Monday 5 November 2007

पुराने रास्तों ने आवाज़ दी – अमां, बैठो तो सही

मानस ने व्यवहार और सोच की समस्या को भावनाओं से हल किया। वह फौरन एक नए उत्साह से भर गया। लेकिन यह एक तात्कालिक समाधान था, इसकी पुष्टि तब हो गई जब वह बनारस होते हुए इलाहाबाद और फिर अपने घर जा रहा था। पहले बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के बॉटनी डिपार्टमेंट में रिसर्च कर रहे अपने बड़े भाई के कमरे पर गया। बड़े भाई को बहुत पहले से यकीन था कि वह जो कुछ अभी कर रहा है और आगे करेगा, अच्छा ही करेगा। इसलिए कई सालों बाद मिलने के बावजूद उससे ज्यादा सवाल नहीं किए। बस यूनिवर्सिटी गेट के सामने बसी लंका में ले गए और स्टुडियो में उसके कंधे पर हाथ रखकर एक फोटो खिंचवाई।

सुबह नाश्ता करके वह शहर में निकला कि पार्टी साथियों से मिलता-जुलता चले। वहां उसे पता चला कि पार्टी के एक बुजुर्ग नेता कुछ दिन पहले ही आए थे और डंके की चोट पर ऐलान करके गए थे कि मानस एक सामंती तत्व है। वह गरीब मल्लाह की एक लड़की की ज़िंदगी बरबाद करना चाहता है, लेकिन पार्टी कभी भी उसे इसकी इज़ाजत नहीं दे सकती। अगर कल को वह शादी करने के बाद उस लड़की को छोड़कर चला गया तो उस बेचारी का क्या होगा? मानस को लगा कि उसके त्याग का इससे बड़ा अपमान नहीं हो सकता। जिस रिश्ते को वह मध्यवर्गीय गलाज़त से मुक्त और अपने डि-क्लास होने का माध्यम बनाना चाहता था, उस रिश्ते की ऐसी तौहीन!!

मानस के अंदर तूफान-सा मच गया। कभी न गुस्सा होने वाले मानस की आंखें गुस्से से जलने लगी। किसी और से मिलने का कार्यक्रम रद्द कर वह सीधे भाई के पास गया। बताया कि वह नए सिरे से किसी नौकरी की तैयारी करना चाहता है और पूछा कि वह क्या उनके साथ रहकर ऐसा कर सकता है। मानस की उम्र दो महीने बाद 27 साल पूरी होनेवाली थी। भाई को ब्रोचा हॉस्टल में कोने का बड़ा-सा कमरा मिला हुआ था, जो असल में दो कमरों के बराबर था। उन्होंने कहा कि उन्हें इस पर रत्ती भर भी ऐतराज़ नहीं है और फिलहाल इतना स्टाइपेंड मिल रहा है कि खर्चे की भी कोई समस्या नहीं आएगी।

जिस दुनिया को वह हमेशा-हमेशा के लिए छोड़कर चला गया था, उस पराई दुनिया में पैर रखने का ठौर मिल जाने से मानस कुछ हद तक आश्वस्त हो गया। बस से बनारस से इलाहाबाद गया। फिर सिविल लाइंस के पास उतर कर पैदल ही प्रयाग संगीत समिति, हिंदुस्तानी एकेडमी और कंपनी बाग से होता हुआ यूनिवर्सिटी की साइंस फैकल्टी पहुंचा। सारे रास्ते इन जगहों पर गुजारे गए लम्हों को देखता रहा, बिसूरता रहा। विजयानगरम् हॉल के सामने म्योर टॉवर के पास वाले पार्क में करीब आधे घंटे बैठा रहा। हंसी-ठठ्ठे, स्टडी सर्किल के घेरे, पोस्टर चिपकाने की रातें, मैथ्य की क्लास में चुपके से आकर पिछली बेंच पर बैठ जाना... ऐसे तमाम दृश्य आंखों के आगे तैरने लगे। क्लास की सभी लड़कियों को दो कौड़ी का समझने की फितरत भी उसे याद आ गई। टॉपर लड़की की प्यार भरी मनुहार का बेरहमी से ठुकराना भी फ्लैश बनकर उसकी आंखों के सामने नाच गया। फिर सब ब्लैन्क होने लगा। लगा जैसे ब्लैक-आउट हो जाएगा।

वह बगैर कोई देर किए उठा और नया कटरा, पुराना कटरा से होते हुए लक्ष्मी चौराहे पर पहुंचा ही था कि छात्र संगठन की नेता और बीएससी में साथ पढ़नेवाली दीपिका टकरा गईं। वह भी पार्टी सदस्य थीं। उसे देखकर चौंकी। वहीं सड़क के किनारे बातचीत हुई। उसने बताया कि वह पार्टी छोड़ रहा है और अब घर जाकर जल्दी ही किसी गुड़िया टाइप लड़की से शादी रचाएगा। घर पर खेती-बारी इतनी है कि नौकरी की कोई ज़रूरत नहीं है। उसका सामंती आधार बड़ा पुख्ता है। उसने ये सारी बातें दीपिका के माध्यम से पार्टी को मुंह बिराने के लिए कही थीं। लेकिन दीपिका ने इसे फेस वैल्यू पर लिया और उसे सुंदर भविष्य के लिए शुभकामना देते हुए हाथ हिलाकर चली गईं।

उसके जाने के बाद वह चोट खाए नाग की तरह फुंफकारने लगा। उसे लगा, इतनी आसानी से अतीत पिंड नहीं छोड़नेवाला। लेकिन वह अतीत के इस खंड से निर्णायक जुदाई चाहता था। उसके दिमाग में रूसी लेखक पुश्किन की कहीं पढ़ी हुई लाइनें नाचने लगीं : जुदाई का हर क्षण संपूर्ण और अंतिम होना चाहिए। पीछे छोड़े हुए सभी स्मृति चिन्हों को मिटा देना चाहिए, पुलों को नष्ट कर देना चाहिए ताकि चाहकर भी किसी भी तरह की वापसी असंभव हो जाए।

आगे है - दुखवा मैं कासे कहूं री मोरी सजनी

11 comments:

Gyandutt Pandey said...

लौट के बुद्धू घर को आ रहे हैं। पर ये फ्यूडल बन जायेगा तो दूसरे छोर पर चला जायेगा। थोड़ा बीच में रोका जाये। कहानी में चेंज मांगता! :-)

काकेश said...

कहानी रोचक होते जा रही है.जारी रहे.

Pratyaksha said...

लेकिन कभी कभी लौटने की ज़रूरत भी पड़ सकती है न ।

Srijan Shilpi said...

बीच का कोई रास्ता नहीं होता। वह पहले से बना-बनाया नहीं होता। उसे अपने लिए बनाना होता है।

कथा-क्रम के आगे बढ़ने का इंतजार है।

अतुल said...

पहली बार पढी कहानी. इत्मिनान से पढूंगा

अतुल

Sanjeet Tripathi said...

सही, रोचक, प्रतीक्षा!!

अनुराग द्वारी said...

सर ... मैं मानस के बारे में रोज जानने के लिए बेताब हो रहा हूं ... शायद ये आपकी कलम का जादू ही है ... दूसरी बात अंततोगत्वा मैं अपने की बोर्ड से हिन्दी लिखने में सफल हो ही गया।

अभय तिवारी said...

सही जा रही है कहानी.. जारी रहें..

Udan Tashtari said...

बहुत रोचक और दिलचस्प हो गई है मानस की कहानी. अगले भाग की प्रतीक्षा है. बधाई.

swapandarshi said...

बहुत खूब!
इस रोचक कहानी की अगली कडी का इंतजार रहेगा.

बाल किशन said...

आपसे यही गुजारिश है मानस को हारने मत दीजियेगा.