Friday 14 December 2007

तर्क से निकली आधुनिकता फंसी है संकट में

हर शब्द के पीछे एक धारणा होती है और हर धारणा का एक इतिहास होता है। हां, इतना ज़रूर है कि ग्लोबीकरण के इस दौर में धारणाओं का भूगोल देशों की हदें पार कर गया है। अक्सर हम शब्दों का इस्तेमाल किए चले जाते हैं, लेकिन उनका ऐतिहासिक अर्थ नहीं जानते। ऐसा ही एक आम शब्द है आधुनिकता। कुछ दिनों पहले मुझे ब्राजील के लेखक और राजनीतिक कार्यकर्ता Frei Betto का एक छोटा-सा लेख पढ़ने को मिल गया, जिससे मुझे आधुनिकता को जानने-समझने में मदद मिली है। अगस्त 2004 में लिखा गया यह लेख शायद आपके भी काम का हो। पेश है उसका अनुवाद...
पिछली चार सदियों चला आ रहा आधुनिकता का युग अब संकट में है। इस युग की शुरुआत 17वीं सदी में यूरोप के सांस्कृतिक आंदोलन पुनर्जागरण (Renaissance), अमेरिका व ब्राज़ील की खोज और मध्यकाल व सामंती युग के खात्मे के बाद पूंजीवाद के आगमन से हुई थी। अब तो इक्कीसवीं सदी में कुछ ऐसा आ गया है जिसे हम मोटे तौर पर उत्तर-आधुनिकता कहते हैं। इससे हमारे अब तक के संदर्भ और प्रतिमान निश्चित तौर पर बदल जाएंगे।

मध्य युग में सभी संस्कृतियां देवी-देवता के इर्दगिर्द चक्कर काटती थी। इन सबके केंद्र में भगवान था। जबकि आधुनिकता के दौर में संस्कृति के केंद्र में आ गया इंसान। अगर कोई चीज़ इसे प्रतीकात्मक रूप से सबसे बेहतर दिखाती है तो वह है Sistine Chapel की छत पर बनी माइकेलएंजेलो की मशहूर पेंटिंग, The Creation of Adam... लंबी दाढ़ी वाला भगवान धर्म की केंद्रीय भूमिका को दर्शाता है, जबकि निर्वस्त्र आदम धरती की तरफ खिंचा चला जा रहा है। इस खिंचाव के बावजूद आदम अपनी उंगली बढ़ाता है ताकि भगवान से उसका संपर्क न टूट जाए। आदम की नग्नता उस बदलाव को दर्शाती है, आधुनिकता हमारी संस्कृति और धारणाओं में जिसकी वाहक बन रही थी।

आधुनिकता की एक और प्रेरक घटना 1682 में सामने आई, जब हैली ने, बिना किसी टेक्नोलॉजी की मदद से, क्योंकि तब आज की तरह टेक्नोलॉजी थी ही नहीं, केवल गणितीय हिसाब-किताब से अनुमान लगा दिया कि 76 सालों में एक और पुच्छलतारा नज़र आएगा। उस वक्त बहुत से लोगों ने हैली को पागल करार दिया। इस बीच 76 साल बीतने से पहले ही 1742 में हैली की मृत्यु हो गई। फिर भी कुछ लोग चौकन्ने रहे क्योंकि उन्होंने हैली के अनुमान को पूरी तरह खारिज़ नहीं किया था। कमाल की बात यह है कि ठीक अनुमानित साल 1758 में लंदन के आकाश पर एक पुच्छलतारा नज़र आया, जिसका नामकरण हैली के नाम पर ही किया गया।

इस घटना को तर्क की जीत माना गया। तर्क का गौरव माना गया। इससे संस्कृति के केंद्र में स्थापित सितारों की महत्ता घटने लगी। कहा गया कि जब तर्क से सितारों की गति का सटीक अनुमान लगाया जा सकता है, जिसे पहले भी कोपरनिकस और गैलीलियो दिखा चुके थे और बाद में न्यूटन ने भी साबित किया, तब तर्क मानवजाति के सामने मौजूद सभी अनिश्चितताओं को दूर कर सकता है। तर्क से दुख, तकलीफ, भूख और दासता का अंत हो जाएगा। इससे एक ऐसी दुनिया बनाई जा सकती है जिसमें उजाला होगा, प्रगति होगी, प्रचुरता होगी और खुशी होगी।

लेकिन चार सदियां बीत जाने के बाद भी ऐसा कुछ नहीं हो पाया है। वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के कुछ तथ्य पेश हैं : धरती की आबादी इस समय लगभग 6 अरब है, जिसमें से 1.1 अरब लोग भुखमरी के शिकार हैं। कुछ लोग कहते हैं कि भुखमरी की वजह बढती आबादी है और जन्म-दर पर अंकुश लगाना ज़रूरी है। मैं छोटे परिवार का हिमायती हूं। लेकिन इस तर्क को स्वीकार नहीं करता। असल में मुख्य समस्या धन-दौलत के कुछ हाथों में सिमट जाने की है। आज धरती पर इतना अनाज पैदा हो रहा है जिससे मौजूदा आबादी से तकरीबन दोगुना, 10 अरब लोगों को भरपेट भोजन दिया जा सकता है।

आधुनिकता का मौजूदा संकट तब से शुरू हुआ है जब से पूर्वी यूरोप में समाजवाद के खात्मे के साथ पूंजीवाद का अक्षुण्ण प्रभुत्व कायम हो गया। इसके बाद तो पूंजीवाद ने एक नया चरित्र ही अख्तियार कर लिया है, जिसे नव-उपनिवेशवाद कहते हैं।

3 comments:

ज्ञानदत्त पाण्डेय । GD Pandey said...

अच्छी जानकारी। अच्छा लेख।

संजय तिवारी said...

वर्तमान सभ्यता के केन्द्र में मनुष्य नहीं मनुष्य का लालच है.
बढ़ती आबादी को समस्या माननेवाले लोगों के लिए तन्ना बाबा का सटीक जवाब होता है जो राजस्थान के अलवर में किसान हैं. वे कहते हैं जितने आदमी हैं उतने अच्छे काम करने लगे तो आबादी समस्या कैसे हो सकती है?

आबादी समस्या इसलिए नजर आती है क्योंकि आदमी उद्यमी से सरककर व्यवसायी हो गया है. अब व्यवसाय में तो मशीन चाहिए, उत्पादन चाहिए. इंसान तो केवल उपभोक्ता ही होगा. और उपभोक्ता जितना कम हो उतना अच्छा.

बाल किशन said...

"असल में मुख्य समस्या धन-दौलत के कुछ हाथों में सिमट जाने की है।"
बहुत अच्छा और सही विश्लेषण है. मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ.