Thursday 28 February 2008

नौ सदियों से शून्य क्यों छाया है हमारे दर्शन में?

भारतीय जनमानस में आत्मा व शरीर के रिश्तों को लेकर जमी हुई जड़ सोच को मैंने कल कुरेदने की कोशिश की तो चंदू ने कह दिया कि, “यह बहस दो हजार साल पुरानी लग रही है। आत्मन् सुदूर उपनिषदों से निकला शब्द है, जिसे तार्किक तीक्ष्णता योगवाशिष्ठ में और दार्शनिक पूर्णता आचार्य शंकर के काम में प्राप्त होती है।” एकदम सही बात है और आश्चर्य इस बात का है कि भारत में सन् 820 में शंकराचार्य के बाद कोई कायदे का दार्शनिक नहीं हुआ है। गिनाने को उदयनाचार्य, रत्नकीर्ति, जयंत भट्ट, गंगेश और शाक्य श्रीभद्र के नाम गिनाए जा सकते हैं। लेकिन शाक्य श्रीभद्र भी साल 1225 में ही निपट गए थे।

उसके बाद भक्ति आंदोलन के संतों का जिक्र किया जा सकता है। राजाराम मोहन राय (1774-1833), दयानंद सरस्वती (1824-83) और विवेकानंद (1863-1902) का नाम लिया जा सकता है। लेकिन ये सभी चिंतक, विचारक, समाज सुधारक या पुराने दर्शन के नए व्याख्याकार थे। खुद इन्होंने किसी दर्शन का सूत्रपात नहीं किया। जबकि इसी दौरान यूरोप में राजर हैकन, रेमोंद लिली, बेकन, हॉब्स, दे-कार्त, स्पिनोज़ा, बर्कले, रूसो, हेलवेशियस, कांट, हेगेल, शोपेनहार, फायरबाख, मार्क्स, स्पेंसर, बुख्नेर, नीत्से, ब्राडले और डेवी जैसे कई नामी दार्शनिक हुए हैं। सवाल उठता है कि दार्शनिक माने जानेवाले हमारे देश में करीब नौ सौ सालों से ऐसा सन्नाटा क्यों छाया हुआ है? हम क्यों अभी तक आत्मा-शरीर, ब्रह्म-माया, द्वैत-अद्वैत और वेदांत से आगे नहीं बढ़ पाए हैं? वह क्या चीज़ है जिसने भारतीय मेधा को इस तरह पंगु बना रखा है?

साफ कर दूं कि मैं दर्शन का गंभीर विद्यार्थी नहीं हूं। मैंने अभी तक भारतीय दर्शन के बारे में जितना भी जाना-समझा है, वह सारा का सारा कुंजी-छाप किताबों पर ही आधारित है। हां, निरंतर कुछ सोचते-समझते रहने का भ्रम ज़रूर पाल रखा है। मगर, मैं भारतीय दर्शन की परंपरा या गतिरोध के बारे में साधिकार कुछ नहीं कह सकता। बस, एक सीधा-सा सवाल उठा रहा हूं, जो हो सकता है पूरी तरह नासमझी का नतीजा हो। लेकिन मैं सचमुच जानना चाहता हूं कि हम आम भारतीयों की सोच 900 से 1200 साल पुराने स्तर पर क्यों अटकी हुई है? आप लोगों में से जो भी जानकार हों, उनसे मैं इसके उत्तर की अपेक्षा करता हूं।

संदर्भवश बता दूं कि शंकराचार्य भी मैं क्या हूं का जवाब तलाशने में लगे थे और उन्होंने फलसफा दिया कि जब यह ज्ञान हो जाता है कि निर्विशेष नित्य, शुद्ध, बुद्धमुक्त, स्वप्रकाश, चिन्मात्र, ब्रह्म ही मैं हूं तो अविद्या दूर हो जाती है और बद्ध होने का भ्रम हट जाता है जिसे ही मुक्ति कहते हैं। ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर: अर्थात् ब्रह्म सत्य है और संसार मिथ्या, जीव ब्रह्म ही है दूसरा नहीं। शंकर के दर्शन को ऊपरी तौर पर देखने पर लगता है कि वह ब्रह्मवाद को मानता है और उपनिषद के अध्यात्म ज्ञान को सबसे अधिक प्रधानता देता है। लेकिन उसके भीतर उतरने पर पता चलता है कि वह नागार्जुन के शून्यवाद का मायावाद के नाम से नामांतरण मात्र है।

असल में शंकराचार्य के दर्शन की आधारशिला रखनेवाले 500 ईस्वी के दार्शनिक गौडपाद थे जो खुद सीधे तौर पर बुद्ध और नागार्जुन के दर्शन के अनुयायी थे। गौडपाद उपनिषद को अपने दर्शन से संबद्ध मानते थे, लेकिन साथ ही बुद्ध भी उनके लिए उतने ही श्रद्धा और सम्मान के पात्र थे। नागार्जुन के बारे में बस इतना ही कि वे बचपन में ही बौद्ध भिक्षु बन गए थे। उनका समय 175 ईस्वी के आसपास का था। उनके शून्यवाद की धारणा यह है कि वस्तुओं के भीतर कोई स्थिर तत्व नहीं है, वह विच्छिन्न प्रवाह मात्र है। जो इस शून्यता को समझ सकता है, वह सभी अर्थों को समझ सकता है और जो इस शून्यता को नहीं समझता, वह कुछ भी नहीं समझ सकता।

बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन का मानना था कि विश्व और उसकी सारी जड़-चेतन वस्तुएं किसी भी स्थिर अचल तत्व (जैसे आत्मा) से बिल्कुल शून्य हैं। उन्होंने कार्य-कारण संबंध का भी खंडन किया था। उनका कहना था कि यदि पदार्थ सत्य है तो उसके लिए प्रत्यय (कारण) की ज़रूरत नहीं। यदि अ-सत् है तो भी उसके लिए किसी प्रत्यय की ज़रूरत नहीं। शंकराचार्य भी इसी तरह के सत्, अ-सत्, मिथ्या के फेर में पड़े थे। इसीलिए कुछ लोग उनको ‘प्रछन्न बौद्ध’ भी कहते हैं। ....चलिए, अब खत्म करते हैं क्योंकि भारतीय दर्शन के नौ सदियों के शून्य को लेकर शुरू हुई बात दूसरी सदी के शून्यवाद पर आते ही भटक गई है।
संदर्भ: राहुल सांकृत्यायन की किताब – दर्शन दिग्दर्शन

4 comments:

quin said...
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चंद्रभूषण said...

बड़े सवालों के बड़े जवाब खोजने में बड़ा दर्शन सामने आता है। अपनी मर्जी से कुछ सवाल चुन लेने और चेलों के चुभलाने योग्य जवाब पेश कर देने से बबाई सामने आती है।

मध्यकाल में आध्यात्मिक शून्य की समस्या से संबोधित रामानुज (ग्यारहवीं-बारहवीं सदी)के विशिष्टाद्वैत को भौगोलिक नजदीकी के बावजूद शंकर के अद्वैत से सीधे निकला हुआ नहीं माना जा सकता। कमोबेश यह हीगल और फायरबाख जैसा ही था। एक भूगोल के अलावा दोनों में कुछ भी साझा नहीं। तर्क की तीक्ष्णता भावना के आवेग में तिरोहित होती हुई।

तेरहवीं सदी में रामानुज की ही परंपरा में आने वाले रामानंद के असर में पूरे देश में भक्ति की अनेक काव्यधाराएं बह उठीं (हालांकि मुझे लगता है, इसमें इस्लामी सूफी दर्शन की भी अपनी एक खास भूमिका रही होगी। यहां कोई ब्लाइंड स्पॉट है)।

अभी एक सदी पहले जहां-तहां दर्शन की कुछ छटाएं विवेकानंद और अरविंदो की रहस्यवादी प्रस्थापनाओं में भी नजर आई थीं। लेकिन पिछले पचासेक वर्षों से तो हम दर्शन के नाम पर महेश योगी, आचार्य रजनीश और मुरारी बापू जैसे बाबाओं का ही बोलबाला देख रहे हैं।

कोई भी दार्शनिक युगप्रश्नों से संबोधित होता है और उनके समाधान के लिए अपनी प्रस्थापना प्रस्तुत करता है। हम उसे अतीत के दर्शनों के खंडन-मंडन की प्रक्रिया में ग्रहण करते हैं, लेकिन यह बहुत बाद की बात होती है।

हमें दर्शन को बाबाओं और कथावाचकों के हवाले नहीं छोड़ना चाहिए। सबसे अलगाव में चले जाने का खतरा उठाते हुए भी मूलभूत सवालों के मूलभूत समाधान खोजने चाहिए और हिम्मत करके उन्हें दुनिया के सामने पेश करना चाहिए।

मेरे ख्याल से दार्शनिक बनने के लिए आज तक कोई दार्शनिक नहीं बना, न ही आगे कोई बनने वाला है। जिसके भी अंदर हमारे युग के सवालों का सामना करने की हिम्मत होगी, वही हमारा युग-दार्शनिक होगा। इस मामले में मैं आपकी तरफ भी उम्मीद से देखता हूं।

चंद्रभूषण said...

तथ्य और भूल सुधार-

1.रामानुज (तमिलनाडु), जन्म-1017, मृत्यु-1137

2.रामानंद को तेरहवीं नहीं चौदहवीं सदी का पढ़ा जाए (जन्म- 1366 ई.)

जोशिम said...

पोस्ट और प्रतिक्रियाएं बहुत ही रोचक / प्रेरक रहीं पढने में - पता नहीं ? शरीर-आत्मा-अस्तित्व-यथार्थ जैसे सारे सवाल भले से समझना, प्रकाश की परिभाषा खोजने जैसे है (तरंग या कण?) - आगे भी पढने को मिलेगा तो और ज्ञान बढ़ेगा - धन्यवाद मनीष