Monday 17 December 2007

आईआईटी-आईआईएम तक में मची है खलबली

जबरदस्त संक्रमण का दौर है। भयंकर मंथन चल रहा है। लोग विचलित हैं कि सब कुछ दुरुस्त क्यों नहीं हो रहा। सर्वे भवंति सुखिन: सर्वे संतु निरामया की स्थिति क्यों नहीं आ रही? आस्था का संकट क्यों है, मूल्य क्यों मिट रहे हैं, परंपराएं विकृत क्यों हो जा रही है? हमारे लोकतंत्र में इतनी खोट क्यों है? इतना भ्रष्टाचार क्यों है? ये मंथन हर आम संवेदनशील हिंदुस्तानी के मन में चल रहा है। यहां तक कि जिनके सामने सुरक्षित भविष्य के सबसे शानदार अवसर है, वो भी इन सवालों से बेचैन होकर कॉरपोरेट करियर को लात मार रहे हैं। जी हां, आईआईटी और आईआईएम के कैम्पस तक में समाज को बेहतर बनाने की पहल हो रही है और जिसको जितना समझ में आ रहा है, वह उतना कर रहा है।

जैसे, आईआईएम कोलकाता के अरीब खान को ही ले लीजिए। इसी साल अप्रैल में उनका ग्रेजुएशन पूरा हुआ है; और उन्होंने किसी देशी-विदेशी कंपनी में जाने के बजाय एक वेबसाइट बना डाली, जिसका नाम रखा है पर्दाफाश डॉट कॉम। इनका मिशन है कि आम आदमी अपने अधिकारों के वाकिफ हो और सिस्टम से दो-दो हाथ करने को तैयार हो जाए। आज पर्दाफाश के पास पूरी टीम है। इसके खास सदस्यों में शामिल हैं आईआईटी खड़कपुर के ग्रेजुएट सिद्धार्थ बनर्जी और दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता कर रही नाज़िया इरम। सीएनएन-आईबीएन और तहलका के कुछ लोग भी इनके साथ जुड़े हैं। इन्होंने अपना एक ब्लॉग भी बना रखा है। हालांकि ये वेबसाइट और ब्लॉग दोनों ही मूलत: अंग्रेज़ी में हैं। फिर भी इनकी पहल यकीनन न्यायप्रिय व लोकतांत्रिक समाज बनाने में मददगार होगी।

दिलचस्प बात ये है कि अरीब खान अपनी इस पहल को महज जन-कल्याण के एक साधन के तौर पर नहीं देखते। उन्होंने किसी निवेशक से पैसा लेकर अपना ये वेंचर खड़ा किया है और इससे वो इतनी कमाई करना चाहते हैं ताकि उनकी पूरी टीम और सहयोगियों का खर्चा निकल जाए। साइट की पहुंच बढ़ेगी तो विज्ञापन भी लेंगे, लेकिन उनका दावा है कि व्यावसायिक हितों को कभी भी बुनियादी वसूल पर छाने नहीं दिया जाएगा। वो असल में उन सचेत लोगों को एक प्लेटफॉर्म देना चाहते हैं जिन्हें सिटिजन जर्नलिस्ट कहा जाता है।

वैसे, अगर हम हर आईआईटी और आईआईएम से पता करें तो वहां से अरीब खान जैसे लोगों के निकलने का लंबा इतिहास है। इन संस्थानों ने क्रांतिकारी सोच के नौजवान पैदा किए हैं। लीक से हटकर चलनेवाले अक्सर यहां से निकलते रहते हैं। कानपुर से लेकर दिल्ली, अहमदाबाद से लेकर बैंगलोर तक की अपनी अलग-अलग कहानियां होंगी। मेरा तो बस यही कहना है कि हमें बदलाव की इन चिनगारियों की खोज़खबर रखनी चाहिए क्योंकि इनमें छिपी है समाज में सार्थक बदलाव लाने की आग। बाकी डिब्बाबंद क्रांतिकारी तो बस अपनी खोल में ही उलट-पुलट करते रहते हैं। उनसे केवल आवाज़ आएगी और होगा कुछ नहीं।

6 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

अनिल जी आप ने सही कहा। हम हर फटेहाल को सर्वहारा कह देते हैं। जब कि सर्वहारा वह है जो नवीनतम तकनीक का श्रमिक है और जिस के पास अपने श्रम को बेचने के सिवाय अन्य कोई साधन नहीं, माता-पिता की जमा पूँजी तो इन की पढ़ाई में ही खर्च हो चुकी है। ये ही भविष्य की क्रान्ति के नेतृत्वकारी इकाइयां हैं। हम ने तो मार्क्सवाद से यही सीखा है।

vimal verma said...

खबर तो अच्छी है,पढे लिखे लोगो को कम से कम इस तरह की ज़िम्मेदारियों के लिये आगे आना होगा,जो समाज के लिये सार्थक हो।

आनंद said...

बहुत अच्‍छा लगता है जब हम किसी ऐसे प्रयास को देखते हैं। पढ़े लिखे लोग पैसे के पीछे गुलामी करने के बजाए सामाजिक दायित्‍वबोध के कारण जब सामने आते हैं तो निश्चित सराहना के पात्र हैं। इनकी पूरी टीम को बहुत बहुत बधाई हो। हमारी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं। - आनंद

masijeevi said...

आपके विचार से सहमति है कि हमें इन बदलावों की खोज खबर रखनी चाहिए।

ये सोच भी खूब सर्जनातमक है कि ये प्रयास अपने साथ एक बिजनेस मॉडेल भी लिए है, हालांकि अच्छा रहे कि इस बिजनेस माडल का भी पूरा खुलासा मिले

ज्ञानदत्त पाण्डेय । GD Pandey said...

रोचक!

नीरज गोस्वामी said...

"हमें बदलाव की इन चिनगारियों की खोज़खबर रखनी चाहिए क्योंकि इनमें छिपी है समाज में सार्थक बदलाव लाने की आग। " बहुत सच्ची बात लिखी है आपने . कितना अच्छा लगता है ये जान कर की कुछ युवा हैं अभी जो अंधी दौड़ से बाहर हैं.जिनके जीवन का उद्येश्य पैसे कमाने के अलावा भी कुछ और है. ऐसे युवा लोगों का सार्वजनिक सम्मान होना चाहिए.
नीरज