Monday 18 February 2008

अनर्थ हो सकता है अर्थ का अर्थ न जानने से

कितनी अजीब बात है कि हम सभी अर्थ के पीछे भाग रहे हैं, लेकिन आर्थिक शब्दों का सामना होते ही उल्टा भागना शुरू करते हैं। सोचते हैं कि इनसे हमको क्या लेनादेना। इन्हें समझना है तो अर्थशास्त्री, विद्यार्थी, पत्रकार उद्योगपति या कारोबारी समझें। हम इन्हें समझकर क्या करेंगे? लेकिन आज के जमाने में ऐसा वीतरागी नज़रिया बड़ा घातक है। अर्थ के तमाम शब्दों को समझना बहुत ज़रूरी है क्योकि इनका गहरा वास्ता हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से है। अब मुद्रास्फीति को ही ले लीजिए। पहले इसके आंकड़े हर रविवार को जारी किए जाते थे और सोमवार के अखबारों में छपते थे। अब शुक्रवार को ही इन्हें जारी करके शनिवार को छाप दिया जाता है।

पंद्रह साल पहले तक मुद्रास्फीति का इकाई अंक में आना बड़ी खबर होती थी, जबकि आज अगर यह दहाई अंक में चली जाए तो हंगामा मच जाएगा। इसका ताज़ा आंकड़ा 4.07 फीसदी का है। मुश्किल यह है कि हम मुद्रास्फीति को या तो समझते नहीं या इसे फालतू समझते हैं क्योकि इसे महंगाई से जोड़कर देखने के बावजूद हम मानते हैं कि ये महंगाई की सही तस्वीर नहीं पेश करती। इस सोच के चलते हम धीरे-धीरे इस आंकड़े के प्रति संवेदनहीन हो जाते हैं। लेकिन खुदा न खुदा अगर इसने जिम्बाब्वे जैसा जलवा दिखा दिया तो हम कहीं के नहीं रहेंगे। आप जानते हैं कि ज़िम्बाब्वे में मुद्रास्फीति की दर कितनी है? सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दिसंबर 2007 में यह दर 66,212.3 फीसदी रही है। यानी, वहां हर दिन ही नहीं, हर घंटे चीज़ों के दाम बढ़ रहे हैं। आईएमएफ की मानें तो इस महीने के अंत तक ज़िम्बाब्वे में मुद्रास्फीति की दर 1,50,000 फीसदी तक पहुंच सकती है।

सोचिए, करीब 28 सालों के शासन में रॉबर्ट मुगाबे ने दक्षिण अफ्रीकी देश ज़िम्बाब्वे की हालत यह कर दी है कि वहां करोड़पति बने बगैर किसी का गुजारा संभव नहीं है क्योंकि इस समय वहां मामूली ब्रेड की कीमत भी 30 लाख जिम्बाब्वे डॉलर हो चुकी है। अखबार खरीदना है तो इससे दोगुनी रकम ढीली करनी पड़ती है। इन हालात में जिसकी महीने की तनख्वाह 10 करोड़ ज़िम्बाब्वे डॉलर है, वह भी कपड़े-लत्ते और खाने-पीने को लेकर रो रहा है। ज़िम्बाब्वे की यह हालत तब है जब वह प्राकृतिक संसाधनों से भरा-पूरा देश है। पहले वहां भी किसी को मुद्रास्फीति की फिक्र नहीं रहती थी, लेकिन पिछले कई महीनों से उन्हें इसकी भयंकर कड़वी खुराक ने रत्ती-रत्ती का हिसाब-किताब रखना सिखा दिया है।

ज़िम्बाब्वे की दुर्दशा की सारी खबर आप बड़े आराम से नेट पर हासिल कर सकते हैं। यहां उसका उदाहरण देने का मकसद बस इतना है कि आर्थिक आंकड़ों में तबाही का संदेश छिपा हो सकता है। इसलिए उनसे कन्नी काटने से कोई फायदा नहीं है। वैसे, अच्छी खबर यह है कि अपने यहां बिजनेस स्टैंडर्ड का हिंदी संस्करण बाज़ार में आ चुका है। जल्दी ही इकोनॉमिक टाइम्स और दैनिक जागरण/टीवी-18 के हिंदी आर्थिक अखबार भी आनेवाले हैं। लेकिन बुरी खबर यह है कि बिजनेस स्टैंडर्ड और इकोनॉमिक टाइम्स अपनी मूल अंग्रेजी खबरों का हिंदी में घटिया/अपठनीय अनुवाद ही छापनेवाले हैं, जबकि दैनिक जागरण/टीवी-18 ग्रुप से भी भरोसा नहीं है कि वह हिंदी पाठकों को उनकी बोलचाल की भाषा में अर्थ के अर्थ का ज्ञान करा पाएगा।

खैर, ना-ना मामा से काना मामा ही भला। मुद्रास्फीति से बात शुरू की थी तो एक बात और बता दूं कि इसने आज खाते-पीते मध्यवर्ग और धुर गरीबों के बीच गजब की समानता पैदा कर दी है। इस समय दोनों ही मुद्रास्फीति की दर बढ़ने से परेशान हैं। गरीब इसलिए कि इसका सबसे ज्यादा असर अनाजों के दाम पर पड़ता है, जिसके चलते उसे उतने ही सामान के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं। और खाता-पीता मध्यवर्ग इसलिए क्योंकि मुद्रास्फीति बढ़ने पर बैंक अपनी ब्याज़ दरें बढ़ा देते हैं, जिससे सीधे-सीधे उसकी ईएमआई (Equal Monthly Installment) बढ़ जाती है। इसलिए दोनों ही चाहते हैं कि सरकार किसी न किसी तरह मुद्रास्फीति पर लगाम लगाए।

3 comments:

चंद्रभूषण said...

ऐसा क्या हुआ जो अब नहीं लगते अपने से?

अनिल रघुराज said...

चंदू भाई, अब आप मेरी नज़र में प्रमोट होकर महफिल गुलज़ार करने लगे हैं। अपने से लगनेवालों में वही लोग बचे हैं जो अभी तक संघर्षशील हैं। हो सकता है धीरे-धीरे ये सभी लोग भी महफिल गुलज़ार करने की स्थिति में पहुंच जाएं। तब मैं इस श्रेणी में अकेला रह जाऊंगा क्योंकि मुझे लगता है कि मैं तो ताज़िंदगी संघर्षशील ही रहूंगा। निरतंर कुछ ढूंढता हुआ परेशान-सा भटकता एक शख्स।

Gyandutt Pandey said...

हिन्दी वाला बिजनेस स्टेण्डर्ड इलाहाबाद में आता ही नहीं। शायद लखनऊ से नहीं छप रहा।
उसे देख कर आपकी बात से सहमति/असहमति बनेगी।
कारोबार जरूर मिस करता हूं - अबतक!