Wednesday 4 July 2007

जाता ब्राह्मणत्व, आता क्षत्रियत्व

राजनीति कहती है कि हमारे यहां जातियां मजबूत हो रही हैं, जातीय समीकरण निर्णायक होते जा रहे हैं। लेकिन बाज़ार कहता है कि जातियों का मामला गड्डम-गड्ड होता जा रहा है, जाति की दीवारें टूट रही हैं, खासकर ब्राह्मणवाद तो विलुप्त होने की कगार पर है। ज्ञान, सामंजस्य, संतोष, सादगी और संयम ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिन्हें भारतीय संस्कृति के पवित्र संस्कारों से, ब्राह्मणत्व से जोड़कर देखा जाता रहा है। सादा जीवन, उच्च विचार इसी का पर्याय था। लेकिन आज इन मूल्यों पर चलकर जिंदगी में कोई कामयाब नहीं हो सकता। वह महज उपहास और दया का पात्र ही बन सकता है।
इसकी जगह ले रहा है क्षत्रियत्व, जिसके लक्षण हैं एक्शन, कामयाबी, जीत, शोहरत और नायकत्व। आज कोई भी साधारण नहीं रहना चाहता। असाधारण बनने, सेलेब्रिटी बनने की चाहत से आज की युवा पीढ़ी लबालब भरी हुई है। गौतम बुद्ध से लेकर भर्तहरि और राहुल सांकृत्यायन तक के जमाने में लोग घर से भागकर योगी और साधू बनते थे। शंकराचार्य के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने आठ साल की उम्र में ही अपनी मां से खुद को धर्म और समाज के लिए त्याग देने की मिन्नत की थी। खुदीराम बोस ने मां से देश के लिए होम होने के लिए विदाई मांगी थी। सत्तर-अस्सी के दशक तक लड़के भागकर क्रांतिकारी आंदोलनों का हिस्सा बन जाते थे। लेकिन आज 14-15 साल के लड़के दिल में इंडियन आइडल बनने की हसरत लिए बिहार से भागकर मुंबई आ जाते हैं।
बाज़ार कहता है कि ये एक तरह का क्षत्रियत्व है जो किसी भी कीमत पर कामयाबी हासिल करना चाहता है। इसके लिए हर जोखिम उठाने को तैयार रहता है। इसी साल 12 से 14 मार्च को क्वालालंपुर में ग्लोबल मार्केंट रिसर्च संस्था ईएसओएमएआर की एशिया पैसिफिक कांफ्रेंस में बेट्स एंटरप्राइज इंडिया (स्ट्रैटिजिक प्लानिंग) के वाइस प्रेसिडेंट धीरज सिन्हा ने अपने पेपर में भारतीय समाज से ब्राह्मणत्व के मिटने और क्षत्रियत्व के स्थापित होने की यह थ्योरी पेश की थी। उन्होंने दिखाने की कोशिश की थी कि कैसे एक अरब भारतीयों का माइंडसेट तेजी से बदल रहा है।
पहले लोगों में हिंदी या अपनी मातृभाषा का आग्रह हुआ करता था। लेकिन अब, क्योंकि अंग्रेजी जानना और बोलना आगे बढ़ने की जरूरी शर्त बन गई है, इसलिए हर कोई अंग्रेजी की तरफ भाग रहा है। हर तरफ फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना सिखाने वाले संस्थान खुल गए हैं। राष्ट्रीयता के मूल्य गिनेचुने नेताओं के भाषणों, करगिल जैसे युद्ध के शहीदों और कतिपय विज्ञापनों में ही नज़र आते हैं।
आगे बढ़ने की होड़ कितनी निर्मम और अमानवीय हो गई है, इसका एक किस्सा मुझे याद आता है। बीएससी में ऊपर से दो सबसे मेधावी लड़कों में एक फाइनल परीक्षा के अंतिम दिन से ठीक पहले की शाम दूसरे से मिलने उसके घर गया। मकसद था थाह लगाना कि उसके प्रतिद्वंद्वी की क्या तैयारियां हैं। आधे घंटे की बातचीत के बाद जब वह वापस लौट रहा था तो दूसरा लड़का उसे सीढ़ियों तक छोड़ने आया। फिर अचानक उसके मन में क्या आया कि उसने मिलने आये लड़के को घर की सीढ़ियों से नीचे धकेल दिया। लड़का गिरकर बेहोश हो गया और धकेलनेवाला लड़का भी बदहवास हो गया। किसी तरह सुबह तक दोनों नॉर्मल हुए। क्या करें, बाज़ार है। होड़ है। आखिर ज्ञानवान तो बहुत से हो सकते हैं, मगर टॉपर तो एक ही होता है।
गौर करने की बात ये है कि हमारे नयी पीढ़ी के दिलोदिमाग पर रेस में किसी भी सूरत में सबसे आगे रहने का सुरूर सवार हो गया है। मैं भी इसे काफी हद तक पॉजिटिव मानता हूं। लेकिन इसे पूरी तरह स्वस्थ प्रवृति नहीं कहा जा सकता है। बाज़ार वाले खुश हैं कि भारत की 50 करोड़ से ज्यादा आबादी की उम्र 21 साल के कम है। भारतीय आबादी की औसत उम्र 25 साल है, जबकि चीन में ये औसत 33 साल है। हमारा बाज़ार इस युवापने को, क्षत्रियत्व को कैश करना चाहता है क्योंकि एक-दूसरे से बेहतर दिखने-दिखाने की होड़ जितनी तल्ख होगी, मॉल्स की रौनक उतनी बढ़ती जाएगी।

2 comments:

Sanjay Tiwari said...

स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।
हम सब स्मृतिलोप के शिकार होते जा रहे हैं. ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद वाले लेख का आधार यही है. आपका लेख बाजार के नये समाजशास्त्र को ठीक से परिभाषित कर रहा है. थोड़ा और लिखना चाहिए था. वैसे सांड़ वाली बात कैसे सूझी?

अनिल रघुराज said...

संजय जी, अपनी बहन की लड़की की शादी के चक्कर में वर देखने गया था। उपजाति अलग थी, लेकिन गोत्र एक था। यहीं अटक कर बात टूट गई। वहीं जल-भूनकर मैंने ये बात कही थी।