Friday 15 February 2008

विजिटर हुए 22,242 पर पाठक तो 200 ही हैं!

है तो यह विशुद्ध चिरकुटई। लेकिन जब ब्लॉगरों की बस्ती में खोली ले ही ली है तो समाज के रीति-रिवाज, चाल-ढाल से अलग कैसे रह सकता हूं? तो, जब मेरे ब्लॉग ने कल शाम 22,242 विजिटर्स और 38,591 पेज व्यूज़ का आंकड़ा छुआ तो मेरी इच्छा हुई कि मैं भी इस बारे में एक पोस्ट डाल ही दूं। ब्लॉग तो मैंने बहुतों के साथ फरवरी 2007 में ही बना लिया था, लेकिन ब्लॉगिंग का सुरूर मुझ पर जुलाई 2007 से चढ़ा। उसके बाद से अब तक के आठ महीनों में करीब बीस हज़ार विजिटर, यानी ढाई हज़ार आगंतुक हर महीने, मतलब रोज़ के औसत 80-85 ‘पाठक’। मुझे लगता है कि यह अंग्रेजी या चीनी ब्लॉगिंग के औसत दमखम के सामने डूब मरने की बात है।

डूब मरने की बात इसलिए भी है कि क्योंकि भले ही हिंदुस्तानी की डायरी के ‘पाठकों’ की संख्या 22,242 के फैंसी नंबर तक पहुंच गई है, लेकिन आप भी जानते हैं और मुझे भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि इन नंबरों में गज़ब का छलावा है क्योंकि असली पाठक ज्यादा से ज्यादा 200 ही होंगे। पाठकों का वही सेट है जो बार-बार हमारे ब्लॉग पर आता है। रोज़ के वही पाठकजी, मिश्राजी, पांडेजी, दलितजी, पिछड़ेजी, बंटी-बबली और उनके मम्मी-पापा। बार-बार इनके आने से साइटमीटर का आंकड़ा सुस्त रफ्तार से ही सही, बढ़ता रहता है और इस तरह बूंद-बूंद से घड़ा भरता जाता है। लेकिन हकीकत यही है कि हर महीने अपने ब्लॉग से बमुश्किल दस पाठक ही नए जुड़ते होंगे।

इस समय हिंदी ब्लॉगों की संख्या 2000 के करीब पहुंच चुकी है। ऐसे में अगर किसी ब्लॉग पर 10 फीसदी ब्लॉगर (यानी 200 पाठक) भी नियमित नहीं आते तो उस ब्लॉगर को अपने लेखन पर गहराई से विचार करना होगा। मान लीजिए हमने ब्लॉग को उत्पाद/सेवा मानकर उसकी मार्केटिंग रणनीति भी तैयार कर ली और दोस्तों को कहने से लेकर टैग से सर्जइंजन को खींचने की हर तिकड़म भिड़ा ली, तब भी क्या फायदा? ब्लॉग कोई फ्रिज, टेलिविजन या एसी जैसा उत्पाद तो है नहीं कि एक बार खरीद लिया तो ग्राहक कई सालों के लिए फंस गया। ये तो चाट/चाय की दुकान या अखबार की तरह है, जहां ग्राहक हर दिन आए, तभी कोई फायदा है। क्या अफीम की कोई ऐसी पुड़िया है जो पाठक को बार-बार हमारे ब्लॉग पर आने को मजबूर कर सकती है?

अंत में एक अनसुलझा सवाल। कल दिन में बातचीत के दौरान पत्नी ने बड़ा सहज और सामान्य-सा सवाल उठाया, जिसका ब्लॉगर्स से संबंध है भी और नहीं भी है। सवाल यह था कि लोगों में अटेंशन पाने की इतनी अकुलाहट क्यों रहती है? लोगबाग एप्रिसिएशन के इतने भूखे क्यों रहते हैं? मैंने यहां-वहां से लमतड़ानी झाड़ने की कोशिश की कि इंसान सामाजिक प्राणी है। कुनबे से लेकर कबीले तक कितने लोग उसे जानते-मानते हैं, इसी से उसकी शख्सियत बनती है। सदियों का वही सिलसिला आज आदमी को अटेंशन पाने की अकुलाहट तक ले गया है। वैसे भी बाज़ार के मौजूदा जमाने में ज्यादा से ज्यादा स्वीकृति वाली चीज़ ही चलती है। तो, अटेंशन या एप्रिसिएशन आज के दौर में अंतर्निहित बुनियादी सोच है। लेकिन इस जवाब से न तो मेरी पत्नी संतुष्ट हुईं और न ही मैं।

(नोट: ये पोस्ट बुधवार को रात लिखी थी, लेकिन वायरस अटैक में कंप्यूटर बैठ गया। कल गुरुवार को रात में कंप्यूटर को रीफॉर्मैट कराया गया। उसी के बाद आज सुबह इसे मामूली फेरबदल के साथ पेश कर रहा हूं)

9 comments:

Pramod Singh said...

बंटी-बबली और उनके मम्‍मी-पापा.. और मुझे बुरा लग रहा है कि हमें कमतर बताया जा रहा है.

संजय तिवारी said...

उनका सवाल जायज है और इस सवाल उस आम भारतीय की समझ भी झलकती है जिसके बारे में हम अक्सर बात नहीं करते.

बहुत कम लोग होते हैं जिनका होना भी न होने जैसा होता है. और आश्चर्य कि उन्हें इस बात का कोई दुख नहीं होता कि उनके बारे में अटेन्शन नहीं है. अटेंशन खींचने की ललक तो मेरे जैसे कमअक्लों में ज्यादा रहती है जो समझ के दायरे से बाहर निकल अपने आपको बुद्धिमान मान बैठते हैं.

जोशिम said...

अनिल जी - छोडिये appreciation वगैरह थोड़ी देर के लिए - [ उम्मीद तो आख़री साँस तक है - शाश्वत सचों पे सवाल का क्या जवाब ? ] - इस के अलावा - यहाँ आप वो लिख रहे हैं जो (शायद) आप लिखना चाहते हैं - और जो आपको पढ़ रहें हैं वो वैसा पढ़ना चाहते - कैसा समाज - क्या रीति रिवाज़ - चाल ढाल ? - तमाम अखबार किताबें तो हैं न उसके लिए - दस हों या दस लाख - लिखैवती लिखैवती उस्ताद जी - सादर मनीष - माता पिताओं में एक -[इहाँ पइसा - ऊसा न बनी कबहूँ :-)]

Rohit Tripathi said...

dhire - dhire hi sahi lekin hum top par jayege. kal se hi hindi mein blog likhna start karta hu aur phir dekhta hu ki visitor kaise nahi aate ;-)

latest Post :Urgent vacancy for the post of Girl Friend…

भुवन भास्कर said...

एक हिन्दी ब्लॉगर होने के नाते 22,000 आगंतुकों के आंकड़े होने का महत्व मैं भलीभांति समझ सकता हूं और इसलिए आपको ढेर सारी बधाइयां। लेकिन थोड़ा कंफ्यूजन पैदा हो गया है। आपने कहा है कि अगर किसी को 200 पाठक भी न मिलें, तो उसे अपने लेखन के बारे में सोचना चाहिए। लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि पाठकों की संख्या के बारे में संवेदनशीलता से बचना एक ब्लॉगर के लिए सबसे बड़ी चुनौती होनी चाहिए। अपने शीर्षक में बलात्कार, संभोग, सेक्स जोड़ दीजिए और देखिए पाठकों की संख्या उमड़ पड़ेगी। लेकिन हम सबने क्या अपने ब्लॉग की शुरुआत केवल खुद को अभिव्यक्त करने के लिए ही नहीं किया था? अगर हम यहां भी टीआरपी के चक्कर में पड़ गए सर, तो चुपचाप अपने-अपने चैनलों की टीआरपी बढ़ाने में ही ऊर्जा लगाना बेहतर था। बाकी पाठक संख्या बढ़ाने के लिए जिन तिकड़मों का आपने जिक्र किया है, वो तो अपनी जगह हैं हीं। मुझे लगता है कि लेखन की पूर्णता लिखने के बाद खुद महसूस हो जाती है, हां इसे अगर पाठकों का समर्थन और प्यार मिले तो मज़ा कई गुना हो जाता है। लेकिन फिर भी....इन सबके बावजूद इस जोरदार पाठक संख्या के लिए एक बार फिर बधाई।

Sanjeet Tripathi said...

देखिए, ब्लॉग को उत्पाद मानकर प्रचार करने से पाठक आएंगे तो सही लेकिन लेखन में दम होगा तभी यह पहली बार आने वाला पाठक लौट-लौट कर फिर आएगा ही। और आपमें यह खूबी, बखूबी है कि आप पाठक को बांध सकें।

दूसरी बात यह कि गरिष्ठ लेखन या सदा गंभीर लेखन से एक खास पाठक वर्ग ही रेगुलर पाठक बनेगा खास से आशय है कि बुद्धिजीवी वर्ग। बाकी कतराकर निकल लेंगे।

यह दोनो बातें मैने साल भर ब्लॉगजगत मे रहकर ही सीखी है।

ब्लॉगर्स की संख्या से पाठक कहीं ज्यादा है और ऐसे पाठक और भी ज्यादा है जो टिप्पणियां बहुत ही कम करते हैं।
अक्सर मुझे ऐसे लोग टकराते हैं जो कहते हैं कि हां वह फलां-फलां के ब्लॉग्स पढ़ते हैं लेकिन कभी टिप्पणी नही करते, कुछ करना नही चाहते कुछ सोचते है कि हिंदी लिखना नही आता तो कैसे करें।

अटेंशन की ललक तो मुझ जैसे अधजल गगरी छलकत जाए वालों में कुछ ज्यादा ही होती है।

Srijan Shilpi said...

जैसे वृक्षों की झुरमुट के बीच किसी डाल पर बैठी कोई चिड़िया चहचहाती रही होती है और हम बगल की पगडंडी पर गुजरते हुए कुछ पल ठिठक कर उसकी मधुर चहचहाहट सुनने लगते हैं, जैसे नदी की मंझधार में नैया खेते हुए किसी मांझी की ऊंची तान हमारे कानों तक पहुँचती है तो हम उसके गीत के अर्थों की गहराई में कुछ देर गोते लगाने लगते हैं, वैसे ही चिट्ठों के असली पाठक भी होते हैं। किसी चिड़िया को, किसी मांझी को पता नहीं होता कि कोई उसे सुन रहा है ध्यान से, कोई अपेक्षा नहीं होती कि कोई प्रतिक्रिया देगा, कोई उम्मीद नहीं होती कि उसके सुर की खासियत को कहीं पहचाना जाएगा, कोई शाबाशी, प्रशस्ति मिलेगी। ब्लॉगर यदि उसी चिड़िया या मांझी की तरह का अंतर्भाव रख सके तो वह निर्मल आनंद के सागर में गोते लगा सकेगा। जब तक वह सचेत भाव से किसी प्रयोजन या प्रत्याशा से ब्लॉगिंग करता रहेगा, उसकी कसक कहीं न कहीं बनी रहेगी। अफीम के नशे की लत की तरह किसी का ब्लॉग लिखना और किसी पाठक का किसी ब्लॉग तक पहुंचना चेतना की सेहत के लिए अच्छा नहीं है।

Gyandutt Pandey said...

यह सृजन शिल्पी अगर कॉपी-पेस्ट की इजाजत दें, तो मैं वही टिप्पणी में डालना चाहूं!

सागर नाहर said...

भुवन भास्कर जी ने बहुत बढ़िया बात कही है।