Saturday 1 December 2007

हँसो हँसो, जल्दी हँसो, कोई देख रहा है

स्कूलों-कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के लिए हमारे कोर्स बनाने वाले वाकई धन्य हैं। उन्हें यकीन है कि वो अब भी इमरजेंसी जैसे माहौल में रह रहे हैं और सरकार के खिलाफ लगनेवाली कोई सामग्री कोर्स में शामिल कर लेंगे तो उनकी मिट्टी पलीद कर दी जाएगी। इसलिए वो राजनीतिक कविता पर भी बड़ा निरामिष-सा, तटस्थ-सा मुलम्मा लगा देते हैं। नहीं तो क्या तुक है कि दिल्ली में 12वीं के हिंदी पाठ्यक्रम में शामिल रघुवीर सहाय की इस कविता की भूमिका में लिखा गया है कि कवि यहां हँसने की सलाह दे रहा है क्योंकि हँसना स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा होता है। तो चलिए आप भी थोड़ा ‘हँस’ लीजिए और पढ़िए यह कविता...

हँसो कि तुम पर निगाह रखी जा रही है
हँसो, मगर अपने पर मत हँसना क्योंकि उसकी कड़वाहट
पकड़ ली जाएगी और तुम मारे जाओगे
ऐसे हँसो कि बहुत खुश न मालूम हो, वरना शक होगा कि
यह शख्स शर्म में शामिल नहीं है और मारे जाओगे

हँसते-हँसते किसी को जानने मत दो कि किस पर हँसते हो
सबको मानने दो कि तुम सबकी तरह परास्त होकर
एक अपनापे की हँसी हँसते हो
जैसे सब हँसते हैं बोलने के बजाय


जितनी देर ऊंचा गोल गुंबद गूंजता रहे, उतनी देर
तुम बोल सकते हो अपने से, गूंज थमते-थमते फिस हँसना
क्योंकि तुम चुप मिले तो प्रतिवाद के जुर्म में फंसे
अंत में हँसे तो तुम पर सब हँसेंगे और तुम बच जाओगे
हँसो, पर चुटकुलों से बचो क्योंकि उनमें शब्द हैं
कहीं उनमें अर्थ न हों जो किसी ने सौ साल पहले दिए हों

बेहतर है कि जब कोई बात करो, तब हँसो
ताकि किसी बात का कोई मतलब न रहे
और ऐसे मौकों पर हँसो जो कि अनिवार्य हों
जैसे गरीब पर किसी ताकतवर की मार

जहां कोई कुछ नहीं कर सकता
उस गरीब के सिवाय
और वह भी अक्सर हँसता है

हँसो हँसो जल्दी हँसो
इससे पहले कि वह चले जाएं
उनसे हाथ मिलाते हुए, नज़रें नीची किए
उनको याद दिलाते हुए हँसो
कि तुम कल भी
हँसे थे...

8 comments:

mahashakti said...

बहुत ही बढि़यॉं कविता, बधाई

मीत said...

वाह ! बहुत बढ़िया है जनाब.

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

हंसो कि
हमारे देश में
पढ़ना अपने-आपमें
एक चुटकुला है
हंसो कि
बहुत लोग फिर भी इसे
बहुत गंभीरता से लेते हैं
हंसो कि
हंसने के लिए
इससे ज्यादा और क्या चाहिए।

parul k said...

बेहतर है कि जब कोई बात करो, तब हँसो
ताकि किसी बात का कोई मतलब न रहे ।

ज़्यादातर लोग यही तो करते हैं……। पोस्ट अच्छी लगी ,अनिल जी

masijeevi said...

बीए (ऑनर्स) हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल रघुवीर सहाय की इस कविता की भूमिका में लिखा गया है कि कवि यहां हँसने की सलाह दे रहा है

हे हे

हम कोई विश्‍वविद्यालय के वकील नहीं है, पर अध्‍यापक तो हैं ही, साफ कर दें कि रघुवीरजी ने ऐसी कोई भूमिका नहीं लिखी है और अगर किसी किताब में किसी टंडन-वंडन, अग्रवाल (ऐसे कई महामहिम आलोचक हमारे यहॉं कोने काने पर मिल जाते हैं) वगैरह ने ऐसा खुद लिख मारा भी तो भी यह ध्‍यान रखा जाए कि यह विश्‍वविद्यालय का प्रकाशन नहीं वरन प्रकाशक की निजी किताब होती है।
पर ये भी नहीं कि विश्‍वविद्यालय ऐस कोटि के चिरकुटई काम करता नहीं रहा है... :))

आनंद said...

इन्‍होंने चापलूसी का ब्रह्मास्‍त्र हर जगह आज़माया है, इसी की आज तक खाते रहे हैं। मुझे लगता है कि इसी तरह के भूमिका लिखने लोगों को देखकर कवि ने कविता लिखी होगी।

अनुराग द्वारी said...

सटीक है ... कविता भी और आपका अंदाज भी ... बहुत दिनों बाद मैंने कुछ लिखा है ... बिना इजाजत आपका जिक्र किया है ... आत्मीयता का फायदा उठाने के लिए माफी

अनिल रघुराज said...

रघुवीर सहाय की यह कविता बीए (ऑनर्स) नहीं, बल्कि 12वीं के कोर्स में है। इसे अब पोस्ट में सुधार दिया गया है। गलती के क्षमा चाहूंगा।