Monday 24 December 2007

मोदी ही महात्मा गांधी के असली वारिस हैं

सारे के सारे मोदी-मुदित ब्लॉगिए कल से ही मंद-मंद मुस्करा रहे हैं। कोई लगातार मोदी-पुराण लिख रहा है तो कोई नतीजे आने से पहले तक मोदी के खिलाफ लिखनेवालों से पंगा ले रहा है। कोई कह रहा है रात गई, बात गई। मोदी की ऐतिहासिक जीत के साथ ही उस पर आई प्रतिक्रियाओं के विश्लेषण हो रहे हैं। नमो के खिलाफ भी लिखा जा रहा है, लेकिन उसमें पहले जैसी तल्खी नहीं है। दिक्कत ये भी है जो तल्खी से लिख सकते थे वे अभी लव स्टोरी लिखने में व्यस्त हैं। मैं अभी तक इस मसले पर नहीं लिख सका, इसके लिए अंदर ही अंदर अजीब-सा अपराध बोध महसूस कर रहा था। इसलिए न-न करते हुए भी लिखने बैठ गया।

पहली बात। मैं अपनी सीमित जानकारी के आधार पर कह सकता हूं कि व्यक्तिगत जीवन में मोहनदास कर्मचंद गांधी जितने पाक-साफ थे, नरेंद्र दामोदरदास मोदी उतने ही पाक-साफ हैं। गुजराती होने के अलावा इन दोनों में एक और समानता है। जिस तरह गांधी ने पूरी आज़ादी की लड़ाई के दौरान हमेशा संगठन और संस्थाओं की अनदेखी की, कभी भी निचले स्तर के संगठनों को नहीं बनने दिया, उसी तरह मोदी ने भी सरकारी संस्थाओं की ही नहीं, बीजेपी और संघ तक की अनदेखी की है। जिस तरह जनता और गांधी के बीच कोई भी कद्दावर नेता नहीं आता था, उसी तरह मोदी ने भी अपने आगे सभी नेताओं को अर्थहीन और बौना बना दिया है। इस मायने में मुझे लगता है कि नरेंद्र दामोदरदास मोदी ही आज मोहनदास कर्मचंद गांधी के असली राजनीतिक उत्तराधिकारी हैं।

गांधी की करनी का नतीजा ये हुआ है कि आजा़दी के बाद भी हम औपनिवेशिक लूट के लिए अंग्रेजों द्वारा बनाई गई संस्थाओं के मोहताज बने रहे क्योंकि वैक्यूम को भरने के लिए कांग्रेस ने अपना कुछ बनाया ही नहीं था। गांधी ने तो कांग्रेस तक को भंग करने की बात कही थी। मोदी आज भले ही केंद्रीय नेतृत्व के मार्गदर्शन और लाखों कार्यकर्ताओं की मेहनत को अपनी जीत का श्रेय दे रहे हों, लेकिन राजनीति का यह चालाक लोमड़ जानता है कि कब किसको पुचकारना है और कब किसको ठुकराना है। उसने छह सालों के अपने शासन में लोकतंत्र के तीनों स्तंभों न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका को जब जैसे चाहा, अपनी उंगलियों पर नचाया। इन सभी की विश्वसनीयता को उसने दो कौड़ी का बना दिया। व्यक्ति के रूप में मोदी कुशल प्रशासक हो सकते हैं। लेकिन कल को वो न रहे तो जिन साढ़े पांच करोड़ गुजरातियों की बात वो कर रहे हैं, उनकी ख्वाहिशों और लोकतांत्रिक चाहतों को कौन पूरा करेगा? इसी वजह से मुझे आशंका है कि आज जो लोग मोदी की जीत पर मुदित हैं, कहीं ऐसा न हो कि कल उन्हें इसी मोदी को गुजरात का सत्यानाश करने के लिए गालियां देनी पड़े।

कहा जा रहा है कि मोदी के शासन में हुए विकास के कारण गुजरात के अवाम ने मोदी को जिताया है। अगर ऐसा ही है तो मोदी सरकार के सात मंत्री क्यों हार गए, जिसमें शहरी विकास मंत्री आई के जडेजा, कृषि मंत्री भूपेंद्रसिंग चुडासामा और राजस्व मंत्री कौशिक पटेल शामिल हैं? फिर विकास के नाम पर बड़े उद्योगपतियों ने अगर गुजरात में अरबों का निवेश किया है तो मोदी के शासन में बिजली चोरी के नाम पर करीब सवा लाख किसानों को सताया गया और तीन हज़ार से ज्यादा किसानों को हथकड़ियां लगाकर जेल की हवा खिलाई गई। खुद बीजेपी से जुड़ा किसान संगठन, भारतीय किसान संघ इस मुद्दे को उठा चुका है। पूंजी निवेश आने से विकास होता है, लेकिन इस विकास से किसकी चांदी हो रही है और किससे इसकी कीमत वसूली जा रही है, इस पर भी बराबर नज़र रखनी ज़रूरी है।

तीसरी बात। हमने अंग्रज़ों से संसदीय लोकतंत्र की जो प्रणाली उधार ली है, उसकी एक बुनियादी शर्त अभी तक देश में पूरी नहीं हुई है। ब्रिटेन में चुनावों के साथ ही पार्टियों का लोकतांत्रिक ढांचा बहुत मजबूत है। इसके विपरीत हमारे यहां लेफ्ट और बीजेपी के अलावा बाकी सभी पार्टियां व्यक्ति आधारित हैं। कांग्रेस को गांधी परिवार ने अपनी जागीर बना रखा है। मायावती की बीएसपी में सभी नेता उनकी कृपा के मोहताज हैं। लालू से लेकर नीतीश और रामविलास पासवान की पार्टी का भी यही हाल है। अब मोदी लोकतंत्र के इस कोढ़ में खाज बनकर उभरे हैं। वे मुंह से भले ही बीजेपी के सर्वोपरि होने की बात कह रहे हों, लेकिन गुजरात में उन्होंने दिखा दिया है कि उनके आगे पार्टी की कोई अहमियत नहीं है। इसलिए भी मोदी इस देश में स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में बहुत बड़ी बाधा हैं।

चौथी और आखिरी बात। गुजरात में इस बार करीब 60 फीसदी मतदान हुआ, जिसमें से बीजेपी/मोदी को 48 फीसदी वोट मिले हैं। यानी साढ़े पांच करोड़ गुजरातियों में से करीब 1.60 करोड़ (29 फीसदी) लोगों ने मोदी को अपना नेता माना है। जिन 40 फीसदी गुजरातियों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया, उसमें से ज्यादातर हमारे-आप जैसे ‘पढ़े-लिखे’ लोग हैं, जो घरों में, चौराहों पर बहस तो खूब करते हैं, लेकिन पोलिंग बूथ तक जाने की जहमत नही उठाते। इसलिए मेरा कहना है कि देश में वोट देना कानूनन अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए और जो मतदाता ठीकठाक होने के बावजूद वोट न डालने जाएं, उस पर तगड़ा जुर्माना लगाया जाना चाहिए।

11 comments:

संजीव कुमार सिन्हा said...

'मैं अपनी सीमित जानकारी के आधार पर कह सकता हूं कि व्यक्तिगत जीवन में मोहनदास कर्मचंद गांधी जितने पाक-साफ थे, नरेंद्र दामोदरदास मोदी उतने ही पाक-साफ हैं।'

अच्‍छा विश्‍लेषण किया है आपने।

राजेश कुमार said...

अनिल जी साथ ही हमें यह भी सोचना होगा कि आखिर व्यक्ति एक संस्था से मजबूत क्यों हो रहा है। यदि किसी पार्टी या दल से कोई व्यक्ति बड़ा होता है तो इसका मतलब साफ है कि संस्था जिस उदेश्य से बनायी गई थी उस पर खरा नहीं उतरी । बहरहाल नरेन्द्र मोदी चुनाव भले हीं जीत गये हों लेकिन गुजरात दंगे के लिये वे दोषी हैं और रहेंगे।

Rahul said...

गुजरात मे दगा होने का कारण था
हिन्दुओ को गोधरा नामक जगह पर ट्रेन मे जला कर मारा गया था। अगर लेखक के घर वाले इस ट्रेन मे सफर कर रहे होते और अगर जला कर मार दिया गया होता तो लेखक क्या करता नपुन्सक की तरह खरा होकर देखता या गुजरात की जनता ने जो कीया ओही करता।
नरेन्द्र मोदी के किये हुये काम का लेखा जोखा:-

मुकेश अंबानी के शब्दों में, 'गुजरात में पिछले एक साल में रिलायंस ने एक भी मानव श्रम दिवस का घंटा गंवाया नहीं है।' रतन टाटा कहते हैं, 'गुजरात सबसे अधिक प्रगतिशील राज्य है।' कुमारमंगलम बिरला तो मोदी के दमदार नेतृत्व से अभिभूत हैं जबकि केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री कमलनाथ कहते हैं, 'गुजरात को सामने रखकर हम भारत को प्रस्तुत करते हैं।'
रतन टाटा, मुकेश अंबानी और कुमार मंगलम बिड़ला जैसे उद्योगपतियों ने गुजरात की आर्थिक गतिविधियों और चौमुखी विकास की जबरदस्त सराहना की।

'इण्डिया टुडे' ने पिछले पांच वर्षों में गुजरात को दो बार सर्वोत्तम शासन मुहैया कराने वाला राज्य कहा है। भाजपा और नरेन्द्र मोदी के कट्टर से कट्टर विरोधी भी विकास के सवाल पर नरेन्द्र मोदी का लोहा मानते हैं। प्रशासन में शुचिता और मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत ईमानदारी के सवाल पर प्राय: उनका लोहा माना जाता है। प्रसिध्द अन्तर्राष्ट्रीय कंसलटेंसी कम्पनी 'अर्नस्ट एण्ड यंग' ने अपने विशद अध्ययन पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है। उसमें गुजरात को भारत की विकास यात्रा और आत्म निर्भरता के मामले में एक सुनहरा उदाहरण बताया है। कहा है कि गुजरात सरकार ने 72 अभिनव पहल किए हैं और उन प्रायोगों की उपलब्धियों का व्योरा दिया है।

दिनेशराय द्विवेदी said...

उद्योगपतियों का मोदी राहुल को मुबारक हो। हमें श्रमजीवियों का चाहने वाला चाहिंए। अनिल जी के तंज को समझने का प्रयत्न करें।

दिलीप मंडल said...

अनिल जी, आपने बढ़िया लिखा है। आपको लगातार पढ़ रहा हूं। एक छोटा सा पीस मैंने भी लिखा है। रिजेक्ट माल और मोहल्ले पर नजर डालिए। धन्यवाद

अजित वडनेरकर said...

दमदार है विश्लेषण ।

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छा लिखा है। मोदीजी मुदित हैं।

आस्तीन का अजगर said...

इधर ज्यादा कुछ न लिख पाने की
वजह नौकरी, स्थान बदलना है और हिन्दी फोंट्स का मेरे स्य्स्तेम
में न हो पाना भी। अजगर मोदी के बारे में तब लिख रहा था, जब ज्यादातर लोग कुछ और लिख रहे थे। अभी हो रही चिल्लपों में शामिल न होने का अफ़सोस है, हालांकि कहने को अजगर के पास भी बहुत है। आपने उसकी याद दिलाई और अपनी उस उम्मीद भी जताई कि अजगर को इस बारे में तल्ख़ लिखना चाहिऐ था, जिसका मैं बहुत शुक्र गुजार हूँ। मेरे लिए बड़ी बात है। आपके लेख की मुख्य बात से मैं असहमत हूँ , हालांकि बाक़ी बिन्दु सही लगते हैं। गाँधी की तुलना मोदी से
नहीं की जा सकती क्योंकि गाँधी मनुष्य थे, मोदी मनुष्य नहीं हैं। गाँधी सबको साथ लेकर चलते थे, मोदी का अस्तित्व ही बंटवार में है। गाँधी करुणा और अहिंसा में यकीन करते थे, मोदी कानून को ताक में रखकर मुसलमानों को गोली से उड़ देने में यकीन करते हैं
। उनके चमचे और चारण हिंदुत्व पर गर्व करने के लिए गर्भवती औरतों का पेट फाड़ते
हैं। मोदी के जीत जाने से ये सच्चाई
नहीं बदलने वाली। मोदी को गाँधी का वारिस बताकर भी
नहीं। दोनो की आँखें कभी ध्यान से देखियेगा.

Srijan Shilpi said...

अच्छा विश्लेषण। जिन संदर्भों में आपने मोदी की तुलना करने का प्रयास किया है, उनमें यदि गांधी के बजाय नेहरु को रखते तो शायद ज्यादा सटीक रहता। सिवाय इसके कि मोदी राजनीति में अपने वंशवाद को आगे नहीं बढ़ाएंगे।

मतदान में जीत हासिल कर सत्ता हासिल करने वाले मोदी जैसे नेताओं को वास्तव में हासिल जन समर्थन की हकीकत, अनिवार्य मतदान एवं नकारात्मक मतदान संबंधी कानूनों की जरूरत के बारे में ही मैंने भी पिछली पोस्ट लिखी थी।

जोशिम said...

अनिल जी - नरेन्द्र मोदी का आकलन पास का है, पैना है, गांधी जी का बहुत दूर से है | आदि मानव और महामानव, दोनों में मानव है, हाँ यही शायद समानता है दोनों में | नीरज गोस्वामी जी ने गए हफ्ते शेर इसी लिए लिखा हो [ " जिस शजर ने डालियों पर देखिये फल भर दिए, उसको चुनचुन कर के लोगों ने बहुत पत्थर दिए"] - बाकी बातें खरी हैं - आपको पढ़ना जारी है

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

वाह-वाह! वाह-वाह! वाह! क्या तुलना की है मित्र!