Saturday 9 June 2007

विजयी कौन, सुखी कौन

प्रमोद ने पूछा है कि ये बताइये, ये विजयी कहाए हुए जो दूसरों का लहू पिए जा रहे हैं इनकी कोई पहचान हुई? कहते हैं कि इनकी शिनाख़्त करने के चक्‍कर में रोज रोज़ थकते रहते हैं। तो, साफ बता दूं कि इनकी शिनाख्त को लेकर इधर मैं भी काफी कन्फ्यूज चल रहा हूं, क्योंकि आज मैं ऐसे तमाम ईमानदार लोगों को जानता हूं जो अपनी मेहनत और काबिलियत से शानदार कामयाबी तक पहुंचे हैं। जैसे, मुझे कुछ ही दिन पहले पता चला कि मेरे गांव के एक लड़के ने आईआईटी-बॉम्बे से बी.टेक. और एम.टेक करने के बाद आईआईएम-बैंगलोर से एमबीए किया और 28 साल की उम्र में ही मैकेंजी में एसोसिएट है। उसकी सालाना तनख्वाह 28 लाख रुपए है यानी महीने में 2.33 लाख की पगार। जिस गांव का मैं पहला शख्स था जो विदेश नौकरी करने गया था, वहां के एक पंडित जी अभी नीदरलैंड में और एक बाबू साहब जापान में नौकरी कर रहे हैं।
मेरे मां-बाप की पीढ़ी में लोग रिटायर होने पर पेंशन और दूसरे फंड के पैसों से घर बनवाते थे। आज तो 30-35 साल के लड़के-लड़कियां ही मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों में अच्छा-खासा फ्लैट खरीद ले रहे हैं। इनमें से शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसके बारे में कहा जा सकता है कि उसकी विजय के पीछे दूसरों का लहू है। उदारीकरण के बाद आज निजी क्षेत्र में लाखों की तनख्वाह पाने वाले और कुछ हो सकते हैं, लेकिन भ्रष्ट नहीं। लेकिन यही बात आईएएस, आईपीएस, पीसीएस या इनकम टैक्स अफसरों के बारे में नहीं कही जा सकती। मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और नेताओं के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती है। आईएएस, आईपीएस वगैरह की तनख्वाह 30-35 हजार से ज्यादा नहीं होती, लेकिन उनके महीने के खर्च लाखों में होते हैं, लखनऊ से लेकर मुंबई तक में शीशमहल होते हैं। जाहिर है ऊपर के लाखों-करोंड़ों भ्रष्टाचार से आते हैं। नेताओं की तो बात ही निराली है। मनमोहन सिंह जैसे चंद लोग भले ही ईमानदार हों, बाकी नेता तो पांच सालों में ही सात पुश्तों का इंतजाम कर लेते हैं। इनके बारे में निराला की लाइनें यकीनन सही हैं।
साहित्य और पत्रकारिता में भी कहा जा सकता है कि खुला भेद विजयी कहाए हुए जो लहू (हक) दूसरों का पिए जा रहे हैं। साहित्य में मठाधीशों की कृपा हो तो कहां-कहां के जुगाड़ू, शब्दों के परमुटेशन-कॉम्बीनेशन से खेलनेवाले अद्री-बद्री और देवी-वोबी, आधि-व्याधि महान कवि बन जाते हैं। अच्छी बात ये है कि कहानीकारों पर मठाधीशों का ठप्पा नहीं चलता। पत्रकारों में भी हालत यही है कि खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान।
कॉरपोरेट सेक्टर में कोटा-परमिट राज खत्म होने के बाद भ्रष्टाचार काफी घट गया है। जोड़-तोड़ और नेटवर्किंग अब भी चलती है। अंबानी और सुब्रतो राय अब भी हैं, लेकिन नारायण मूर्ति से लेकर अजीम प्रेमजी अपनी काबिलियत से ही ऊपर उठे हैं। इसलिए संक्षेप में मैं यही सकता हूं कि क्योंकि उदारीकरण के बाद से देश में भ्रष्टाचार अपेक्षाकृत घटा है, इसलिए लहू पिये बिना भी विजयी होने के अवसर खुल गए हैं।

6 comments:

अनूप शुक्ला said...

अच्छा लेख लिखा है। बेइमानी विविध्यपूर्ण भी हो गयी है। अगर इमानदारी से कमाकर धनी बन जाने के अवसर बढ़े हैं तो बेइमानी की सहज स्वीकार्यता भी बढ़ी है।

Pramod Singh said...

बातचीत के लहजे में इन्‍स्‍टैनटेनियस विवेकी लेखन का सुंदर नमूना.. सीधे में ढेरों बात कही.. जिन्‍हें फ़ि‍क्र होगी, सब थोड़ा-थोड़ा सीखेंगे..

चंद्रभूषण said...

अनूप की टिप्पणी महत्वपूर्ण है। एक अच्छी मिसाल की आड़ में एक हजार बुराइयां पहले भी होती थीं, आज भी हो रही हैं। लेकिन बेईमानी और लूट का नैतिक प्रतिरोध खत्म हो जाना भारतीय सभ्यता के पूरे इतिहास में बोफोर्सोत्तर भूमंडलीय युग की अपनी खासियत है। निराला की कविता विजेताओं को शक की नजर से देखने की तमीज सिखाती है, जो आज पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है। नारायण मूर्ति जो कुछ भी हैं, वही सारा कुछ उससे एक हजार गुना ज्यादा बिल गेट्स हैं। लेकिन अपना धंधा जमाए रखने के लिए बिल गेट्स ने कितने आविष्कारकों का जीवन नष्ट किया है और कितने लोगों के पेट पर लात मारी है, इसका पता अमेरिका को ही नहीं पूरी दुनिया को धीरे-धीरे चल रहा है। मार्क्स की उक्ति है- 'मुद्रा जब पैदा हुई तो उसके माथे पर खून का एक टीका था, लेकिन पूंजी जब पैदा हुई तो नख से शिख तक वह खून और मवाद में डूबी हुई थी।' मुझे लगता है आज की 'स्वच्छ पूंजी' भी इस विशिष्टता से मुक्त नहीं है और शुरू में कुछेक साल रह भी जाए तो उसे ऐसा बनते देर नहीं लगती। निराला को यह समझ मार्क्स से नहीं मिली थी, न ही यह सिर्फ पूंजी और पैसे वालों के संदर्भ में जाहिर हुई है। सदियों से विजयी नायकों के सम्मोहन में जीते आए अपने इस समाज में विजेताओं के गर्हित पक्ष को इंगित करना खुद में एक बड़ी बात है। इसमें मैं यह जोड़ना चाहूंगा कि विजेता होने की स्थिति में हमें आत्म-सम्मोहन से मुक्त होकर एकाध बार खुद को भी इस नजर से देख ही लेना चाहिए कि कहीं हमने भी तो गाहे-बगाहे किसी का खून पीना नहीं शुरू कर दिया है!

अनिल रघुराज said...

चंदू ने एकदम सही कहा है। इस पहलू पर सोचना और लिखना जरूरी है। मेरा बस यही कहना है कि हमारी आंखों के सामने जमाना काफी तेजी से बदल रहा है। फिर,कोई भी अर्ध-सामंती और अर्ध-औपनिवेशिक समाज विकास के क्रम में पूंजीवाद की सीढ़ी नहीं फलांग सकता। अपने यहां देशज पूंजीवाद विकास का क्या स्वरूप होगा और इसकी कौन-सी शक्तियां अभी मौजूद हैं और उभर रही हैं, इसकी पहचान करने की जरूरत है।

samar said...
This comment has been removed by the author.
samar said...

अनिल जी,
आपने सही कहा है कि ईमानदारी से पैसे कमाने के जरिये बढ़े हैं, मौके बढ़े हैं। लेकिन ये सिर्फ एक बात है। पूरी तस्वीर नहीं। ये कहना कि भ्रष्टाचार का ताल्लुक सिर्फ पैसे से है .. सही नहीं है। ये भी कहना कि मनमोहन सिंह ईमानदार हैं, सही नहीं होगा। मनमोहन सिंह नैतिक तौर पर एक भ्रष्ट नेता हैं। भ्रष्ट इसलिए कि जब लक्ष्मी मित्तल को आर्सेल खरीदने में दिक्कत आती है तो वो उस कंपनी के एजेंट के तौर पर जाकर फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति शिराक से बात कर आते हैं। लेकिन उनमें इतना साहस नहीं होता कि ठांस कर कह सकें कि लक्ष्मी मित्तल और उनके जैसे तमाम धनपशुओं को अपनी कमाई का कितना हिस्सा देश के विकास पर खर्च करना है। यही नहीं रिलायंस फ्रेश पर जब हमले होते हैं तो वो तुरंत झारखंड के मुख्यमंत्री मधु कोडा से बात करके कहते हैं कि कानून व्यवस्था कि स्थिति नहीं बिगड़ जाए। लेकिन डेरा सच्चा सौदा विवाद हो या फिर कोई और .. उन पर चुप्पी तोड़ने में उन्हें काफी वक्त लगता है। किसानों की भूखमरी पर बोलने में हालत खराब होती है। इसलिए मनमोहन सिंह हो सकता है कि पैसे के मामले में ईमानदार हों ... लेकिन नैतिक और राजनीतिक स्तर पर पूरे के पूरे भ्रष्ट और बेईमान हैं। दूसरी बात हमारे, आपके जैसे न जाने कितने लोग निजी क्षेत्र में नौकरी कर रहे हैं। लेकिन क्या आप दिल पर हाथ रख कर कह सकते हैं कि हम अपने पेशे के प्रति पूरी तरह ईमानदार हैं। शायद नहीं। साथ ही मजबूरी और अधिकार क्षेत्र का हवाला देकर भी ये कह देना कि हम भ्रष्ट नहीं हैं। सही नही होगा। सच बात तो यही है कि हमारे देश में भ्रष्टाचार काफी हद तक स्वीकार्य हो चुका है। साथ ही खुद को ईमानदार बताने के हमारे पास ढेरों तर्क हैं। ऐसा करनेवालों में मैं खुद को भी शामिल पाता हूं क्योंकि चंद तर्क मेरे पास भी हैं।