लो, लौट आई पहली दुल्हिन

इतनी उम्र हो गई। बाल सफेद होने लगे। लेकिन अंदर का बच्चा अब भी वैसा ही है जैसा चार-पांच साल की उम्र में था। तभी तो आज मनहर की बालकनी में अचानक एक लंगड़ी गौरैया आकर फुदक-फुदक करने लगी तो वह बिना कुछ सोचे-समझे शरमा गया, उसी तरह जैसे बचपन में गांव के आंगन के मुंडेर पर लगड़ी गौरैया आकर बैठती थी तो अइया कहती थी कि लो आ गई तुम्हारी दुल्हिन और उसका चेहरा हल्का-सा लाल हो जाता था। उंकड़ू-मुकड़ू होकर वह अपनी दुल्हिन की तरफ देखता। फिर कूदता-फांदता आंगन के बाहर निकल घर की ड्यौढ़ी से बाहर दरवाजे पर निकल जाता।
ये खेल तब शुरू हुआ था कि चाचा की शादी में वह सहबाला बनकर घोड़ी पर बैठा था। वहां से लौटते ही उसने अइया और बुआ से जिद कर डाली कि उसकी भी शादी फौरन की जानी चाहिए। उसने जिद की तो एक साल बड़े भाई कहां चुप रहने वाले थे। दोनों अड़ गए कि शादी अभी और तुरंत होनी चाहिए। फिर एक दिन अइया ने शुभ संदेश दिया कि दोनों के लिए दुल्हिन ढूंढ़ ली गई है। मनहर की शादी आंगन में बराबर धान चुगने और पानी पीने आनेवाली लंगड़ी गौरैया से कर दी गई, जबकि बड़े भाई के लिए दुल्हिन चुनी गई छछूनरिया, वो छंछूदर जो बराबर घर के पंडोह (नाले) से बाहर-भीतर करती रहती थी। मनहर और अजहर में खूब लड़ाई होती कि तुम्हारी तो दुल्हिन लंगडी है कि तुम्हारी दुल्हिन तो छछूनर है।
मनहर के जेहन में यादों का झोंका हिलोरें मारने लगा। लेकिन उसने खुद को संभाला और किसी तरह नॉस्टैल्जिक न होने की कोशिश करने लगा। आखिर अब पुरानी यादों का करना क्या है! अइया को गुजरे 27 साल हो चुके हैं। बुआ पांच साल पहले विधवा हो गईं। वह अब खुद दो बेटियों और एक बेटे का बाप है। लेकिन गौरैया का आना उसे महज संयोग भर नहीं लगा। उसने कुछ दिन पहले ही अखबार में खबर पढ़ी थी कि गौरैया 1993 के बाद अब जाकर मुंबई में वापस आ रही हैं। उसे याद आया कि वह पहली बार 1993 में ही मुंबई आया था, नये काम धंधे की तलाश में। लेकिन बात नहीं बन पाई तो वह दिल्ली लौट गया।
दिल्ली में काम भी मिला, नाम भी और पैसा तो फिर मिलना ही था। लेकिन मुंबई आने की ललक उसे बराबर खींचती रही क्योंकि यहां उसके कुछ ऐसे सखा थे जिनको वह तहेदिल से अपना मानता था, उनमें अपना ही विस्तार देखता था। आखिरकार करीब पांच महीने पहले वह किसी तरह जुगाड़ करके मुंबई आ पहुंचा। तो, लो अब मुंबई में गौरैया भी वापस आ गई। क्या बात है।
वैसे, बताते हैं कि महानगर में बढ़ते प्रदूषण, घटते पेड़ों और बिना मुंडेरों की ऊंची-ऊंची इमारतों की भरमार हो जाने के कारण गौरैया कहीं दूर गांवों की तरफ निकल गई थी। लेकिन सब चीजें तो वैसी ही हैं, फिर क्यों गौरैया वापस मुंबई लौट आई? क्या उसके मुंबई आने और लंगड़ी गौरैया के बालकनी पर फुदकने में कोई रिश्ता नहीं है?
कोई तो रिश्ता है, नहीं तो ऐसा क्यों होता कि उसके मुंबई आने के बाद अब दिल्ली से गौरैया के गायब होने की खबरें आने लगी हैं। बताते हैं कि दिल्ली में गौरैया का दिखना ईद के चांद जैसा हो गया है। जानकार बताते हैं कि गाड़ियों में अन-लेडेड पेट्रोल के इस्तेमाल से ऐसी गैसें निकलती हैं जिनसे छोटे-छोटे कीड़े मर जाते हैं और गौरैया अपनी खुराक से महरूम हो जाती है। दूसरी बड़ी वजह है कि राजधानी में अब ऐसे घर बनने लगे हैं कि गौरैया को घोंसला बनाने का कोई ठौर ही मिलता। ठौर मिलता है तो अंग्रेज़ों के जमाने के बने नेताओं के बंगलों में। लेकिन जहां नेता जैसे बाज हों, वहां मासूम गौरैया कैसे टिक सकती है।
दिक्कत ये है कि अपने यहां गौरैया के इस तरह मिटते जाने की कोई खोज-खबर लेनेवाला नहीं है। उनकी गिनती तक किसी के पास नहीं है तो उसे गायब होने की फिक्र कौन करेगा। कुछ सालों पहले यूरोप में भी ऐसा हुआ था जब वहां की करीब 85 फीसदी गौरैया गायब हो गई थीं। उन्होंने बिना वक्त गंवाए फौरन इसे रोकने का इंतजाम किया। लेकिन अपने यहां जहां हर साल 45,000 इंसानी बच्चे गायब हो रहे हैं, वहां गायब हो रही चिड़िया का पता कौन लगाएगा।
खैर, इन बौद्धिक बातों को छोड़िए। फिलहाल मुंबई में बारिश शुरू हो गई है। लंगड़ी गौरैया के आने से मनहर के मन का गीलापन और तर हो गया है, मीठा हो गया है। वैसे भी मनहर को बारिश का मौसम बहुत अच्छा लगता है। ऊपर से पहली दुल्हिन की वापसी। लगता है आगे सब कुछ शुभ-शुभ ही होनेवाला है।

Comments

Rising Rahul said…
अच्छा... अभी नोयडा मे बहुत ग़ौरैया बाक़ी हैं जो मरी नही और न ही कही चली गयी ख़ुद मेरे घर मे तीन चार रहती हैं . रोज़ मैं उन्हे चावल देता हूँ और घर का कूड़ेवाला 5-5 दिन तक कूड़ा नही ले जाता तो उसमे भी कीड़े पलने लगते हैं . फिर तो ग़ौरैइयों की मौज हो जाती है . एक बार गाव मे हम और हमरे चाचा शीशा और मौनी से ग़ौरैया पकड़े थे और उसके पैर मे धागा बाँध के ख़ूब उड़ाए थे . ग़ौरैया है इसलिए उसके ना होने का तो दुख नही है लेकिन गाव से मौनी ग़ायब होते रहना बहुत ख़राब लगता है . अब तो ना मौनी दिखती हैं और ना बेना और ना सिकाहुला . और रही बात 45 हज़ार बच्चों की तो जब तक इस देश मे मोनिंदर और सी बी आई रहेंगे , कोई नही देखने वाला , बस कुछ दिन लोग चिल्लाते हैं फिर शांत होकर बैठ जाते हैं . लोगों के लिए तो हत्यारी जगह पीकनिक की ख़ूबसूरत जगह बन जाती है .

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