Wednesday 19 December 2007

दिमाग बंदकर सुनना हमारी राष्ट्रीय आदत है

सोचिए, कितनी अजीब बात है कि हम किसी को सुनने से पहले ही अपनी सहमति-असहमति तय किए रहते हैं। हम किसी को या तो उससे सहमत होने के लिए सुनते हैं या उसे नकारने के लिए। उसकी बातों के तर्क से हमारा कोई वास्ता नहीं होता। हां तय कर लिया तो सामनेवाले की बस उन्हीं बातों को नोटिस करेंगे जो हमारी मान्यता की पुष्टि करती हों और नहीं तय कर लिया तो बस मीनमेख ही निकालेंगे। असल में हम ज्यादातर सुनते नहीं, सुनने का स्वांग भर करते हैं और कहां खूंटा गड़ेगा, इसका फैसला पहले से किए रहते हैं।

घर में यही होता है, बाहर भी यही होता है। हम संस्कृति में यही करते हैं, राजनीति में भी यही करते हैं; और अर्थनीति में तो माने बैठे रहते हैं कि सरकार जो भी कर रही है या आगे करेगी, सब गलत है क्योंकि सब कुछ आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के इशारे पर हो रहा है। यह अलग बात है कि आज आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के सामने खुद को बचाने के लाले पड़े हुए हैं। आईटी सेक्टर में अगर लाखों नौकरियों के अवसर बन रहे हैं तो कहेंगे कि सब बुलबुला है, इसके फटने का इंतज़ार कीजिए। किसी भी नीति को उसकी मेरिट या कमी के आधार पर नहीं परखते। माने बैठे रहते हैं कि हर नीति छलावा है तो मूल्यांकन करने का सवाल ही नहीं उठता। बिना कुछ जाने-समझे फरमान जारी करने के आदी हो गए हैं हम।

प्यार करते हैं तो इसी अदा से कि तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे। किसी को दोस्त बना लिया तो उसके सात खून माफ और जिसको दुश्मन मान लिया, उसमें रत्ती भर भी अच्छाई कभी नज़र नहीं आती। अंदर ही अंदर एक दुनिया बना लेते हैं, फिर उसी में जीते हैं और एक दिन उसी में मर जाते हैं। सबके अपने-अपने खोल हैं, अपने-अपने शून्य हैं। अपने-अपने लोग हैं, अपनी-अपनी खेमेबंदियां हैं। निर्णायक होते हैं हमारे निजी स्वार्थ, हमारी अपनी सामाजिक-आर्थिक-मानसिक सुरक्षा। असहज स्थितियों से भागते हैं, असहज सवालों को फौरन टाल जाते हैं। विरोध को स्वीकारने से डरते हैं हम। ना सुनने की आदत नहीं है हमें।

यही हम भारतीयों का राष्ट्रीय स्वभाव बन गया है। आज से नहीं, बहुत पहले से। बताते हैं कि सन् 1962-63 की बात है। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इलाहाबाद आए थे। समाजवादी लेखक और विचारक विजयदेव नारायण शाही ने उनके खिलाफ जुलूस निकाला। नेहरू से मिलने आनंद भवन जा पहुंचे और... नेहरू ने बिना कोई बात किए इस संयत शांत विचारक का कुर्ता गले से पकड़कर नीचे तक फाड़ डाला। नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी अपने विरोधियों से क्या सुलूक करती थीं, इसके लिए किसी दृष्टांत की ज़रूरत नहीं। आज बीजेपी में नरेंद्र मोदी इसी तरह ना नहीं सुनने के लती बन चुके हैं।

लेफ्ट भी अपने आगे किसी की नहीं सुनता। कार्यकर्ता के लिए नेता की बात अकाट्य होती है। दसियों धड़े हैं और सबकी अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग। कितनी अजीब बात है कि जैसे ही कोई मार्क्सवादी पार्टी में दाखिल होता है, बिना किसी जिरह और पुराने दार्शनिक आग्रहों को छोड़े द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का प्रवक्ता बन जाता है। लाल रंग का मुलम्मा चढ़ा नहीं कि वह वैज्ञानिक समाजवादी हो जाता है। फिर वह जो कुछ बोलता है, वही जनता और क्रांति के हित में होता है। बाकी लोग या तो दलाल होते हैं या गद्दार।

यह भी गजब बात है कि जिन लोगों ने बीजेपी में रहते हुए ईसाई धर्म-परिवर्तन के खिलाफ जेहाद छेड़ा था, दंगों में उद्घोष करते हुए मुसलमानों का कत्लेआम किया था, वही लोग कांग्रेस में शामिल होते ही घनघोर सेक्यूलरवादी हो गए, सोनिया गांधी के प्रिय हो गए। कल तक जो घोर ब्राह्मणवादी थे, वही नेता बहनजी के साथ आते ही दलितों के उद्धार की कसमें खाने लगे। हम उछल-उछलकर खेमे बदलते हैं। मुझे लगता है, यह अवसरवाद के साथ-साथ हमारी राष्ट्रीय आदत भी है। अपनी स्थिति को बचाने के लिए तर्क करना या दूसरे की स्थिति को स्वीकार करने के लिए तर्क करना हम एक सिरे से भूल चुके हैं।

इसी तरह की लीपापोती हम अपने घर-परिवार और नौकरी-पेशे में भी करते हैं। या तो हां में हां मिलाते हैं या सिर्फ नकारते रहते हैं। लेकिन इस तरह सामंजस्य और शांति बनाए रखने की कोशिश में हमें जो कुछ भी मिलता है, वह दिखावटी होता है, क्षणिक होता है। पाश के शब्दों में कहूं तो, “शांति मांगने का अर्थ युद्ध को जिल्लत के स्तर पर लड़ना है, शांति कहीं नहीं होती।”

9 comments:

ज्ञानदत्त पाण्डेय । GD Pandey said...

सुनना या देखना हम दोनो में चिन्दियां बीनने वाले ही हैं।
उतना ही सुनते-देखते हैं जिससे हम अपना छद्म अस्तित्व बनाये रखें!

अभय तिवारी said...

मर्म पर चोट की आप ने!

राजेंद्र त्‍यागी said...

जमाना कितना बदल गया है। अब अवसरवादी ही महान कह लाए जाते हैं, प्रोफेशनल कहलाए जाते हैं, प्रैक्टिकल कहलाए जाते हैं। राजनीति तो है ही अवसरवादियों के कब्‍जे में। खरी-खरी लिखने के लिए बधाई।

Sagar Chand Nahar said...

बहुत सही कहा आपने.. हमारी इस आदत पर हम खुश होएं या चिंतित?

Srijan Shilpi said...

सही कहा आपने। जब व्यापक महत्व के बड़े निर्णय करने वाले शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्ति इस तरह दिमाग बंदकर केवल अपने अनुकूल बातों को सुनने की आदत बना लेते हैं तो स्थिति और भी भयानक हो जाती है। सच को अपनी आवाज बुलंदी से रखने के लिए अक्सर जान का जोखिम उठाना पड़ता है।

लेकिन असली चुनौती तो उस कमीनेपन से निपटने की है जो सच को भलीभांति समझने के बावजूद अपने स्वार्थ के कारण उसे जानबूझकर अनसुना कर देती है या कुतर्क या झूठी प्रचारबाजी के बल पर सच को कमजोर बनाने का प्रयास करती है।

संजय बेंगाणी said...

सत्य वचन.

संजय तिवारी said...

देखिए न फिर भी लेफ्ट अपने को लोकतांत्रिक कहता है और हमलोग उदारचरितानाम् की परवाह किये बगैर वसुधैव कुटुंबकम् का राग अलापने लगते हैं.

Vipin said...

arthniti ki jani pahchani tippaniyon aur soch ki khilli udane ke pahle ek adad tark prastut karne ki jaroorat bhi ab apko nahin mahsoos hoti hai.mujhe german ideology ko padhne ki sikh dene ke bad lagta hai ap ne use khud kabhi na padhne ki kasam kha li thi.
vipin

अनिल रघुराज said...

विपिन जी, पार्टी वालों ने जब से मेरी किताबें जब्त की हैं तब से मैं दोबारा जर्मन आइडियोलॉजी नहीं खरीद पाया। कही मिल गई तो ज़रूर खरीद कर अपने पास रखूंगा और उसका इस्तेमाल पढ़ने के अलावा छद्म मार्क्सवादियों की कलई उतारने में भी करूंगा।