Tuesday 6 November 2007

दुखवा मैं कासे कहूं री मोरी सजनी

ऊपर से भले ही अलग-अलग दिखें, लेकिन साहित्यकार और धर्मगुरु एक ही श्रेणी के लोग होते हैं। ऐसी-ऐसी बातें कहकर चले जाते हैं जिन पर अमल करना मुमकिन ही नहीं होता। उनको तो बस प्रवचन देना होता है! मानस पुश्किन की लिखी बात याद करके मन ही मन यही सब बड़बड़ कर रहा था। वह अपनी समझ से पीछे लौटने के सारे पुलों को तोड़ कर निकला था। लेकिन आज उसे वहीं लौटना पड़ रहा है, जहां उसने इस जन्म में दोबारा लौटने की गुंजाइश खत्म कर दी थी। उसे एहसास हो गया है कि सफर हमेशा आगे ही नहीं बढ़ता। कभी-कभी आगे बढ़ने के लिए पीछे भी लौटना पड़ सकता है। इसलिए दुनियादारी का तकाज़ा यही है कि सारे पुलों को कभी नहीं तोड़ना चाहिए क्योंकि कभी-कभी लौटने की जरूरत भी पड़ सकती है।

दीपिका जब मानस से टकराकर खास औरताना अंदाज में बांहें झुलाती निकल गई, तब दोपहर के दो ही बजे थे। मानस के कस्बे के सबसे पास के स्टेशन चौरेबाज़ार के लिए अगली ट्रेन रात के करीब दस बजे जाती थी। लेकिन वह इससे नहीं, सुबह सवा चार बजे वाली ट्रेन से जाना चाहता था क्योंकि कम से कम 40 बार इस ट्रैक से गुजरे सफर को वो आखिरी बार सांस भरकर देखना और जीना चाहता था। खाना-वाना खाकर कई घंटे आवारागर्दी करता रहा। फिर करीब नौ बजे प्रयाग स्टेशन पहुंचकर वेटिंग एरिया में लुंगी बिछाई और झोले का तकिया बनाकर लेट गया। सुबह चार बजने का इंतज़ार करने लगा। पास में ही एक साधूबाबा घूंघट में ढंकी दो महिलाओं के साथ ‘मुफुत का सलीमा’ दिखा रहे थे, लेकिन वह अपने से ही आक्रांत था। इन दृश्यों में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी।

उस पर यही सच बहुत भारी गुज़र रहा था कि जिस शहर में उसने ज़िंदगी के बेहतरीन पांच-छह साल गुजारे हैं, जहां अब भी उसे जानने-पहचानने वाले 40-50 लोग हैं, उसी शहर में उसे स्टेशन पर रात बितानी पड़ रही है। लेकिन यह तो खुद उसी ने तय किया था। दिक्कत यह थी कि उसके बारे में इतनी सकारात्मक बातें फैल चुकी थीं कि वह इन लोगों को कोई उल्टी चीज़ बताकर न तो अपनी सफाई देना चाहता था और न ही उनकी दया का पात्र बनना चाहता था।

आंखों ही आंखों में सुबह हो गई। ट्रेन करीब 40 मिनट देरी से आई। यूं तो यूनिवर्सिटी के दिनों में बगैर टिकट चलना उसे काफी एडवेंचरस लगता था, लेकिन क्रांतिकारी पार्टी में इतने साल काम करने के बाद वह डरने लगा था। आज वह टिकट लेकर सफर कर रहा था। फाफामऊ के पास ट्रेन गंगा के पुल पर पहुंची तो उसे याद आ गया कि कैसे घर से आखिरी बार लौटने पर उसने इसी पुल से हाईस्कूल, इंटरमीडिएट और बीएससी के अपने सारे सर्टीफिकेट और मार्कशीट गंगा में बहा दी थीं ताकि वह लौटना भी चाहे तो घर से दफ्तर और दफ्तर से घर वाली ज़िंदगी को पाने के लिए वापस न लौट सके। लेकिन अब तो उसे इन सभी की ज़रूरत पड़ेगी।

उसकी हालत न खुदा ही मिला, न बिसाले सनम वाली हो गई थी। बेहद एकाकी हो गया था वह। कोई भी ऐसा नहीं था, जिससे वह अपनी पीर बांट सके। ट्रेन भारतीय रेल की रफ्तार से चली जा रही थी और खिड़की के पास वाली सीट पर बैठा वह पुरानी यादों में हिचकोले ले रहा था। पहला दृश्य। इलाहाबाद जिले का कोरांव इलाका, जहां वह एमएससी करने के दौरान आदिवासियों और दलितों के बीच राजनीतिक काम के लिए जाता था। आखिरी बार जीप में बैठकर निकला। पीछे-पीछे आवाज़ लगाता 20 साल का एक नौजवान रमाशंकर। मानस ने ड्राइवर को हाथ मारकर जीप रुकवाई। रमाशंकर हांफते-हांफते पास आए। मानस की हथेली में कुछ डालकर बोले – साथी इसे रख लीजिए। जीप चल पड़ी। मानस ने देखा, उसकी हथेली में दो रुपए के सात मुड़े-तुड़े पुराने नोट थे। भूमिहीन परिवार के जिस लड़के पास पढ़ने की फीस नहीं जुटती थी, उसने साथी को 14 रुपए की विदाई दी थी। सुदामा के चावलों की कीमत यकीनन इसके आगे कहीं नहीं ठहरती। इस याद से मानस का गला रुंध गया।

अगला दृश्य। गोंडा ज़िले के एक गांव में पार्टी की बैठक जिसमें राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव किया जा रहा है। मानस ने भी बोलने के लिए अपना नाम दे रखा था। अनुभव से निकली बहुत सारी ठोस बातें थीं, कई सुझाव थे। उसने ये सारा कुछ अपने साथी इलाहाबादी छात्रनेता से शेयर किया। पहले बोलने का नंबर इन्हीं मेधावी छात्रनेता का आया। उन्होंने मानस की सारी बातें बहुत सलीके से, सिलसिलेवार तरीके से बैठक में रख दीं। मानस अपना नंबर आने पर कुछ नहीं बोला क्योंकि उसके पास अब बोलने के लिए कुछ बचा ही नहीं था। मेधावी छात्रनेता राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए प्रतिनिधि चुन लिए गए। मानस को समझ में आ गया कि पार्टी किसी द्वीप पर नहीं बसी है। जो दुनिया बाहर है, वहीं इसके अंदर भी है। जो करियरिज्म बाहर है, वह त्यागियों से भरी क्रांतिकारी पार्टी के भीतर भी मौजूद है।

आगे है : मानस के लिए जीवन बन गया बायोलॉजिकल फैक्ट

14 comments:

बाल किशन said...

अद्भुत लेखन है सर आपका. पर क्यों आप मानस को सुहान्भुती का पात्र नही समझते. आपका हर पन्ना मुझे उसका उपहास उड़ाता नज़र आता है. लेकिन मुझे आगे कि कहानी का इंतज़ार है और ये उम्मीद कि मानस के साथ भी कुछ अच्छा घटित होगा.

चौपटस्वामी said...

मैं सम्पादक/प्रकाशक होऊंगा तो इसे सबसे पहले छापूंगा . अभी तो पाठक के रूप में दम साध कर अगली कड़ी की प्रतीक्षा कर रहा हूं .

Gyandutt Pandey said...

मजा आ रहा है। धुर साम्यवादी काडर के प्रति थोड़ा सम्मान था, वह ध्वस्त हो रहा है।
यह भी वैसे ही हैं जैसे भाजपा के राज में आरएसएस वाले निकले!

रवीन्द्र प्रभात said...

बहुत सुंदर और सारगर्भित लेखन , मन में लगातार जिज्ञासा पैदा करती हुई चिंतन की अभिव्यक्ति , बधाईयाँ !

अभय तिवारी said...

गजब पोलखोल ..ज़बरदस्त..

Sanjeet Tripathi said...

बहुत ही बढ़िया लिख रहे हैं आप यह!!

एक तो तारतम्यता फ़िर बहाव फ़िर पाठक मन की उत्सुकता को ऐसे लाकर छोड़ते हैं कि मन में खुदबुदाहट सी मच जाती है कि आगे क्या होगा……

वाकई प्रियंकर जी सही कह रहे हैं, प्रतीक्षा!!

मीनाक्षी said...

आपके मानस की कथा पढ़ते पढ़ते मेरी वसुधा की रुकती साँसें फिर से चलने लगी हैं. जल्दी ही आपके पथ पर चलते हुए वसुधा को राह दिखाने का सोच लिया है.
आपका लेखन मार्ग दर्शन कर रहा है. धन्यवाद

parul k said...

आगे?????इतंज़ार मे बैठे हैं॥….।….।

Udan Tashtari said...

जबरदस्त समा बांधा है भाई..जारी रखो..आनन्द आ गया.दृश्य अच्छे खींच रहे हैं शब्दों से.

Pratyaksha said...

आगे बढ़ने के लिये और कितना पीछे आना पड़ेगा , देखते हैं ।

चंद्रभूषण said...

प्यारे भाई, ये लोग अपने जीवन की सबसे लंबी मुहिम पर निकले एक आदमी के पराजित होने, टूट-बिखर जाने का किस्सा सुनकर इतने खुश क्यों हो रहे हैं? क्या जो बंदे अच्छे बच्चों की तरह पढ़ाई करके ऊंची-ऊंची पगार वाली नौकरियां करने चले जाते हैं, वे ही अब से लेकर सृष्टि की अंतिम घड़ी तक संसार की युवा पीढ़ी का आदर्श होने जा रहे हैं? उनके जैसे तो आप कभी भी हो सकते थे और कुछ साल इधर-उधर गुजार चुकने के बाद आज भी हो गए हैं। फिर क्या अफसोस, कैसा दुख, किस बात का पछतावा? क्या भंडाफोड़, किस पोल का खोल? सीपीआईएमल-लिबरेशन किस देश या प्रदेश की सत्ता संभालती है, या निकट भविष्य में संभालने जा रही है? इसके नेता चाहे कितने भी गंधौरे हों, भाजपा, राजद, कांग्रेस टाइप दलों का छोटा से छोटा नेता भी उनसे कहीं ज्यादा नुकसान इस देश और समाज को पहुंचाता है। इन्हीं हरामजादों के गुन गाने की नौकरी हमारे-आप जैसे मीडिया में काम करने वाले लोग दिन रात बजाते हैं, लेकिन आपके किस्से की तारीफ करने वाले लोगों का स्वर कुछ ऐसा है जैसे पहली बार उन्हें किसी असली राक्षस के दर्शन हुए हों। मन बहुत खिन्न है। यदि संभव हो तो इस कटु वचन के लिए पहले की तरह एक बार फिर मुझे क्षमा करें- कहीं आपका यह लेखन ज्यादा से ज्यादा हिट्स के लालच में अपना टुंड दिखाकर लोकप्रियता की भीख मांगने जैसा तो नहीं है?

अनिल रघुराज said...

चंदू जी, सवाल ऊंची-ऊंची पगार पानेवालों को आदर्श मानने का नहीं है। सवाल है, जो नौजवान समाज के लिए ज्यादा उपयोगी हो सकता था, उसे कुंठा में डुबोकर किसी काम का नहीं छोड़ने का है। उत्पादक शक्तियों की बरबादी का है।
और, जो पार्टियां पहले से एक्स्पोज्ड हैं, उनके बारे में किसी को भ्रम नहीं है। जिनको लेकर भ्रम है, उसे छांटना ज़रूरी है। टुटपुंजिया दुकानों को क्रांति और समाज बदलाव का साधन मानने का भ्रम आप पाले रखिए, मुझे अब इनको लेकर कोई गफलत नहीं है।
रही बात आपके खिन्न मन और टुंड दिखाकर लोकप्रियता की भीख मांगने के आरोप की, तो मैं साफ कर दूं कि मैं पार्टी में रहता तो आपके बहुत सारे प्रिय लोगों की तरह आज टुंड दिखाकर भीख ही मांग रहा होता। आज मैं अपनी मेहनत से सम्मान की ज़िंदगी जी रहा हूं।
और, मुझे हिट ही पाना होता तो महोदय मैं सेक्स बेचता, टूटकर बनते-बिगड़ते किसान पृष्ठभूमि से आए एक आम आदर्शवादी हिंदुस्तानी नौजवान की कहानी नहीं कह रहा होता। ज़रा अपने अंदर पैठकर परखने की कोशिश कीजिए कि आप खिन्न क्यों हो रहे हैं?

आनंद said...

"...क्या भंडाफोड़, किस पोल का खोल?... आपके किस्से की तारीफ करने वाले लोगों का स्वर कुछ ऐसा है जैसे पहली बार उन्हें किसी असली राक्षस के दर्शन हुए हों।"

चंद्रभूषण जी, हम पाठक वर्ग हैं जो एक अच्‍छी कहानी पढ़कर अभिभूत हो रहे हैं। यह किसी को बेपर्दा करते या होते देखकर होने वाली प्रसन्‍नता नहीं है, हम मानस नामक पात्र के मोहभंग की प्रक्रिया को दम साधे देख रहे हैं। इतनी उत्‍सुकता इसलिए है कि मानस हमें कमज़ोरियों से भरा पूरा आम आदमी लगता है, और हम कहीं न कहीं अपना जुड़ाव महसूस करते हैं। बस इतनी सी बात है। यह कुल मिलाकार आदर्शों, सपनों की एक यात्रा है। यह रोचक है, और इसमें ईमानदारी की गंध है जो आजकल लेखन में दुर्लभ दिखाई देती है। यह अच्‍छे लेखन की सराहना मात्र है। कृपया इसे अन्‍यथा न लें।

आपकी प्रतिक्रिया भी हमें दिलचस्‍प लगती है और आप भी हमारी पसंदीदा सूची में शामिल हैं। कृपया आप अपनी संघर्ष यात्रा भी प्रस्‍तुत करें, शायद हमारा कुछ और ज्ञानवर्धन हो।

चौपटस्वामी said...

वह किस्सा जो भाई चंद्रभूषण को 'एक आदमी के पराजित होने, टूट-बिखर जाने का किस्सा' लग रहा है,मुझे एक सच्चे-ईमानदार और संवेदनशील आदमी के अंतर्द्वंद्व और जिजीविषा का जीवंत दस्तावेज़ लगता है.

युवा पीढी का आदर्श न तो ऊंची-ऊंची पगार पाने वाले करियरिस्ट होने चाहिए और न भ्रष्ट राजनेता-खिलाड़ी-सिने कलाकार . पर हो रहे हैं . हमारी-आपकी छटपटाहट के बावजूद हो रहे हैं . आदर्श तो गांधी होने चाहिए . पर हैं क्या ? अभी चंद्रभूषण जी ही अपनी ज्ञानात्मक टिप्पणी ठेल देंगे गांधी दर्शन की समालोचना में . पर अपनी वैचारिक यात्रा में साथी रहे नेताओं की आलोचना से आंतों में ऐंठन होती है . क्या किया जाए, हम ऐसे ही हैं . कोई वीतरागी तो हैं नहीं .

इधर एक फंडे से सबकी सहमति है . जो हुआ सो हुआ पर पुराने घाव क्यों कुरेदे जाएं . यह राजनीति के नरेन्द्र मोदी स्कूल की प्रमुख स्थापना है जो समय-समय पर सबको माफ़िक आती है . जैसे अभी चंद्रभूषण जी को रास आ रही है .

रही बात किस्सा सुन कर दांत चियारने की तो जो भकुआ चियार रहा हो सो चियार रहा हो,हम तो बात को पूरे 'कम्पैशन'-- पूरी सहानुभूति के साथ पढ-सुन रहे हैं .

बुरे लोग कहीं भी हों वे एक न एक दिन बेनकाब होंगे ही .कोई न कोई सच कहने की हिम्मत करेगा ही .टुंड तो बाहरी चीज़ है कई बार अनचाहे भी दिखता-दिखाता रहता है . पर अगर आत्मा कोढग्रस्त हो जाए तो क्या किया जाए ?

इसे मानस की कथा को बेचैनी के साथ पढ रहे एक सामान्य पाठक की टिप्पणी माना जाए जो अंतर्कथाओं से अपरिचित है .