Thursday 7 February 2008

बड़ा तो हो गया, पर अंदर से अभी कच्चा हूं

मित्रों, हम सभी को आगे बढ़ते जाने के लिए आश्वस्ति ज़रूरी होती है। मैं भी इससे भिन्न नहीं हूं। यही आश्वस्ति पाने के लिए कल की पोस्ट मैंने लिख डाली। और, आप लोगों ने जिस तरह टिप्पणियां बरसाई हैं, उससे मेरा मन साल भर के लिए लबालब भर गया। अब तो साल भर कोई एक भी टिप्पणी नहीं करेगा तब भी मैं मगन होकर लिखता रहूंगा। मेरे एकालाप को संवाद में बदलने के लिए आप सभी का तहेदिल से शुक्रिया। आपने दिखा दिया कि सौ-दो सौ पाठकों में से कम से कम तीस-पैंतीस लोग हैं जिनकी निगहबानी मुझ पर है। बस, इतना बहुत है मेरी आश्वस्ति के लिए।

बचपन में अक्सर होता था कि पैदल मेला जाते वक्त या कस्बे से गांव के पांच कोस के सफर मे अपनी खिलंदड़ी में भागता-कूदता चलता चला जाता था। घंटे-आध घंटे में सुनाई पड़ता था कि कोई पीछे से बुला रहा है। बुलानेवाले कभी मां-बाप होते थे तो कभी बड़े भाई-बहन या मुझसे बहुत प्यार करनेवाली बुआ। कभी-कभी यह भी होता था कि अपनी धुन में इतना आगे निकल आता था कि पीछे मुड़ने पर कोई दिखाई नहीं देता था। गांव तक के रास्ते में बीच में करीब दो किलोमीटर का ढाक का जंगल पड़ता था और ढाक के पेड़ों में तो आप गुम हो गए तो भटकते रहिए। केवल आवाज़ सुनाई पड़ती थी और जब कोई एकदम पास जाता था, तभी दिखता था। छोटा था तो सियार से लेकर भूत-प्रेत तक का डर सताता था। और, ढाक के जंगल में अकेला पड़ने पर डर के मारे मेरी रूह कांप जाती थी।

आज बडा़ हो गया हूं, बल्कि काफी बड़ा हो गया हूं। चार-पांच साल में बेटियां शादी करने लायक हो जाएंगी। लेकिन बहुत कोशिश करने पर भी आठ-दस साल का वो छोटा बच्चा अंदर से गायब नहीं हो पाया है। इसीलिए आज भी अपनी रौ में बहता हुआ बिना साथ वालों की परवाह किए हुए खिलंदड़ी कर बैठता हूं। मन में आ गया तो बिना कुछ सोचे-समझे नौकरी छोड़ देता हूं। ये अलग बात है कि ऊपरवाले की मेहरबानी से फौरन नई नौकरी मिल भी जाती है। वरना, आज की मारामारी में नौकरी मिलना कितना मुश्किल है, आप जानते ही हैं।

तो... अपनी रौ में बहते-बहते जब एक अरसा हो जाता है तो अचानक अकेले हो जाने का वही बचपन वाला डर सताने लगता है। पीछे मुड़कर देखता हूं तो दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं देता। ठीक ऐसे ही मौके पर एक आश्वस्ति की ज़रूरत होती है कि कोई कहे कि तुम अकेले नहीं हो बंधु। देखो, कितनों ने तुम पर नज़र रखी हुई है। साल भर से अपनी रौ में डूबकर ब्लॉग पर लिखता जा रहा था। कचरा-अधकचरा जो भी मन में आया लिख दिया। लेकिन साल भर बीतने के बाद लगा कि देखूं – जो मुझे पढ़ते हैं, उनसे मेरा कितना तादात्म्य बन पाया है। और, आप सभी ने दिखा दिया कि अंधेरे में चलाए गए तीर जाकर शून्य में नहीं विलीन हो रहे हैं। कुछ लोग हैं जो उन्हें पढ़ते हैं और गुनते हैं।

मैं असल में यही चाहता हूं कि अपनी सोच के ज़रिए आपकी सोच को भी उद्वेलित कर दूं। कंकड़ मारकर अपनी और आपके अंदर-बाहर की दुनिया में हलचल पैदा कर दूं। फिर हम सभी मिलकर अपने वर्तमान को समझें, अतीत को आत्मसात करें और भविष्य का तर्कसंगत खाका बुनें। दुख से मुक्ति संभव नहीं है, लेकिन दुख के कारणों को लेकर हम भ्रम में न रहें। और, ईमानदारी से कहता हूं कि मेरे पास कोई बनी-बनाई दृष्टि नहीं है। मैं तो आप सभी के संपर्क और संघर्षण से वह सम्यक दृष्टि पाना चाहता हूं। मेरे लिए लिखना सिर्फ भावी कमाई का ज़रिया नहीं है, वह सच तक पहुंचने की एक निरंतर साधना भी है। इसलिए उसमें सामयिक व्यवधान आ सकते हैं, लेकिन मैं उसे छोड़ नहीं सकता। हमारी सरकार अगर पश्चिमी देशों की तरह बूढ़ों के ससम्मान जीवनयापन की गारंटी कर देती, तब तो मुझे ब्लॉग से कमाई की बात सोचने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती।

एक बात और स्पष्ट कर दूं। मुझे अच्छी तरह पता है कि हिंदी के पाठक अचानक कहीं आसमान से नहीं टपक पड़ेंगे। हम जो हिंदी के 1500-2000 ब्लॉगर हैं, फिलहाल उनसे हज़ार-दो हज़ार ज्यादा ही हिंदी के संवेदनशील व चिंतनशील पाठक होंगे। हिंदी में ऐसे पाठकों की संख्या लहरों की तरह बढ़ेगी। ऐसा नहीं है कि वे पहले से करोड़ों की तादाद में कहीं बैठे हैं और इंटरनेट के दायरे में आते ही ब्लॉग पर टूट पड़ेंगे। सच यही है कि हम ही लेखक है, हम ही पाठक हैं, हम ही हरकारे हैं और हम ही श्रोता है। हम ही नए पाठकों के सृजक और उन्हें खींचकर लाने का ज़रिया भी बनेंगे। कल तो मैंने यूं ही छेड़ने के लिए लिख दिया था कि, “तब तक शायद इंतज़ार करना ही बेहतर है जब तक हिंदी ब्लॉगिंग की दुनिया ब्लॉगर्स के दायरे से निकलकर असली पाठकों तक नहीं पहुंच जाती। तो आप लोग फसल तैयार कीजिए। जब पककर तैयार हो जाएगी तो इत्तला कर दीजिएगा।”

9 comments:

Sanjeet Tripathi said...

एक बहुत बड़ा वर्ग जो इंटरनेट जानता है वह अब भी हिंदी ब्लॉग्स को नही जानता।
हम मे से कितनों की कोशिश होती है कि उन्हें हिंदी ब्लॉग्स की जानकारी देकर उन्हें हिंदी ब्लॉग्स तक ला सकें।
यदि एक ब्लॉग लेखक दस लोगों को भी हिंदी ब्लॉग्स पढ़ने की जानकारी दे तो वह दस और आगे लोगों को जानकारी देंगे ही।

मैं अक्सर आपके लिखे पर टिप्पणी करता हूं पर कल जानबूझकर नही किया पता नही क्यों, शायद इसलिए कि मुझे मालूम था कि आज तो ज्यादा टिप्पणियां आनी ही है आपको!

mamta said...

ओह हो तो कल के परीक्षण के बाद तो पता चल गया ना तो बस अब आप लिखते रहिये।

Dr.Parveen Chopra said...

आप की यह पोस्ट पढ़ कर बहुत अच्छा लगा। तो, आप लगातार लिखते रहिए जिस से हम जैसे नौसिखियों को भी कुछ लिखने की प्रेरणा मिलती रहे।
शुभकामनाएं। अभी आप की कल वाली पोस्ट भी पढूंगा।

Gyandutt Pandey said...

चाहे बड़ा और गूढ़ लिखें, पर लिखने में उत्साह बच्चे वाला होना चाहिये। यही एक मात्र शर्त है लेखन की!

सागर नाहर said...

सौ-दो सौ पाठकों में से कम से कम तीस-पैंतीस लोग हैं जिनकी निगहबानी मुझ पर है।
रूकिये सर...
छत्तीस कहिये; कल मैने कम से कम तीन बार दो सौ शब्दों की टिप्पणी टाईप की और आपको भेजी परन्तु हाय रे किस्मत .. गूगल ने तिनों बार धोखा दे दिया।

Tarun said...

जिस दिन भी आपको लगे कि आपको पढ़ने वाले पाठक नही मिल रहे उस दिन हमारे ब्लोग पर नजर मार लीजियेगा, हमारे ब्लोग के सूनेपन से आपको यकीन आ जायेगा आपको कहीं ज्यादा लोग पढ़ते हैं। :)

Neeraj Rohilla said...

हमने आपकी पिछली पोस्ट पढी थी लेकिन देखा जब पहले ही इतनी टिप्पणियाँ हैं तो अगली पोस्ट(जो आप टंकी से उतरकर गाँववालों के लिये लिखते) के लिये बचा ली थी, अब पोस्ट कर रहे हैं :)

आप खूब लिखिये पढने वालों की कमी नहीं है, और वैसे भी आपके ब्लाग पर आना अच्छा लगता है ।

Mired Mirage said...

अपने अन्दर के इस बच्चे को कभी बड़ा मत होने दीजियेगा । मन करे तो बार बार पीछे मुड़कर देख लीजियेगा । सदा बहुत से साथी पीछे चलते दिखेंगे
घुघूती बासूती

जोशिम said...

एक हाथ इधर भी उठा -- मनीष [ देर से यों कि दस दिन - अवकाश - दिल्ली की की दौड़ भाग फ़िर दो तीन दिन से वापस मशक्कत-ऐ-नौकरी - आज वापस पढ़ना शुरू ]