Wednesday 11 July 2007

फ्रेम से बाहर निकलो, धारणाओं के गुलाम!

तुम्हारे साथ समस्या ये है कि तुम अपनी धारणाओं के गुलाम हो। एक बार जो धारणा बना ली, बस फिर वैसा ही देखते हो। दूर के लोगों से लेकर नजदीक के लोगों के बारे में तुम्हारा यही रवैया रहा है। मां-बाप, भाई-बहन से लेकर दोस्तों तक की जो इमेज अपने अंदर बैठा ली, उससे इतर देखने की जरा-सा भी जहमत नहीं उठाते।
दुनिया-समाज को बदलने की बात की, राजनीतिक व्यवस्था को आमूल-चूल बदलने की बात की, नई संस्थाओं को बनाने की बात की। लेकिन मौजूदा संस्थाओं को एक सिरे से नकार दिया। देखा ही नहीं कि वो क्या हैं, कैसी हैं। बस खारिज किया तो खारिज ही कर डाला। अरे, कोई भी नई संस्था वैक्यूम से जन्म लेगी क्या? हर सामाजिक-राजनीतिक संस्था बनते-बनते बनती है। नई संस्था तो पुरानी संस्था का ही परिवर्धित रूप होगी न! साइंस में भी कोई नया नियम पुराने को तोड़ता है तो उसी तरह जैसे किसी वृत्त के बाहर बड़ा वृत्त खींचकर पुराने को खत्म कर दिया जाता है। कानून को नहीं समझा तो नया कानून क्या बनाओगे?
असल में जिस तरह कोई नींद में चलनेवाला शख्स हाथ-पैर तो मारता है, लेकिन उसकी आंखें बंद रहती हैं, वही हाल तुम्हारा अब तक रहा है। आंखों में मिर्ची पड़ जाने के बाद जैसे कोई शख्स हाथ-पैर मारता है, मगर दुश्मन कहीं दूर खड़ा तमाशा देखता रहता है, तुम अभी तक यही तो करते रहे हो। मान्यवर, आंख मूंदकर तुम किससे लड़ रहे हो? ज़रा देखो तो सही कौन कहां खड़ा है? ये भी तो देखो कि कौन दुश्मन है और कौन हितैषी?
तुम वाकई कितने अजीब हो, तुम खुद नहीं जानते। सही-गलत की जो धारणा बन गई, सो बन गई। जो भी नई सूचनाएं मिलीं, उसे तुमने पुराने फ्रेम में ही फिट किया। कभी पुराने फ्रेम को तोड़कर नहीं आजमाया कि नई सूचनाएं किस नए पैटर्न को जन्म दे सकती हैं। असल में क्या कहा जाए। दोष तुम्हारा भी नहीं है। हर अर्जुन को कृष्ण जैसे सारथी की ज़रूरत होती है। मुश्किल ये है कि पूर्वाग्रहों को मिटाने के लिए कोई भी ऐसा गुरु नहीं मिल पाता जो अपना विराट रूप दिखाकर सारी भ्रांतियों का निराकरण कर दे।

4 comments:

अभय तिवारी said...

बड़ा मारक लिख दिया है.. और उस पर अदा ये कि किसी के नाम का इशारा तक नहीं किया.. सही है..

Debashish said...

तो आप सीधे अर्जुन को क्यों नहीं कहते कि आप (यानि कृष्ण) को तुरंत Hire कर लें ;)

अनिल रघुराज said...

ये शुद्ध रूप से मेरा आत्म-प्रलाप, एकालाप है। शैली ऐसी थी कि कई लोगों को लगा होगा कि ये उन्हें लक्ष्य कर लिखा गया है। मैं खुद अर्जुन की स्थिति में हूं, किसी के लिए कृष्ण बन ही नहीं सकता। मेरे लिखना एक आत्ममंथन का हिस्सा था। मुझे लगा शायद इसे पढ़कर औरों की नजर भी खुद पर चली जाएगी।

vimal verma said...

भाई अनिलजी, बात तो ऐसी कह दी है आपने कि क्या बताएं पर ये ज़िन्दगी भी रास तो आ नही रही पर इलाहाबाद से मुम्बई तक के सफ़र मे इतना ज़रूर देखा है कि सभी ने अपने दिमाग में "फ़िल्टर"लगा रखा है कि हम हर बात को "अपनी" तरह से ही लेते हैं खुश होते हैं दुखी होते हैं पर अपने फ़िल्टर को हटा कर दुनियां को देखना भी नहीं चाहते और बात बात में पता नहीं किस किस को आपने क्या क्या कह दिया जिसको जितना लेना होगा लेलेगा आखिर सबने फ़िल्टर जो लगा रखा है..