Monday 2 July 2007

अंधेरे में झांकती आँखें

मेरे एक पुराने मित्र रहे हैं इरफान। कल पुराने कागजों की साफ-सफाई के दौरान मुझे उनका यह लेख हाथ लग गया, जो आज भी काफी प्रासंगिक है। इसे उन्होंने संभवत: मार्च-अप्रैल 2000 में मुझे उपलब्ध कराया था। लेकिन मैं इसका इस्तेमाल नहीं कर सका। इस दौरान मैं टूटने-बिखरने और जुड़ने के दौर से गुज़रता रहा और इरफान भी टूटी हुई बिखरी हुई अवस्था में जा पहुंचे। फिर दरमियानी दूरियां इतनी बढ़ीं कि यह लेख उन तक पहुंचाना मेरे लिए संभव नहीं रह गया। तो, ब्लॉग के ज़रिए उनकी वस्तु उन्हीं को सौंप रहा हूं। इरफान के लेख के संपादित अंश...

दस बाई दस का एक सीलन भरा कमरा। कोने में एक मेज और कुर्सी। मेज पर किताबों के अलावा प्रतियोगिता दर्पण, प्रगति मंजूषा, कम्टीशन सक्सेस रिव्यू और मनोरमा इयर बुक। दीवार पर गणेश जी का कैलेंडर। दूसरे कोने में स्टोव, बरतनों से सटी एक बाल्टी और मग रखा है। यहीं पास पड़ी चारपाई पर अधलेटा छत से लटक रहे मद्धिम रोशनी बिखेरते लट्टू पर नज़र गढ़ाए कुछ विचारता एक युवक। यह चित्र है हिंदी हदों के हिंदुस्तान में एक शिक्षित युवक का। पिता को बेटे से बड़ी उम्मीदें हैं।
हर साल दसियों हज़ार छात्र इलाहाबाद, लखनऊ, बनारस, गोरखपुर और दिल्ली के विश्वविद्यालयों का रुख करते हैं। नौकरी की आस में पहले बीए, फिर एमए, फिर एलएलबी या रिसर्च करते हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं में अपनी उम्र के सुनहरे बरसों के पृष्ठ काले करते रहते हैं। भारत में जनसंख्या वृद्धि की औसत दर 2 % है जबकि बेरोजगारी की दर 12 % है। पुराने कल-कारखानों और दफ्तरों में नई नियुक्तियां लगभग बंद हैं, उल्टे छंटनी का क्रम भी जारी है। ऐसे में यह समझना आसान है कि विश्वविद्यालय हर वर्ष लाखों की संख्या में बेरोज़गारों का उत्पादन कर रहे हैं।
स्वाधीनता के इतने सालों बाद भी एक स्वायत्त और आत्मनिर्भर चेतना का विकास अवरुद्ध है। आमतौर पर युवाओं में अफसर बनने के सपने गहरी पैठ बना चुके हैं। ह्वाइट कॉलर्ड इम्प्लॉयमेंट की ओर एकतरफा रुझान ने कई विडंबनाओं को जन्म दिया है। अंग्रेजी बोलना, आरामपरस्त जीवन की आकांक्षा और इस क्रम में अपनी ज़मीन से कटते जाना इसके स्वाभाविक नतीजे हैं।
आईएएस और पीसीएस के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने और विफल होने की कथा बार-बार दोहराई जाती है। कम्पटीशन का यह गोरखधंधा नौजवान को असमय ही बूढ़ा-झक्की और दंभी बना देता है। समय बीतने के साथ-साथ कुंठा का रूप कई बार आत्महत्या, आत्म-उत्पीड़न, अपराध, नशे और मूल्यहीनता में बदल जाता है। और अक्सर ही विफलताओं की यह अंतहीन कहानी उसे तन्हा और व्यक्ति-केंद्रित बनाकर छोड़ जाती है। ये दसियों हज़ार युवक, जो अपनी तरुणाई में अपार संभावनाएं संजोए हुए थे, अब ऊब और थकान की साक्षात प्रतिमूर्ति बनते जाते हैं।
हाल के बरसों में भारतीय समाज ने आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीकरण की कुछ बानगियां देखनी शुरू की हैं। सूचना प्रौद्योगिकी की एक नई चमकदार लहर इन दिनों चर्चा में है। छोटे शहरों और कस्बों तक में कम्प्यूटर, इंटरनेट और दूसरे संचार संबंधी धंधों की दुकानें और संस्थान कुकुरमुत्तों की तरह उगने लगे हैं। रोज़गार के नए अवसरों के आगमन का क्रम भी तेजी से जन्म ले रहा है। लेकिन इस नए माहौल में पुराने का विस्तार ही निहित है। उपभोक्ता बाजार अपनी नई आक्रामकता के साथ पैठ बना रहा है और आकांक्षाएं दिनोदिन आसमान छू रही हैं।
प्रश्न उठता है कि बड़े पैमाने पर पैदा हो रही बेरोज़गारों की इस जमात को क्या किसी रचनात्मक दायरे में लाया जा सकेगा? क्या इन युवाओं में बढ़ता जाहिल व्यक्तिवाद और भविष्य की असुरक्षा इनमें इतनी शक्ति भी शेष छोड़ पाएगी कि राष्ट्र के निर्माण में ये अपनी भूमिका तय कर सकें?

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