाथ लग गई कि उनकी खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं रहा। क्यों और कैसे, आप खुद सुन लीजिए उन्हीं की जुबानी...

आज मैंने अर्द्धांगिनी होने के नाते इनका ब्लॉग हथिया लिया है, एक ख़ास ऐलान करने के लिए। आज मारे खुशी के मैं गदगद हूं। मुझे बिन मांगे एक ऐसी पदवी मिल गई है जो अपने यहां खूब नंबर लाकर, लाखों खर्च करने के बाद ही हासिल होती है। मन कर रहा है कि नए कपड़े पहन काला टोप सिर पर रख डिग्री लेने पहुंच जाऊं। पतिदेव ने बड़े सुन्दर-सुन्दर नामों से पुकारा है। बच्चों ने कई नए प्यारे नाम गढ़े हैं। मां-बाप ने भी खूब लाड़ से बुलाया है। पर अब सब के सब मात खा गए। ऐसा सम्मान कभी किसी ने, वह भी बिना गरज के नहीं दिया भाई।
पहले तो हम सिर्फ पत्नी (वाइफ) हुआ करती थीं। फिर घर की पत्नी (हाउसवाइफ) बन गईं। आगे बढ़कर हमने घर बनानेवाली (होममेकर) की पदवी हासिल की। और अब हमने छलांग लगा ली है। ऐसी तकनीकी तरक्की की उम्मीद भी हमने नहीं की थी।
अरे! अब हमें घरेलू इंजीनियर (डोमेस्टिक इंजीनियर) कहकर नहीं पुकारा तो बेलन ज़रूर खाएंगे। भाषाई पुलिस को कोटि-कोटि धन्यवाद।
Newspeak के अनुसार भाषाई पुलिस ने पोलिटिकली करेक्ट बनने के चक्कर में हमारे हिंदी अफसरों को भी मात दे दी है। कुछ और नमूने –
Ugly woman- plain jane नहीं visually challenging
Handicaped – physically challenged नहीं handicapable
Broken home – dysfunctional family
Psycho – pathologically high spirited


हींग(हर्र) लगे न फिटकरी। देख रहे हैं फिर भी कैसा चोखा रंग आ रहा है, कैसी उन्नति हो रही है!

Tuesday 14 August 2007

भारत में एक अदद भारतीय की खोज

मेरे अभिन्न मित्र और सहकर्मी राजेश कुमार ने स्वतंत्रता दिवस की शुभकामना देते हुए एक विडंबना से परिचित कराया है कि भारत में सभी मिल जाते हैं, लेकिन एक अदद भारतीय ही नहीं मिलता।भारत यात्रा कर वापस लंदन पहुंचे यात्रियों से लोगों ने भारत के बारे में जानना चाहा। एक सवाल के जबाब में एक यात्री ने बताया कि भारत में जितने लोग भी मिले उनमें बिहारी, पंजाबी, मराठी, मद्रासी सभी मिले। हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई के अलावा दर्जनों जातियों के लोग भी मिले, लेकिन कोई भारतीय नहीं मिला। एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि थोड़े से धन के बल पर भारत में अस्थिरता पैदा करना आसान है। यात्रियों की बातें सच लग रही है। क्या इसी दिन के लिए आजा़दी मिली थी? फिर भी सभी लोगों को स्वतंत्रता दिवस की शुभ कामनाएं। सकारात्मक सोच हार को जीत में बदल देती है।

फट सकती है नोकिया की बैटरी!

आज जब मैंने न्यूज चैनलों पर खबर देखी कि नोकिया मोबाइल फोन में बैटरी चार्ज करते समय विस्फोट हो सकता है तो मैं हड़बड़ा गया। बताया गया कि ये विस्फोट बीएल-5सी सीरीज की बैटरियों में हो सकता है। मैंने फौरन अपने मोबाइल की बैटरी खोलकर देखी तो उस पर बीएल-5सी ही लिखा हुआ था। मैं थोड़ा परेशान हो गया। फिर नोकिया के प्रवक्ता ने बताया कि विस्फोट का खतरा उन्हीं बैटरियों में है जो दिसंबर 2005 से नवंबर 2006 में बनाई गई हैं। ये जानकर मुझे थोड़ी तसल्ली हुई क्योंकि मैंने अपना मोबाइल सेट नवंबर 2004 में खरीदा था।
धीरे-धीरे खबर साफ हुई तो पता चला कि इस बीएल-5सी सीरीज की 30 करोड़ बैटरियां जापान की मात्सुशिता बैटरी इंडस्ट्रियल कंपनी ने बनाई थी। लेकिन नोकिया के मुताबिक समस्या केवल 4.60 करोड़ बैटरियों के साथ हैं और वह दुनिया भर में इसे बदलने को तैयार है।
इन बैटरियों के साथ समस्या ओवरहीटिंग की है। चार्ज करने के दौरान इसमें शॉर्ट सर्किट से धमाका हो सकता है। दिक्कत ये है कि इस सीरीज की बैटरियां नोकिया-1100 के सस्ते सेट से लेकर एन-91 और ई-60 जैसे महंगे सेटों तक में इस्तेमाल की जाती हैं। हाल ही भारत में इस तरह का एक विस्फोट भी हो चुका है। पूरी दुनिया में लगभग 100 ऐसे हादसे हो चुके हैं। सवाल उठता है कि दो साल पहले बनाई गई बैटरियां जब समस्याग्रस्त थीं, तो नोकिया का क्वालिटी कंट्रोल विभाग कर क्या रहा था?
मूलत: फिनलैंड की कंपनी नोकिया पूरी दुनिया में मोबाइल सेटों की सबसे बड़ी निर्माता है। क्या उससे यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए थी कि वह उपभोक्ता के हितों का ध्यान रखती? आखिर हादसे हो जाने के बाद ही उसकी नींद क्यों टूटी? सवाल ये भी उठता है कि साल 2006 में नोकिया ने 34.7 करोड़ मोबाइल सेट बेचे हैं, फिर हम कैसे मान लें कि केवल 4.6 करोड़ बैटरियों में ही समस्या है, जिन्हें बदलने की पेशकश की जा रही है?

भाषा एक पहचान है और एक परदा भी

जो लोग भाषा की शुद्धता को लेकर परेशान रहते हैं, शब्दों की व्युत्पत्ति के चक्कर में पड़े रहते हैं, पता नहीं क्यों मुझे उनकी बात जमती नहीं। हो सकता है ये मेरा देहाती नज़रिया हो। लेकिन मुझे इतना जरूर लगता है कि ज़िंदगी जैसे भाषा को उड़ाए, उसे उड़ने देना चाहिए। बीती रात लोकल से घर आते हुए मैंने पाया कि 18-20 साल का एक बेहद सामान्य पृष्ठभूमि का लड़का सीट पर बैठकर अंग्रेज़ी में कोई मोटी किताब खूब डूब कर पढ़ रहा था। मैंने ये भी देखा है कि मुंबई में आम लोग भी अंग्रेज़ी में बात करते हैं। अंग्रेजी मुंबई में आम पढ़े-लिखे लोगों की भाषा बन गई है, जबकि दिल्ली या उत्तर प्रदेश में ये ज्यादातर लोगों के लिए रौब झाड़ने की भाषा है।
अंग्रेज़ आए। दो सौ साल भारत पर राज किया। लेकिन अंग्रेज़ी अगर यहीं रह गई तो इसमें अनैतिक क्या है। अगर आज चंद्रभान प्रसाद दलितों के बच्चों को अंग्रेज़ी में पांरगत होने की सलाह देते हैं तो इसमें गलत क्या है। अगर आगे बढ़ने के लिए अंग्रेज़ी एक जरूरी शर्त बन गई है तो लोगों को अंग्रेज़ी सीखने से कैसे रोका जा सकता है। अगर आज ज़िंदगी में विकास के लिए भ्रष्टाचार ज़रूरी हो गया है तो लोग भ्रष्टाचार करेंगे। अगर आपको भ्रष्टाचार खत्म करना है तो विकास की शर्तें बदल दीजिए। लोग अपने आप धीरे-धीरे ईमानदार होने लगेंगे। भाषा पर भी यही बात लागू होती है। वैसे भी हिंदी एक ओढ़ी हुई भाषा है। असली भाषा तो हिंदवी या हिंदुस्तानी है, जिसे अरबी-फारसी के शब्द मिलाकर उर्दू बना दिया गया और संस्कृत के तत्सम शब्द ठूंस कर हिंदी बना दिया गया।
यहां एक बात और। उत्तर भारत की बोलचाल और सोच की भाषा हिंदी कभी मिट ही नहीं सकती। अगर ऐसा होता तो बिल गेट्स हिंदी में विंडोज़ नहीं लाता। गूगल हिंदी की ऐसी सेवा नहीं करता। एक मजेदार हकीकत का अहसास मुझे जर्मनी में रहने के दौरान हुआ था। मेरे एक पाकिस्तानी मित्र थे शकील भाई। वे किसी जर्मन को देखकर मां-बहन की शुद्ध गालियां देना शुरू कर देते थे। मैंने कहा – शकील भाई कोई समझ लेगा तो? बोले – उसे फौरन गले लगा लेंगे। कहेंगे – अरे इस परदेस में अपना भाई कहां से मिल गया। हम लोग आपस में मज़े से नितांत निजी बातें हिंदी-उर्दू में करते रहते। हमें पता था कि बगल वाले की समझ में कुछ नहीं आएगा।
तभी मुझे अहसास हुआ कि भाषा कितने बड़े परदे का काम करती है। दो तमिल या मलयाली बगल में बैठे कुछ बातें कर रहे हों, हमें क्या पता चलेगा। हां, ये अलग बात है कि हंसने की, रोने की, दुखी होने की भाषा सारी दुनिया में एक ही होती है। इसलिए गम और खुशी बांटना बहुत आसान है। ये भाषा हम न भूलें, बाकी भाषा तो जो आज है वो कल नहीं रहेगी। अंग्रेजी में जर्मन से लेकर फ्रेंच और हिंदी शब्द तक जगह बना चुके हैं। फिर हिंदी कैसे शुद्ध रह सकती है। जिंदगी का बहाव शब्दों को कहां का कहां पहुंचा देगा, इसे प्रवाह तय करेगा, हम या कोई बुद्धिजीवी, साहित्यकार या सरकारी अफसर नहीं।

Monday 13 August 2007

क्क्क...कितनी कमीनी कपनियां हैं ये!

मैं उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार की नीतियों का समर्थक नहीं हूं। इसकी तस्दीक आप मेरे पुराने लेखों से कर सकते हैं। न ही मैं कॉरपोरेट सेक्टर का विरोधी हूं क्योंकि दुनिया भर में पूंजीवाद ने लोकतंत्र की स्थापना में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। लेकिन मायावती सरकार की नई प्रस्तावित आरक्षण नीति पर कुछ उद्योग संगठनों ने जैसी प्रतिक्रिया दिखाई है, उससे मुझ जैसे शख्स के मुंह से भी गालियां निकल रही हैं। भारतीय उद्योग संगठनों के इन प्रतिनिधियों का कहना है कि अगर मायावती सरकार ने आरक्षण लागू करने के लिए मजबूर किया तो निजी कंपनियां उत्तर प्रदेश को छोड़कर दूसरे राज्यों में चली जाएंगी।
पहली बात मायावती ने निजी क्षेत्र में आरक्षण की जो पहल की है, वह बाध्यकारी नहीं, बल्कि स्वैच्छिक है। जो भी कंपनियां नई यूनिट के लिए सरकार से सस्ती ज़मीन, ग्रांट या दूसरी किस्म की सहायता लेती हैं, उन्हें इसके एवज में नौकरियों में गरीब तबकों के लिए 30 फीसदी आरक्षण रखना होगा। इसमें से 10 फीसदी आरक्षण अनुसूचित जातियो, 10 फीसदी आरक्षण ओबीसी और पिछड़े धार्मिक अल्पसंख्यकों और बाकी 10 फीसदी आरक्षण आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्णों के लिए है। अगर कोई कंपनी सरकारी छूट नहीं चाहती है तो वह इस आरक्षण को न लागू करने के लिए पूरी तरह आज़ाद है।
फिर इन कंपनियों को किस बात पर एतराज़ है? दोनों हाथों में लड्डू तो नहीं चल सकता। आप पब्लिक की कमाई से चलनेवाली सरकार से छूट भी पाना चाहते हैं और पब्लिक को ही ठेंगा दिखाना चाहते हैं! ऐसा कैसे चल सकता है? देश आजादी की साठवीं सालगिरह बना रहा है तो हमें ये भी याद कर लेना चाहिए कि हमारे निजी उद्योगों का शुरू से ही चरित्र मलाई खाने का रहा है।
आज़ादी से पहले और दूसरे विश्व युद्ध के फौरन बाद 1944-45 में जेआरडी टाटा, जीडी बिड़ला, श्रीराम, कस्तूरभाई लालभाई, एडी श्रॉफ और जॉन मथाई जैसे तमाम उद्योगपतियों ने जो बॉम्बे प्लान पेश किया था, उसका साफ मकसद था कि जिन कामों में रिटर्न रिस्की है, पूंजी ज्यादा लगनी है और मुनाफा देर से आना है, वे सारे काम सरकार करे, जबकि ज्यादा और द्रुत मुनाफे वाले उद्योग निजी क्षेत्र के हवाले ही रहने दिए जाएं। साठ के दशक में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर एचवीआर अयंगर ने कहा था, ‘हालांकि बहुत से लोग अब भी मानते हैं कि नेहरू हमारी अर्थव्यवस्था को समाजवादी बनाना चाहते थे, लेकिन हकीकत ये है कि बिजनेस समुदाय ने ही सरकार पर दबाव डाला था कि वह बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करे ताकि निजी क्षेत्र के मुनाफे की राह आसान हो सके।’
यही वजह है कि सड़कों के निर्माण से लेकर बिजली और तमाम बुनियादी उद्योग सार्वजिनिक क्षेत्र के मत्थे मढ़ दिए गए। बने-बनाए तंत्र पर निजी कंपनियां मुनाफा कमाती रहीं। आज सार्वजनिक क्षेत्र की जिन बीमार कंपनियों का हवाला दिया जाता है, उनमें से ज्यादातर पहले निजी क्षेत्र की कंपनियां थीं। जब ये कंपनियां घाटे की दलदल में धंस गई तो निजी उद्योगपतियों ने इन्हें दिवालिया घोषित कर दिया। तमाम कर रियायतों का फायदा उठाया और सरकार ने खुशी-खुशी इन्हें सार्वजनिक क्षेत्र के सिर पर डाल दिया।
आज भी ये निजी कंपनियां इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में उतरने से बचने की हरसंभव कोशिश करती हैं। ये अलग बात है कि विदेशी पूंजी के दबाव और सहयोग के चलते इंफ्रास्ट्रक्चरल उद्योगों में उतरना उनकी मजबूरी हो गई है। लेकिन यहां एक बात गौर करने की है कि इन्हीं कंपनियों में इनफोसिस और विप्रो जैसी आईटी उद्योग की कंपनियां भी हैं जो आरक्षण से साफ इनकार नहीं करतीं, बल्कि एसर्टिव एक्शन की पहल करती हैं, कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिटी (सीएसआर) पर ज़ोर देती हैं।
अगर आप समाज से, सरकार से कुछ लेते हैं तो सामाजिक ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकते। सीएसआर के नाम पर स्पोर्ट्स एकेडमी चलाने या कुछ एनजीओ को स्पांसर करने भर से काम नहीं चलेगा। समाज को लोकतांत्रिक बनाने में भी कॉरपोरेट सेक्टर को भूमिका निभानी पड़ेगी। ऐसा न करना समाज और देश के लिए ही नहीं, कॉरपोरेट सेक्टर के लिए भी आत्मघाती होगा।

बांह पसारे बोला था आकाश

वह चली गई। उसने कहा – इसे ऐसे ही होना था, हमें ऐसे ही मिलना था और ऐसे ही बिछुड़ना था। लेकिन तुम तो कहती थी – तुम मेरे आसमान हो। तो? तुम भी कितने स्वप्नजीवी हो। धरती और आसमान कभी आपस में मिले हैं, जो आज मिलेंगे। उसकी इस बात पर मुझे मुक्तिबोध की कविता याद आ गई।

बांह पसारे बोला था आकाश –
काश, तुम मेरे उर में सिमटी होतीं
सिमट सकी होतीं जीवन में!!
उत्तर दिया धरित्री ने –
आलिंगन में बंध, निरुद्ध होकर
विचरण कैसे कर पाती मैं
आकर्षणमय भव्य तुम्हारे चंद्र-सूर्य-नक्षत्र समन्वित
नील गगन में विचरण कैसे कर पाती मैं?

जवाब सुन धक हुई व्योम की छाती
नूतन अभिप्राय ने मानो कैंची से काटी थी बाती
भभक रहे कंदील दीप की।

कविता तब मोतिया सीप थी
धरती के उस एक अश्रु के लिए
कि जो नभ की कमज़ोरी देख गला था।
लेकिन नभ तो आसमान था
स्वयं उतर वह झरनों, नदियों, झीलों के नीले प्रवाह के रूपों में
धरती के उर पर पिघल चला था।

Sunday 12 August 2007

कमरा नंबर-129 के बालकृष्ण का आखिरी खत

आईआईटी, मुंबई के एक और छात्र ने खुदकुशी कर ली। एक बार फिर मैं परेशान हो गया। सोचने लगा कि आईआईटी के पवई कैंपस में बने हॉस्टल नंबर- 12 के 129 नंबर कमरे में रह रहे बालकृष्ण गुप्ता ने क्यों ये फैसला लिया होगा। बालकृष्ण कानपुर के एक खाते-पीते घर का रहनेवाला था। साल भर पहले ही वह इन-ऑर्गेनिक केमिस्ट्री में पीएचडी करने के लिए आईआईटी, मुंबई आया था। वह काफी कुशाग्र विद्यार्थी था और संस्थान के सबसे अच्छे प्रोफेसरों में गिने जानेवाले एम एस बालकृष्णा उसके गाइड थे। शुक्रवार को दोस्तों के बुलाने पर वह डिनर के लिए नहीं आया और शनिवार को शाम 3.30 बजे को पंखे से लटकती उसकी लाश मिली। मरने के ठीक पहले किसी को अपनों की कितनी याद आती है और वह ज़िम्मेदारियां पूरा न कर पाने से कितनी आत्मग्लानि महसूस करता होगा, इसका एक और सबूत है 27 साल के नौजवान बालकृष्ण गुप्ता का ये सुसाइड नोट, जिसमें उसने अलविदा कहने से पहले मम्मी-पापा और छोटी बहन प्रीति से दिल की बातें कही हैं।

मेरी मम्मी, मैं जा रहा हूं। परेशान मत होना। अगली बार फिर आपका ही बेटा बनूंगा। इस जन्म में मैं कुछ नहीं दे सका आपको, बस लिया ही आपसे। अपना और जॉर्ज का ख्याल रखना। मेरा यहां मन नहीं लग रहा था और वापस भी नहीं आ सकता था। प्लीज़, इस बार मुझे माफ कर दो। अगली बार मैं बहुत खुश रखूंगा। अपना ख्याल रखना, प्लीज़....

सॉरी पापा, अपने बेटे की लास्ट बात मान लेना। प्लीज़, मेरी मम्मी और जॉर्ज का ख्याल रखना। प्लीज़, प्लीज़, प्लीज़....

प्रीति, अपना ख्याल रखना। खूब पढ़ना। तुम्हारा भाई आज भी तुम सब से बहुत प्यार करता है और दीदी से कहना कि वो अपना ख्याल रखे, अच्छे से रहे।

बालकृष्ण के इस आखिरी खत को पढ़कर बरबस आंख में आंसू आ गए। मम्मी और पापा से वह कौन से जॉर्ज की बात कर रहा है, पता नहीं। लेकिन इस खत को देखकर मुझे अपने एक अज़ीज़ के करीब 17 साल पुराने चार खत याद आ गए, जो आत्महत्या की दूसरी कोशिश में अपने जन्मदिन के ठीक चार दिन पहले 24 सितंबर को उसने अम्मा-बाबूजी, बड़े भाई, पत्नी और दोस्तों के नाम लिखे थे। वो खत मैंने आज भी संभाल कर रखे हैं। मेरा वह अज़ीज़ आज भी ज़िदा है। जिंदादिल है। उसके खत कभी बाद में। अभी तो बालकृष्ण के मां-बाप और बहन को भगवान इस घनघोर दुख को सहने की ताकत दे, यही मेरी कामना है। आप भी यही दुआ करें।

Saturday 11 August 2007

ले ली ब्ल़ॉगर बस्ती में अपुन ने एक खोली

एक दिन नींद में चलते-चलते मैं जा पहुंचा एक नई बस्ती में। समुंदर की तलहटी में बसी हुई थी वो बस्ती। मजे की बात ये है कि वहां के लोगों ने घरों के दरवाजे अंदर से बंद कर रखे थे और वहीं से चिल्ला-चिल्ला के कह रहे थे – आओ मेरे घर में आओ, कुछ लेकर जाओ, आ जाओ स्वागत है आप सभी का। ज्यादातर लोगों की तो शक्ल ही नहीं दिख रही थी क्योंकि वो ठीक बंद दरवाजों के पीछे खड़े थे। एकाध ही थे जिन्होंने अपनी खिड़कियां आधी-अधूरी खोल रखी थीं। लेकिन उनकी खिड़कियों पर भी बड़ी सख्त ग्रिल और घनी जाली लगी हुई थी। उन्हें भी साफ-साफ देखकर पहचान पाना बेहद मुश्किल था।
इस बस्ती का शोर सुनकर मुझे दिल्ली में जनपथ का बाज़ार याद आ गया, जहां दुकान में खड़े दो-तीन बेचनेवाले मेढ़कों की तरह समवेत स्वर में कहते रहते हैं : भाईसाहब पैंसठ, ले जाओ पैंसठ, भाईसाहब पैंसठ। घूम-फिर कर मैं बस्ती से बाहर निकला तो चुटियाधारी अंधे चौकीदार से पूछा कि ये अजीब-सी बस्ती किन लोगों की है। उसने बताया कि ये हिंदी के ब्लॉगर्स की बस्ती है। मैं चहक उठा। वापस लौट पड़ा उसी बस्ती के भीतर। फिर मैंने भी जुगाड़ करके वहीं एक कमरे की खोली किराये पर ले ली।
छह महीने के बाद मैंने पाया कि यहां तो अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग ही चलता है। जिसको जो मिलता है, लिखे जा रहा है। गुजरे वक्त के संस्मरण, ज्ञान के अज्ञानी पुराण। लगता है सभी एक लाइन में खडे होकर पापड़ बेचनेवाले की तरह बैंडमिंटन के रैकेट की शक्ल वाली डुगडुगी बजा रहे हैं। चिल्ला-चिल्ला कर अपनी राम-कहानी सुना रहे हैं। दर्शन बघार रहे हैं। कविताएं सुना रहे हैं। राजनीति से लेकर न्याय व्यवस्था और अर्थव्यवस्था पर लिखे जा रहे हैं। मैंने भी अपनी डफली उठा ली। अपना राग अलापना शुरू कर दिया। वही राम-कहानी। जैसे औरों की, वैसी ही अपनी। प्याज़ की परतें खुलने लगीं।

Friday 10 August 2007

अरे माया! जिसने उठाया, उसी को भुलाया?

मायावती की इस नई कृषि नीति के ‘कुछ महत्वपूर्ण संशोधनों’ के 9वें बिंदु में ऐसी बात कही गई है जो मेरे लिए काफी चौंकानेवाली है। इसमें कहा गया है : राज्य में अगर कोई 12.5 एकड़ से ज्यादा ज़मीन खरीदता है तो उसे उ.प्र. ज़मींदारी उन्मूलन कानून के प्रावधानों के तहत मेरिट के आधार पर छूट दी जाएगी। इसी बिंदु में आगे गांवों की सड़कों, सिंचाई, बिजली, कृषि विश्वविद्यालयों में शोध व अनुसंधान जैसी अमूर्त और अनर्गल बातें नत्थी कर दी गई हैं।
आपको बता दूं कि इस समय उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि पर 12.5 एकड़ की सीलिंग सीमा लागू है। सवाल उठता है कि जब पहले से ये प्रावधान है कि औद्योगिक मकसद के लिए कोई कितनी भी कृषि ज़मीन खरीद सकता है तो नई नीति में सीलिंग सीमा से ऊपर ज़मीन खरीदने पर छूट की बात क्यों और किसके लिए की गई है? आखिर कौन हैं जिनको मायावती की सरकार 12.5 एकड़ से ज्यादा कृषि भूमि खरीदने के लिए प्रोत्साहित करना चाहती है?
खुद उ.प्र. सरकार के मुताबिक इस समय राज्य के लगभग 90 फीसदी किसान लघु या सीमांत श्रेणी के हैं और इनकी माली हालत काफी खस्ता है। 1991-92 के अनुमानों के मुताबिक 60 फीसदी किसानों के पास ढाई एकड़ से कम ज़मीन है, जबकि भूमिहीन किसानों की संख्या 11.24 फीसदी है। सरकार मानती है कि इसके बाद के 15 सालों में छोटी जोतों की संख्या और बढ़ गई होगी
इन भूमिहीन या लघु व सीमांत किसानों की ज्यादातर आबादी दलित या अति पिछड़ी जातियों से आती है और यही लोग मायावती का मुख्य आधार हैं। इन किसानों में से शायद ही किसी की औकात होगी कि वे 12.5 एकड़ से ज्यादा जमीन खरीद सकें। ज़ाहिर है कि मायावती अपने मूलाधार से बाहर के लोगों के लिए ज़मीन खरीदना आसान बना रही हैं और जिन्होंने इन्हें भारी बहुमत से सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाया, उन्हें ही ठेंगा दिखा रही हैं।
कितनी अजीब बात है कि इसी सरकार ने इस साल के बजट में किसान हित योजना के तहत दलित और पिछड़े लोगों के कब्ज़े वाली सात लाख हेक्टेयर ऊसर, बंजर और बीहड़ ज़मीन को ऊर्वर बनाने की बात कही थी, ग्रामसभा और सीलिंग से बाहर निकली अतिरिक्त ज़मीन को गरीब भूमिहीन लोगों में बांटने की बात कही थी। लेकिन नई कृषि नीति में इसका कोई जिक्र नहीं है। उल्टे बड़े किसानों को सीलिंग से ज्यादा ज़मीन हथियाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
क्या बहनजी को पता नहीं है कि उनके राज्य में सीलिंग कानून किस तरह मज़ाक बन चुका है। अभी 12.5 एकड़ से ऊपर 16 एकड़ ज़मीन बागवानी के नाम पर रखी जा सकती है। इसके अलावा तमाम पुरानी रियासतों और नेताओं ने कुत्ते से लेकर पीपल के पेड़ के नाम पर सैकड़ों एकड़ ज़मीन पर कब्ज़ा कर रखा है। यहां तक होता है कि एक साथ रह रहे मियां-बीवी तलाक के कागज़ात बनवा लेते हैं और कानूनन 25 एकड़ ज़मीन के मालिक बने रहते हैं। आपको ये भी बता दूं कि उत्तर प्रदेश में कृषि ज़मीन खरीदने के लिए किसान होना जरूरी नहीं है। वहां महाराष्ट्र की तरह नहीं है। कोई भी गैर-किसान कृषि ज़मीन खरीद सकता है। इसीलिए तमाम फिल्मी सितारों के फार्म हाउस उत्तर प्रदेश में ही हैं।
आखिर मायावती सरकार किसको लुभाना चाहती है? जब केंद्र सरकार और उसके योजनाकार कृषि की 4 फीसदी सालाना विकास दर का ख्वाब पाल रहे हैं, तब माया सरकार ने उत्तर प्रदेश में कृषि के 5.7 फीसदी सालाना विकास का लक्ष्य तय किया है। आखिर मायावती के पास कौन-सी जादू की छड़ी आ गई है कि जिस लक्ष्य को हासिल करने में बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों के छक्के छूट रहे हैं, उससे करीब दो फीसदी ज्यादा विकास दर वो चुटकी बजाकर हासिल करने का दावा कर रही हैं? मुझे तो यही लगता है कि हमें फिलहाल यही सोचकर संतोष रखना पड़ेगा कि माया महाठगिनी हम जानी।...समाप्त

माया के जाल की हस्तियां

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने 3 अगस्त 2007 को राज्य के कृषि क्षेत्र में व्यापक सुधारों के लिए एक नई नीति घोषित की है। तीन दिन पहले ही इसकी अधिसूचना जारी की गई। वैसे, ये नीति अभी तक जिलाधिकारियों और तहसीलदारों तक नहीं पहुंची है, इसलिए वो इस पर कुछ भी कहने को तैयार नहीं हैं। छोटे अखबारों को समझ में ही नहीं आया कि इस नीति को कैसे कवर करें, लेकिन बड़े-बड़े अखबारों ने इस पर संपादकीय तक लिखे हैं, संपादकीय पेज पर बहसें की गई हैं। मायावती के कसीदे काढ़े गए हैं कि उन्होंने पूरे देश को एक नई राह दिखा दी है। लेकिन किसी ने भी गौर नहीं किया कि किसान हितों के नाम पर बहनजी ने किनके हितों को पूरा करने का बीडा उठाया है।
नीति दस्तावेज़ में कहा गया है कि अभी तक तमाम सरकारों ने समय-समय पर किसानों की हालत सुधारने के लिए नीतियां बनाईं, लेकिन इनका फायदा चंद लोगों को ही मिला। आम किसानों की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है और वो खुदकुशी करने को मजबूर हैं। आज़ादी के साठ साल बीत चुके हैं, लेकिन किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलाने के प्रयासों का कोई नतीजा नहीं निकला है। एकदम सही।
इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि पूरे देश को खिलानेवाला किसान आज भूखे पेट सोने को मजबूर है। वह नियंत्रित अर्थव्यवस्था के दुष्चक्र में फंसा हुआ है। उसे इस दलदल से निकालने के लिए तत्काल कुछ ठोस कदम उठाने पड़ेंगे। बिलकुल ठीक।
किसानों की दुर्दशा का दारुण चित्रण करने के बाद मायावती ने पहला ठोस कदम घोषित किया है कि किसानों की उपज और बाज़ार के बीच के बिचौलिये खत्म कर दिए जाएंगे। राज्य में ऐसे निवेशकों को आमंत्रित किया जाएगा, जिनकी न्यूनतम नेटवर्थ 500 करोड़ रुपए होनी चाहिए। किसान सीधे इन ‘निवेशकों’ को अपनी फसल बेचेंगे तो बिचौलिये अभी तक उनका जो शोषण करते रहे हैं, वह खत्म हो जाएगा। बहनजी, साफ क्यों नहीं कहतीं कि आप रिलायंस फ्रेश, भारती-वॉलमार्ट, बिग बाज़ार, सुभिक्षा जैसे बड़े रिटेल मॉल्स के लिए खरीद का सुगम रास्ता बनाना चाहती हैं। जो कोइरी समुदाय गांव के पास के बाज़ार-हाट में सीधे सब्जियां बेचकर अच्छा-खासा मुनाफा कमाता था, वह अब संकरी गली में फंस जाएगा क्योंकि बड़ी जोत वाले किसान भी सब्जियां उगाएंगे और बड़ी कंपनियां मोलतोल के बाद सस्ती दरों पर ही उनसे माल खरीद कर देश भर में बेचेंगी।
उत्तर प्रदेश की नई कृषि नीति में कृषि आधारित उद्योग भी लगाने की बात की गई है। इसके लिए न्यूनतम नेटवर्थ 5,000 करोड़ रुपए रखी गई है। ज़ाहिर है कि इतनी नेटवर्थ तो अंबानी, आईटीसी, भारती, गोदरेज, आदित्य बिड़ला या सहारा जैसे बड़े कॉरपोरेट घरानों की हो सकती है। लेकिन मायावती सरकार ने बड़े प्यार से पुचकारते हुए कहा है कि उन्होंने छोटे निवेशकों को नज़रअंदाज़ नहीं किया है और वो मंडी परिषदों के जरिए इस नीति को कामयाब बनाने में योगदान कर सकते हैं। धन्य हैं आप मायावती जी!
बड़े कॉरपोरेट घरानों के लिए लाल कालीन बिछाने के बाद भी तुर्रा ये कि नीति कहती है कि उत्तर प्रदेश में कांट्रैक्ट फार्मिंग की इजाज़त तो है, लेकिन यह कांट्रैक्ट किसानों से उनकी उपज खरीदने तक सीमित रहेगा और किसी भी सूरत में किसी को किसानों की ज़मीन खरीदने की इजाज़त नहीं दी जाएगी। यही वो बातें थी, जिन पर नेशनल मीडिया मायावती के गुणगान कर रहा है। लेकिन उसने जान-बूझकर या अनजाने में इस नीति के उन सूत्रों को अनदेखा कर दिया, जो तमाम वाग्जाल के बीच चुपके से डाल दिए गए हैं। जारी...

समुद्र किनारे लहराता जन-समुद्र

अगले महीने मुझे मुंबई में आए ढाई साल हो जाएंगे। लेकिन आप यकीन नहीं मानेंगे कि मैंने अभी तक यहां का समुद्र नहीं देखा है। हां, एक बार बच्चों के साथ चौपाटी ज़रूर गया हूं। वैसे, हरहराता समुद्र मैंने देखा है, लेकिन मुंबई का नहीं। गुजरात में पोरबंदर का समुद्र देखा है, धीरूभाई के गांव के पास चोरवाड के समुद्र की लहरों में भी कमर तक डूबा हूं। नीदरलैंड की राजधानी एम्सटर्डम से करीब सौ किलोमीटर दूर अल्कामार के समुद्र में भी डुबकी लगाई है। लेकिन समुद्र किनारे बसे मुंबई में हफ्ते के पांच दिन सुबह-शाम मेरा एक समुद्र से ज़रूर वास्ता पड़ता है। और वो है जन-समुद्र।
सुबह लोकल ट्रेन पकड़ने स्टेशन पहुंचता हूं तो वहां एक जन-समुद्र हिलोरे मार रहा होता है। हर पांच से लेकर दस मिनट पर ट्रेन हैं। लेकिन एक ट्रेन जाते ही मिनटों में स्टेशन पर ऐसी भीड़ लग जाती है जैसे समुद्र की एक लहर के बाद दूसरी लहर आ गई। इस तरह सुबह सात बजे से लेकर दोपहर दो बजे तक तेज लहरों के आने का सिलसिला चलता रहता है। बीच में तीन से चार-साढ़े चार बजे तक लहरें मद्धिम पड़ जाती हैं। लेकिन शाम पांच बजे से लेकर 10-11 बजे तक फिर मुख्य मुंबई से बाहर जाती हुई वेगवान लहरें उठ खड़ी होती हैं।
समय के हिसाब से इन लहरों का रंग बदलता रहता है। सुबह सात से 10-11 बजे तक ऑफिस जानेवाले लोगों की लहर आती है। इस लहर पर महाराष्ट्रीय रंग हावी रहता है। फिर दोपहर होते-होते शेयर बाज़ार में या कोई और धंधा करनेवालों की लहर शुरू हो जाती है। इस लहर पर गुजराती रंग सवार रहता है। ये लोग ट्रेन में खड़े-खड़े ही सौदे काटते रहते हैं। दो बजे के आसपास की लहरों पर सतरंगी रंग चढ जाता है। इनमें सभी शामिल रहते हैं। उत्तर भारतीय तो मुंबई की जान बन गए हैं। कारपेंटर से लेकर ऑटो रिक्शा, टैक्सी, पान की दुकान या दूध का धंधा करनेवालों में भैया लोगों की भरमार है। इसलिए मुंबई के जन-समुद्र की हर लहर में उत्तर भारतीय रंग थोड़ा-बहुत शामिल रहता है।
इस जन-समुद्र के तेवर बराबर समुद्र के तेवर से मैच करते हैं। हाई टाइड का वक्त है और बाढ़ की सूरत पैदा हो गई तो सड़कों से लेकर रेलवे स्टेशन तक फैले जन-समुद्र में भी हाई टाइड आ जाता है। मुझे इसका ज़बरदस्त अहसास 26 जुलाई 2005 को हुआ था, जब यह जन-समुद्र पटरियों पर बहते-बहते अपने ठिकानों तक पहुंचा था।
मुंबई का जन-समुद्र वाकई इंसानों को कैसे बूंद बना देता है! वो बूंद जिसका मानो तो अलग वजूद है, नहीं तो वह समुद्र में विलुप्त है। अलग से खोजे नहीं मिलेगी। मुंबई का यह जन-सैलाब बड़े-बड़ों के अहम को चाक की तरह चूर-चूर कर देता है। क्या साहब, क्या चपरासी, सब एक बराबर। काहिलों की रीढ़ की हड्डी सीधी कर देता है मुंबई। शायद इसीलिए मुझे मुंबई बेहद अच्छा लगता है। दिल्ली तो दल्लों का शहर है, जबकि मुंबई मेहनत करनेवालों का शहर है। दिल्ली में आप पानी में तेल की तरह उतराते रहते हैं, जबकि मुंबई का जन-समुद्र आपको सोख लेता है, भीड़ में आप ऐसे गुम हो जाते हैं कि अपनी तलाश तक भूल जाएं।
वैसे, सोचता हूं कि आखिर हम लोग हैं क्या? जन-समुद्र की एक बूंद ही तो हैं। समुद्र में बूंद जैसी स्थिति हमारी है। एक बूंद का दायरा कब दूसरी बूंद से मिल गया, पता ही नहीं चलता। हम जिसे नितांत अपनी समस्या माने रहते हैं, आंख उठाकर अगल-बगल झांकते हैं तो पता चलता है कि न जाने कितने लोग ठीक उसी वक्त वैसी ही समस्या से जूझ रहे होते हैं। हमें लगता है कि क्या अनोखा विचार हमारे जेहन में आया है, लेकिन कभी संयोगवश कोई ऐसी किताब हाथ लग जाती है तो पता चलता है कि वह विचार तो दो सौ साल पहले कोई और लिखकर चला गया है। कभी-कभी महान हस्तियों के बारे में सोचते हैं कि उनकी तो हर बात निराली रही होगी। लेकिन नज़दीक से परखते हैं तो पता चलता है कि वे भी हमारे जैसे ही थे। बस, अंतर इतना था कि खास काल और परिस्थिति में सामाजिक आवश्यकता ने, सामूहिक जरूरत ने उस शख्स को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बना लिया था और वह आनेवाली पीढ़ियों के लिए महान बन गया।
वाकई समुद्र के किनारे बसे मुंबई के जन-समुद्र ने मुझे ऐसा बना दिया है कि मैं कबीर की बोली में कह सकता हूं :
जल में कुंभ, कुंभ में जल है, बाहर-भीतर पानी।
फूटा कुंभ जल जलहिं समांना, यह तथ कह्यो गियानी।।

Thursday 9 August 2007

जब मिट जाता है चीन और भारत का फर्क

चीन में माओ के अनुयायियों ने यह खुला पत्र चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमिटी और सरकार को भेजा है। ज़रा इसके चुनिंदा अंशों पर गौर फरमाइये। आपको लगेगा, जैसे ये बातें चीन के बारे में नहीं, भारत के बारे में कही जा रही हों। इसे पढ़ने के बाद आपको जॉर्ज ऑरवेल की मशहूर किताब एनीमल फार्म का आखिरी सीन ज़रूर याद आ जाएगा, जिसमें शराब पीते हुए सूअरो&#