Wednesday, 28 March, 2007

कोंपलों का कातिल, नसों का हत्यारा

वो कौन है जो मेरे दिमाग में कहर बरपाए हुए है। मेरे विचारों का, अनुभूतियों का निर्ममता से संहार कर रहा है। जैसे ही किसी सोई हुई नस में स्फुरण शुरू होता है, नए अहसास की कोंपल फूटती है, कोई झपट कर झपाक से उसे काट देता है। जैसे ही पूरा दम लगाकर हाथ पैर मारता हूं, आंखों के आगे का कुहासा हटाता हूं, वैसे ही आंखों के आगे सात-सात परदे गिरा देता है।
दिमाग कुरुक्षेत्र बना हुआ है। महाभारत छिड़ी है जो सालों बाद भी खत्म नहीं हो रही। अर्जुन बार-बार भ्रमों का शिकार हो रहा है। कोई सारथी नहीं है जो अपना विराट आकार दिखाकर बता सके कि जिनको तुम जिंदा समझ रहे हो, वो तो कब के मुर्दा हो चुके हैं। चक्रव्यूह के सात द्वार बन जाते हैं। मैं पहला द्वार ही नहीं भेद पाता, सातवें की बात कौन करे। चक्रव्यूह के पहले ही द्वार पर सीखी हुई विद्या भागकर दिमाग की किसी खोह में छिप जाती है। विचारों की धार और तलवार के बिना मैं निहत्था हो जाता हूं। युद्ध के बीच में कोई आंखों में धूल फेंक देता हैं। किरकिरी असहनीय हो जाती है, दिखना बंद हो जाता है।
याद आ जाता है बावड़ी में खुद से अनवरत लड़ता (मुक्तिबोध का) वो ब्रह्मराक्षस, जो घिस रहा है हाथ-बाहें-मुंह छपाछप, फिर भी मैल, फिर भी मैल। अरसे पहले मैंने उस ब्रह्मराक्षस को मुक्त कराने का वचन दिया था, उसका शिष्य बनने का वादा किया था। लेकिन अफसोस! कुछ अदृश्य ताकतों ने मेरा भी हश्र ब्रह्मराक्षस जैसा कर दिया है।
पीढ़ियों के भूत, सदियों के बेताल नवजात विचारों का गला पनपने से पहले ही घोंट देते हैं। जिस सोच से मेरी जरा-सा भी जान-पहचान नहीं है, वह किसी कोने से निकल कर कत्लेआम पर उतारू हो जाती है। विचारों को अफीम सुंघा देती है। पलक झपकते ही नई अनुभूति हाथ में आई मछली की तरह छटक जाती है। बस, पानी पर जमी काइयां ही नजर आती हैं।
दर्शन जमकर पढ़ा, ये भी लगा कि अच्छी तरह समझ लिया। लेकिन मौका पड़ने पर कुछ काम नहीं आता। वैसे, तो स्थिरता और गति का गतिशील रिश्ता समझता हूं। लेकिन उजाले-अंधेरे को, अंश को समग्र को, निगेटिव-पॉजिटिव को अलग-अलग ही देख पाता हूं, परस्पर गुंफित रूप में नहीं। दर्शन कोई दृष्टि नहीं दे पाता।
दिल्ली की सर्द रातों जैसा घना कोहरा, जिसमें हाथ भर भी नहीं सूझता। सड़क पर गाड़ी चलती है, लेकिन अंदाज-अंदाज कर। नीचे सड़क पर असंख्य सांप सरा-सर्र भागते हैं, आगे विशाल अजगर मुंह बाए खड़ा रहता है। इस कोहरे ने मुझे क्षणवादी बनाकर छोड़ा है। बस, उतना ही जी पाता हूं जितना किसी एक पल में दिखता है। आगे जब कुछ दिखता ही नहीं तो आगे की क्या सोचूं और क्या जिऊं, कैसे जिऊं। समाज को देखूं तो कैसे, उसकी गत्यात्मकता को देखूं तो कैसे?
इसलिए क्षणों में जीता हूं, क्षण-क्षण मरता हूं। आखिर कहां से लाऊं कोहरे को चीरने वाली दृष्टि, वो लेजर नजरिया जो अंधेरों के बीच भी सदियों से चले आ रहे छल को बेपरदा कर सके और मैं हकीकत को क्रिस्टल क्लियर देख सकूं। आमीन...

हम क्यों दें सर्विस टैक्स?

1994-95 में देश में सर्विस टैक्स की शुरुआत तीन सेवाओं से हुई। आज इसे करीब सौ सेवाओं पर लगा दिया गया है। इसे लागू करते समय तर्क दिया गया था कि बहुत सारे लोग अलग-अलग धंधों से अच्छी-खासी कमाई करते हैं, लेकिन सरकारी खजाने में कुछ नहीं देते। इसलिए उन पर टैक्स लगाना जरूरी है। आम लोगों ने इसका स्वागत किया। लेकिन असल में जब ये टैक्स लगाया गया तो सर्विस देनेवालों पर नहीं, सर्विस लेनेवालों पर लगाया गया। यानी, आम आदमी पर बोझ और बढ़ गया। कमानेवालों पर कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि वो तो ग्राहक के बिल में सर्विस टैक्स ऊपर से जोड़ देते हैं। होटल में आप 100 रुपए का खाना खाते हैं तो आपको देने पड़ते हैं 110 रुपए। यही हाल वैल्यू ऐडेड टैक्स, वैट का भी है। फर्नीचर आप खरीदते हैं 1000 रुपए का, लेकिन आपकी जेब से ढीले होते हैं 1125 रुपए। वैसे, आज भी धुआंधार कमाई करनेवाले डॉक्टर और वकील सर्विस टैक्स के नेट से बाहर हैं। लेकिन इन पर सर्विस टैक्स लगाने की मांग करने से भी डर लगता है क्योंकि यह टैक्स लग गया तो ये अपनी फीस उसी हिसाब से बढ़ा देंगे।

आज का सवाल इसी से जुड़ा है :
क्या सर्विस टैक्स सर्विस देनेवालों पर लगाया जाना चाहिए या अभी की तरह सर्विस लेनेवालों पर?

Tuesday, 27 March, 2007

ये ले! दिन के 4 रुपए 81 पैसे

सरकार का खजाना संभालना वाकई हमारे-आपके वश की बात नहीं, क्योंकि उसके खर्चों का तो बहुत-सा फंडा हमारे सिर के ऊपर से गुजर जाएगा। बानगी के लिए नए साल के बजट के कुछ आंकड़े। इस बार कुल खर्च रखा गया है 6,80,521 करोड़ रुपए, जिसमें से 1,50,948 करोड़ रुपए यानी 22.18 फीसदी का इंतजाम उधार से किया गया है, जिसे आर्थिक शब्दावली में राजकोषीय घाटा या फिस्कल डेफिसिट कहते हैं। इस घाटे को घटा दें तो सरकार की आमदनी इस साल रहेगी 5,29,573 करोड़ रुपए।
उधार घटाने के बाद बची इस आमदनी में से 1,58,995 करोड़ रुपए यानी 30.02 फीसदी हिस्सा पुराने उधार की ब्याज अदायगी में चला जाएगा। इस तरह नए कर्ज समेत केंद्र सरकार की कुल आमदनी का 45.54 फीसदी हिस्सा नए पुराने पाप बढ़ाने और काटने में चला जाएगा।
बाकी बचे 3,70,578 करोड़ में से सेना पर खर्च होंगे 96,000 करोड़, जबकि पुलिस से लेकर आईबी, विदेश मामलात, कर संग्रह, चुनाव, कर्मचारियों की तनख्वाह और पेंशन जैसे सरकारी कामों पर खर्च होंगे 47,946 करोड़ रुपए। सरकार और सेना का ये खर्च कुल मिलाकर हुआ 1,43,946 करोड़। इसे घटा दें तो बजट में जनता के लिए बचते हैं 2,26,632 करोड़ रुपए।
गौर करें कि छोटी-सी सरकार और बड़ी-सी जनता के खर्च में बस 82,686 करोड़ रुपए का फर्क है। यहीं पर एक और बात पर नजर दौड़ा लेना ठीक रहेगा। सरकार ने इस बार स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और कला-संस्कृति जैसी तमाम सामाजिक सेवाओं के लिए 9,320 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है, जबकि वो खुद अपने तामझाम (सेना को छोड़कर) पर खर्च करेगी 47,946 करोड़ रुपए।
यानी, हमारी सरकार हमारे-आपके टैक्स वगैरह से जितनी कमाई करती है, उसमें से जितना वो अपने ऊपर खर्च करती है, उसका 20 फीसदी से भी कम हिस्सा देश की एक अरब आबादी के कल्याण पर खर्च करना चाहती है। जाहिर है कि हमारे माई-बाप 100 रुपए खुद खा रहे हैं और हमारी झोली में फेंक रहे हैं 20 रुपए से भी कम। वाकई सरकार को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी कल्याणकारी सेवाओं की कितनी फिक्र है!
आइये, अब देख लेते हैं कि सरकार ने आम जनता के लिए जो 2,26,632 करोड़ (आम बजट के कुल खर्च का एक-तिहाई) रखे हैं, वो जाते कहां हैं। इसमें से 50,987 करोड़ रुपए भांति-भांति की सब्सिडी में जाएंगे। इस सब्सिडी में से 22,452 करोड़ रुपए उर्वरक सब्सिडी के है, जिसे सरकार किसानों के नाम पर खर्च करती है। लेकिन हकीकत में ये पैसा उर्वरक बनाने वाली कंपनियों को दिया जाता है। इसके चलते हमारी उर्वरक कंपनियां बेहतर क्षमता इस्तेमाल और उत्पादन लागत घटाने के बजाय मुफ्त का पैसा खाने की लती होती जा रही हैं।
सरकार इस साल खाद्य सब्सिडी के नाम पर 25,696 करोड़ रुपए खर्च करेगी। सरकार कहती है कि वो इससे गरीबों को सस्ता राशन मुहैया कराती है। लेकिन असल में वो इस पैसे से भारतीय खाद्य निगम जैसे अपने अकर्मण्य उपक्रमों को पालती-पोसती है।
सब्सिडी के पूरे मद को घटा दें तो आम बजट में आम जनता के लिए बचे 1,75,645 करोड़ रुपए। यानी प्रति भारतीय साल भर के लिए 1756.45 रुपए। वाकई सरकार हमारे लिए कितनी फिक्रमंद है! साल भर में हर दिन हम पर खर्च करेगी चार रुपए इक्यासी पैसे। क्या इसी के लिए हम हर साल 28 फऱवरी को बजट का इतनी बेसब्री से इंतजार करते हैं?

एक विचार, एक सवाल

आज का सवाल :

भविष्य पर दांव लगाना जोखिम उठाने की ऐसी मानसिकता है जिससे उद्यमशीलता की बुनियाद बनती है। शेयर बाजार में फ्यूचर्स और ऑप्शंस का खेल या जिंस बाजार के वायदा सौदे एक तरह की सट्टेबाजी ही हैं। ऐसे में क्या देश में क्रिकेट मैचों पर सट्टा खेलने को वैध नहीं बना देना चाहिए? दुनिया के कई देशों में इसे वैध माना जाता है। मैच फिक्सिंग यकीनन एक अपराध है, जिसके खिलाफ सख्त से सख्त सजा होनी चाहिए।

Monday, 26 March, 2007

शाश्वत सवालों के जवाब

अभय बाबू ने करीब बीस दिन पहले पूछे थे पांच सवाल, तो जवाब पेश है। देरी के लिए माफी चाहता हूं। लेकिन ये जिंदगी के शाश्वत सवाल है, इसलिए हमेशा प्रासंगिक रहेंगे।
1. आप आस्तिक हैं या नास्तिक और क्यों?
मैं मूलत: नास्तिक हूं। लेकिन हालात के सामने बेबसी की हालत में आंखें मुंद जाती हैं, हाथ खुद-ब-खुद ऊपर उठ जाते हैं, उसी अंदाज में जैसे एक भूमिहीन बूढ़े गरीब किसान ने किसी दिन कहा था - बच्चा आपन दुख या तौ हम जानी या भगवान जानै। मेरे लिए जिंदगी में जीतना या कम से कम जीत जाने की उम्मीद पाले रखना जरूरी है। भगवान का होना या न होना, मेरे लिए शास्त्रीय बहस और शुद्ध बकवास है। मैं तो भगवान से भी यही दुआ मांगता हूं कि मुझे मन और बुद्धि की इतनी ताकत दे दे कि मेरे लिए तेरा विलोप हो जाए। मैं मानता रहा हूं कि इंसान के ताकतवर होने के साथ भगवान का विलोप होता जाएगा। लेकिन मुझे आश्चर्य होता है जब इनफोसिस के चेयरमैन नारायणमूर्ति और बॉलीवुड के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन कहते हैं कि वे भारतीय टीम का क्रिकेट मैच इसलिए नहीं देखते क्योंकि उन्हें लगता है कि वो अगर मैच देखते हैं तो भारत हार जाता है। मुझे लगता है कि या तो ये लोग झूठ बोलकर आम आदमी जैसा दिखने का स्वांग रच रहे हैं या सचमुच हम भारतीयों की चेतना पर आग्रहो, दुराग्रहों, पूर्वाग्रहों के इतने ज्यादा परदे गिरे हुए हैं कि जबरदस्त सांस्कृतिक तूफान ही इन्हें उड़ा सकता है।
वैसे, मैं ईमानदारी से बता दूं कि प्रकृति में मेरी आस्था है, अपने ऊपर मेरी आस्था है, इंसानियत के सुंदर भविष्य के प्रति मेरी आस्था है। विज्ञान और प्रकृति के नियम मुझे अब भी चमत्कृत करते हैं। प्रकृति की बात आई तो अपनी डायरी में छह साल पहले लिखी ये लाइनें जगजाहिर करना चाहता कि प्रकृति मेरे लिए एक मादा की तरह है जिसे मैं अकेले में भोगना चाहता हूं।
2. सुख की आपकी क्या परिभाषा हैं। क्या करने से आप सुखी हो जाते हैं और अगर नहीं हो पा रहे हैं तो क्या हो जाने से आप सुखी हो जाएंगे?
सुख के लिए तीन चीजें मैं जरूरी मानता हूं। एक, सही जीवनसाथी का मिलना। ऐसा साथी जो आपको समझ सके, जिसमें आप अपना विस्तार देख सकें, जिसके साथ लड़-झगड़कर आप बाहरी-भीतरी हकीकत को और बेहतर तरीके से समझ सकें। दो, कुछ दोस्त जिनकी संगत में आप बेफिक्र होकर खुल सकें, जिन पर आपको विश्वास हो कि वे आपसे छल नहीं करेंगे, आपका मजाक नहीं बनाएंगे। तीसरी चीज है, लगातार आपकी रचनात्मकता का निखार और निकास। रचनात्मकता का निखार ज्ञान बढ़ने के साथ होता है। इसलिए सुख के लिए जिंदगी में लगातार अपनी ही सीमाओं को तोड़ना, नई-नई चीजें सीखते जाना अनिवार्य है।
3. क्या आप अपने बचपन मे वापस लौटना चाहेंगे और क्यों या क्यों नहीं..?
मैं अपने बचपन में कभी नहीं लौटना चाहूंगा, इसलिए नहीं कि मेरा बचपन बहुत बुरा या अच्छा बीता है, बल्कि इसलिए कि बचपन एक सीढ़ी थी जिससे मैं गुजर चुका हूं। समय में पीछे लौटने की नहीं, आगे ही बढ़ने की ही मेरी फितरत है। फिर, अगर मुझे अपने बचपन को ही देखना है तो मैं आज भी देख सकता हूं क्योंकि मुझे लगता है कि एक ही समय में हमारा अतीत और भविष्य दोनों ही किसी न किसी रूप में हमारी आंखों के सामने रहता है। थोड़ा फर्क जरूर होगा, लेकिन आप देखना चाहें तो इन्हें देख सकते हैं।
4. बताएं कि औरतों के बारे में आपकी क्या राय है.. क्या वे पुरुषों से अलग होतीं हैं .. अगर हां तो किन मायनों में?
यकीनन औरतें संवेदनशीलता से लेकर बहुत सारे मायनों में पुरुषों से अलग होती हैं। आत्मवत सर्वभूतेषु की बात औरतों के बारे में लागू नहीं होती। औरतों को अपने जैसा नहीं समझना चाहिए। इस मसले पर आदर्श किताब है डॉ. जॉन ग्रे की बेस्टसेलर मेन आर फ्रॉम मार्स...। इसे हर किसी प्रेमी या शादीशुदा जोड़े को जरूर पढ़ना चाहिए। किसी मित्र की शादी हो तो इसे जरूर भेंट में दें, ये मेरी सलाह है।
5. क्या इस देश के भविष्य के प्रति आप आस्थावान हैं?
मैं अपने हिंदुस्तान के शानदार भविष्य के प्रति पूरी तरह आशावान और आस्थावान हूं। हमारी इच्छाओं से इतर एक प्रक्रिया जारी है। जीवन के हर क्षेत्र में बदलाव हो रहे हैं। ये बदलाव राजनीति को भी बदलने पर मजबूर कर रहे हैं। राइट टू इनफॉरमेशन एक्ट ऐसी ही बदलाव की एक कड़ी है। वैसे, मैं एनजीओ जैसी किसी सोच के मुगालते में नहीं हूं। मेरी घनघोर मान्यता है कि देश में कोई भी स्थायी बदलाव राजनीति के जरिए ही होगा। और ऐसा अपने आप नहीं होगा, इसके लिए सक्रिय हस्तक्षेप की जरूरत है।

नोटों की नीति : जेब कटी हमारी, मौज हुई उनकी

महंगाई के लिए दोषी है सरकार, सरकार और सिर्फ सरकार। सीधा-सा गुणा-भाग है कि सिस्टम में नोट ज्यादा हों जाएंगे और चीजें उतनी ही रहेंगी तो हर चीज के लिए नियत नोट बढ़ जाएंगे। जैसे, जब सिस्टम में 100 रुपए थे और 10 चीजें थीं तो औसतन हर चीज के लिए थे 10 रुपए। लेकिन जब सिस्टम में 150 रुपए आ गए और चीजें 10 ही रहीं तो औसतन हर चीज के लिए 15 रुपए हो गए। हम आपको बता दें कि हमारे रिजर्व बैंक ने अप्रैल 2006 से जनवरी 2007 के बीच सिस्टम में 56,543 करोड़ रुपए डाले हैं और उसने ऐसा किया है देश में आए 1260 करोड़ अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए। अगर वो ये डॉलर नहीं खरीदता तो देश में जो डॉलर अभी लगभग 44 रुपए का मिल रहा है, वह शायद 40 रुपए में मिलने लगता यानी डॉलर के सापेक्ष रुपया महंगा हो जाता, उसका अधिमूल्यन हो जाता। लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक ऐसा नहीं चाहता। क्यों नहीं चाहता? ...क्योंकि इससे भारत से निर्यात किया गया माल डॉलर में खरीद करनेवालों के लिए महंगा हो जाएगा।
मसलन, भारत की जिस शर्ट की कीमत अमेरिका में 440 रुपए है, उसके लिए अभी अमेरिकी ग्राहक को 10 डॉलर देने होंगे। लेकिन अगर रुपया महंगा हो गया होता तो इसी शर्ट के लिए उसे 11 डॉलर देने पड़ते। यानी, रिजर्व बैंक के बाजार से डॉलर खरीद लेने से अमेरिकी ग्राहक के लिए भारतीय माल 10 फीसदी महंगा होने से बच गया।
अब देखते हैं कि भारत के रिजर्व बैंक ने भारतीय ग्राहकों के लिए क्या किया है। उसको ये तो पता ही था कि सिस्टम में ज्यादा नोट होंगे और मांग उतनी ही रही तो महंगाई बढ़ जाएगी। इसलिए उसने सोचा कि घरेलू मांग को ही काट दिया जाए। इसके लिए वो बैंकों में नोटों के पहुंचने पर रोकथाम लगाने लगा, सीआरआर बढ़ा दिया, रिवर्स रेपो रेट बढ़ा दिया। इससे बैंकों के लिए नोट जुटाना महंगा हो गया। बैंकों ने मजबूरन पलटकर ब्याज दरें बढ़ा दीं। नतीजतन, देश में हर तरह का लोन अब महंगा हो गया है। रिजर्व बैंक ने मान लिया था कि ब्याज दरें बढ़ेंगी तो मांग घट जाएगी और मांग घट जाएगी तो सिस्टम में आए ज्यादा नोटों से महंगाई नहीं बढ़ेगी। लेकिन उसकी ये आस महज सदिच्छा बनकर रह गई है। महंगाई की दर 6 फीसदी से बढ़कर सरकार और रिजर्व बैंक को मुंह चिढ़ा रही है। रोजमर्रा की चीजों से लेकर लोन की ईएमआई के बढ़ने से आम से लेकर खास लोग तक कराह रहे हैं।
दिक्कत ये है कि रिजर्व बैंक ने जिस निर्यात को सस्ता बनाए रखने के लिए सिस्टम में करोड़ों रुपए झोंके थे, वो मकसद भी नहीं पूरा हो सका क्योंकि घरेलू महंगाई बढ़ने से निर्यातकों की लागत बढ़ गई और घाटे पर तो वो अपना माल बाहर भेज नहीं सकते। इसलिए दुनिया के बाजार में हमारे निर्यातकों के टिक पाने की क्षमता घट गई।
इस तरह रिजर्व बैंक ने नोटों की जो नीति अपनाई है, उसका हश्र ये है कि न खुदा ही मिला, न बिसाले सनम। अमेरिका और यूरोप के ग्राहकों के लिए भारतीय माल को सस्ता रखने की कोशिश भारतीय ग्राहकों के लिए महंगाई का सबब बन गई है। हकीकत ये है कि आज भारतीय ग्राहक विदेशी ग्राहकों को सब्सिडाइज कर रहा है। अगर आज हमारी जेब कट रही है तो इस जेब से निकले नोटों का फायदा विदेशी ग्राहक को मिल रहा है। ये है हमारी सरकार और रिजर्व बैंक का भारत और भारतीयता प्रेम।
इंडियन एक्सप्रेस के 20 मार्च 2007 के अंक में छपे इला पटनायक के लेख पर आधारित। इला पटनायक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में सीनियर रिसर्च फेलो हैं। उनका ई-मेल पता है : ilapatnaik@gmail.com

एक विचार, एक सवाल

आज का सवाल पेश है :

क्या भारत और यहां के बाशिंदों के समग्र विकास के लिए जरूरी नहीं है कि रक्षा, मुद्रा, विदेश नीति, डाक और रेलवे को छोड़कर बाकी काम राज्यों के हवाले कर दिए जाएं? केंद्र की भूमिका उसी तरह की हो, जैसे यूरोपीय संघ की है? यूरोपीय संघ के अनुभव को पचास साल हो गए हैं, क्या हमें उसके अनुभव पर गौर नहीं करना चाहिए? वैसे, अपने यहां आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के रूप में ऐसा विचार पहले भी आ चुका है।

Sunday, 25 March, 2007

एक विचार, एक सवाल

एक सिलसिला आज से शुरू कर रहा हूं। कोशिश करूंगा कि हर दिन एक सवाल पेश करूं। इसका जवाब दें या न दें, ये आप पर है, लेकिन इस पर सोचें जरूर, ऐसा मैं चाहता हूं।
पहला सवाल, जिसे राजनीतिक मनोवैज्ञानिक आशीष नंदी ने शनिवार, 24 मार्च 2007 के टाइम्स ऑफ इंडिया में उठाया है :
एक अरब की आबादी वाला कोई देश अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान का जिम्मा बीस से तीस साल के 11 खिलाड़ियों पर कैसे छोड़ सकता है? जो काम राजनीतिक नेताओं, प्रशासकों, औद्योगिक हस्तियों, सेना और कानून-व्यवस्था की मशीनरी को करना है, उसके लिए क्रिकेट टीम की तरफ देखना कहां तक वाजिब है?

Saturday, 24 March, 2007

प्यार के दो प्यारे गाने

1. मैं हर सूरत में तुम्हें चाहता हूं। चाहे खुशी हो, गुस्सा हो, झगड़ा हो। शांति में, अशांति में, विक्षोभ में, विभ्रांति में, भीषण असंभव हालात तक में भी तुम्हें चाहता हूं। इस बांग्ला गाने की लाइनें तो खूबसूरत हैं ही, सुमन चटर्जी ने गाया भी बहुत अच्छा है। सुनने के लिए लिंक के पहले गाने पर क्लिक करें।

प्रथोमोतो आमी तोमाके चाइ
द्वितीयोतो आमी तोमाके चाइ
तृतीयोतो आमी तोमाके चाइ
शेष पर्यन्तो तोमाके चाई
तोमाके चाइ, तोमाके चाइ, तोमाके चाइ, तोमाके चाइ...

निझुम अंधकारे तोमाके चाइ
रात भोर होले आमी तोमाके चाइ
सकालेर कोयशोरे तोमाके चाई
संधेर अवकाशे तोमाके चाइ
बैशाखी झोर-ए आमी तोमाके चाइ
आषाढ़ेर मेघे आमी तोमाके चाइ
श्राबणे-श्राबणे आमी तोमाके चाई
अकाल बोधोने आमी तोमाके चाइ
तोमाके चाइ, तोमाके चाइ, तोमाके चाइ, तोमाके चाइ...

कोबेकार कोलकाता शहरे पथे
पुरोनो नोतून मुख घरेइ मारादे
अगन्ति मानुषेर क्लांतो मिछिरे
ओ चेना छुटीर छोंवा तुमी एने दिले
नागरिक क्लांतिते तोमाके चाइ
एक फुटा शांतिते तोमाके चाइ
बोहू दूर हेटे एशे तोमाके चाई
ए जीवन भालोबेशे तोमाके चाइ

चौरास्तार मोड़े पार्के दोकाने
शहरे गंजे ग्रामे एखाने-ओखाने
स्टेशन टार्मिनस घाटे बंदरे
ओचेना ड्राइंग रूमे ओचेना अंदरे
बालिश-तोशोक कारपेट पुरोनो चादोर
ठंडा शीतेर राति मेघे राग
कोड़िकाची चौकाठी मादुरे कवचे
खुशी, राग, अभिमान, झगड़ा-ऊ बोशे
तोमाके चाइ, तोमाके चाइ, तोमाके चाइ...

एक कप चाय आमी तोमाके चाइ
दाईने औ बाए आमी तोमाके चाइ
देखा ना देखाइ आमी तोमाके चाई
ना बोला कोथाय आमी तोमाके चाइ

शीर्षेंदुर कोनो नोतून नावेले
हठात पोढ़ते बोशा आबोल ताबोले
अबद्ध कबितार ठुमरी खेयाले
स्लोगाने स्लोगाने ढाक देयाले देयाले
सलिल चौधरीर फेले आशा गाने
चौरसिय़ार बांशी मुखोरितो प्राने
भूले जावा हिंमाशु दत्तोर सुरे
शेय कोबेकार अनुरोध आशोरे
तोमाके चाइ, तोमाके चाइ, तोमाके चाइ...

अनुरोधे मिनोतीते तोमाके चाइ
बेदोनार आरतीते तोमाके चाइ
दाबी-दावा चाहीदाइ तोमाके चाई
लज्जा बिधाई आमी तोमाके चाइ

अधिकार बूझे नेया प्रखर दाबीते
शरारत जेगे राखा लड़ाकू छबिते
छिप-छिपे कबितार छंदे भाषाई
गद्येर जुक्तिते बांचार आशाय
श्रेणीहीन समाजेर चिरो बाशोना
दिन बोदोलेर इते धरा चेतोनाइ
दिधा-रंगदेर दिन गोछार स्वप्ने
शाम्बो बादेर डाक घूमे-जागोरेने
बिख्खोबे बिप्लोबे तोमाके चाइ
भीषन असंभवे तोमाके चाई
शांति अशांतिते तोमाके चाइ
एई बिभ्रांतिते तोमाके चाइ
प्रथोमोतो आमी तोमाके चाइ, द्वितोयोतो....

2. प्यार का दूसरा शानदार गाना है, जिसे गाया है माइकल बोल्टन ने और जिसकी लाइनें हैं "How Am I Suppose To Live Without You". इसे भी सुनने का आनंद है।
I could hardly believe it
When I heard the news today
I had to come and get it straight from you
They said you were leavin'
Someone's swept your heart away
From the look upon your face, I see it's true
So tell me all about it, tell me 'bout the
plans you're makin'
Then tell me one thing more before I go

Tell me how am I suppose to live without you
Now that I've been lovin' you so long
How am I suppose to live without you
How am I suppose to carry on
When all that I've been livin' for is gone

I didn't come here for cryin'
Didn't come here to break down
It's just a dream of mine is coming to an end
And how can I blame you
When I build my world around
The hope that one day we'd be so much
more than friends
And I don't wanna know the price I'm
gonna pay for dreaming
When even now it's more than I can take

And I don't wanna face the price I'm
gonna pay for dreaming
Now that your dream has come true

Friday, 23 March, 2007

तुम जीते क्यों नहीं यारा!

ऑफिस की आज की चाकरी पूरी हो गई, जिसकी बदौलत मेरा पूरा कुटुंब चलता है, उसका हक अदा करके खाली हो गया तो सोचा कि थोड़ा रुककर अब अपने मन की बात कह ली जाए। कल भगत सिंह की विरासत पर तिर्यक विचार पढ़े तो सोचा कि इसी बहाने हमारी रगों में बहते उस खून को याद कर लिया जाए, जिसकी तीन बूंदों का गला आज से ठीक 76 साल पहले घोंट दिया गया था।
अफसोस! भगत सिंह और उनके दो साथियों की शहादत वो मुकाम हासिल नहीं कर सकी, वो सपना पूरा नहीं कर सकी जिसका ख्वाब इन बंदों ने देखा था। इतिहास में यकीनन, ये हुआ होता तो क्या होता, की बातें नहीं चलतीं। लेकिन हमें सोचने से तो कोई नहीं रोक सकता कि अगर 23 मार्च 1931 की तारीख में हिंदुस्तानी जनमानस पर मोहनदास कर्मचंद गांधी जितना ही असर रखनेवाले भगत सिंह की अगुआई में देश ने आजादी हासिल की होती तो आज देश की हालत क्या होती? तब, शायद दलाली की राजनीति का जो दलदल आज गंध मार रहा है, वह नहीं होता। देश में सच्चा लोकतंत्र स्थापित हो चुका होता। हम दुनिया की अर्थव्यवस्था में चीन से पीछे नहीं, आगे होते।
अब तिर्यक विचार की बात। इस प्रेक्षण से कोई इनकार नहीं कर सकता कि आज के अच्छा-खासा खाते-कमाते मध्यवर्गीय युवा भी अजीब किस्म की पस्तहिम्मती से घिरे हुए हैं। दुनिया से पुरानी पीढ़ी की तुलना में ज्यादा जुड़े होने के बावजूद आत्मघाती अवसाद से शिकार हैं। राजनीति को हीनतर लोगों का काम मानते हैं। लेकिन इस हकीकत को भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि इन्हीं लोगों में वो लोग भी हैं जो आईआईटी और आईआईएम का शानदार करिअर छोड़कर शहरों की गरीब बस्तियों और गांवों की तंग गलियों का रुख कर रहे हैं। और कुछ नहीं तो सूचना के हक की अलख जगाकर तंत्र का गिरेबान पकड़ रहे हैं। ये लोग उन्हीं नौजवानों की बहती धारा की ताजा लहर हैं जो अपना करिअर और पढ़ाई छोड़कर नक्सल आंदोलन में गए थे, जे पी आंदोलन में गए थे या आजादी से पहले भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए थे।
भगत सिंह जब शहीद हुए थे, तब देश में उत्तर से लेकर दक्षिण तक शोक की लहर दौड़ गई थी, कई अखबारों में संपादकीय लिखे गए थे। आज भी हम उस 23 साल के नौजवान की शहादत को याद करते हैं। लेकिन तब भी और आज भी हममें से ज्यादातर लोग भगत सिंह को एक पूर्ण-विराम के रूप में देखते हैं, निरंतरता के रूप में नहीं। भगत सिंह के जमाने में भी क्रांतिकारी अल्पमत में थे और आज भी अल्पमत में हैं, इस पर टेंसुए बहाने की क्या जरूरत है? क्रांतिकारी तब समाज के बहुमत में आते हैं, जब उनका सच सारे समाज के गले उतर चुका होता या वे सत्ता में आ गए होते हैं।
हमें ये समझना होगा कि क्रांति कोई अचानक हुआ विस्फोट नहीं है। वह तो एक सतत प्रक्रिया है जो सदिच्छाओं और दुखी मन के उच्छ्वास से नहीं चलती। मगर, मुश्किल ये है कि हमारी आदत पड़ गई है कि जो नहीं रहता, उसके लिए हम विलाप करते हैं और जो जिंदा हैं उनकी तरफ न तो देख पाते हैं और देख भी पाते हैं तो उनकी कीमत नहीं समझते।
दरअसल, हमारा तथाकथित चैतन्य बुद्धिजीवी समाज एक थका हुआ अतीतजीवी समाज बन गया है। तिर्यक विचारों की बात करते हुए वो भी रैखिक चिंतन ही कर रहा है। अंश को समग्र समझने की गलती कर रहा है। सतह तो देख रहा है लेकिन सतह के भीतर बनती लहरों को नहीं देख पा रहा है। ये किसी मनोचिकित्सक का बताया आशावाद नही है। ये हकीकत है जिसे कबीर, बुद्ध और भगत सिंह की परंपरा के लोग साफ देख सकते हैं। अंत में ये वादा - हम लड़ेंगे साथी, जब तक लड़ने की जरूरत बाकी है।

Thursday, 22 March, 2007

आह-हा! गाओ खुशी के गीत...

तालियां बजाओ, नाचो-गाओ। देश में गरीब घट गए हैं। आबादी में उनका अनुपात घट गया है। योजना आयोग ने मुनादी कर दी है कि साल 1993-94 में जहां देश के 36 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे जी रहे थे, वहीं साल 2003-04 में इनकी तादाद 27.5 फीसदी रह गई, यानी दस सालों के दरम्यान 8.5 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे से निकल कर ऊपर आ गए। नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन (एनएसएसओ) ने आम हिंदुस्तानियों के तीस दिन के उपभोग का आंकड़ा जुटाने की खास पद्धति, यूनिफॉर्म रिकॉल पीरियड (यूआरपी) के आधार पर यह नतीजा निकाला है। अगर इस पद्धति को यूआरपी से बदल कर एमआरपी यानी मिक्स्ड रिकॉल पीरियड कर दिया जाए और ये पता लगाया जाए कि तीस दिन के बजाय साल भर में लोगों ने कितने जूते-चप्पल, कपड़े और साइकिलें वगैरह खरीदीं, तब तो आबादी में गरीबों का प्रतिशत 21.8 ही रह गया है यानी दस सालों में 14.2 फीसदी की शानदार कमी।
ये तो वाकई कमाल हो गया ताऊ! एनडीए से लेकर यूपीए की सरकारें अब अपनी पीठ थपथपा सकती हैं कि आर्थिक सुधार कार्यक्रम रिस-रिस कर नीचे तक पहुंच रहा है और ग्लोबलाइजेशन हिंदुस्तान के आम आदमी का भला कर रहा है, रिफॉर्म विद ए ह्यूमन फेस का नारा चरितार्थ हो गया। सोनिया गांधी कह सकती हैं कि ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना अभी से असर दिखाने लगी है।
लेकिन जरा गौर से देखिए कि सरकार किसको गरीबी रेखा से नीचे और ऊपर बता रही है। यूआरपी पद्धति के मुताबिक तीस दिन के दौरान गांवों में जिस व्यक्ति का कुल उपभोग 356.30 रुपए और शहरों में जिस व्यक्ति का कुल उपभोग 538.60 रुपए से कम है, वो गरीबी रेखा से नीचे है। यानी अगर मुंबई का कोई भिखारी दिन में 18 रुपए कमा लेता है तो वह गरीब नहीं है, उसकी गिनती गरीबी रेखा से नीचे की आबादी में नहीं हो सकती। इस तरह मुंबई से लेकर दिल्ली और चेन्नई के सारे भिखारी तक अब गरीबी रेखा से ऊपर आ गए हैं क्योंकि ये लोग दिन में कम से कम 20 रुपए तो कमा ही लेते हैं। गांवों में तो अब रोज 12 रुपए कमानेवाले भी गरीबों की राष्ट्रीय गिनती से गायब हो गए हैं।
यहीं एक और आंखें खोलनेवाली अध्ययन रिपोर्ट का जिक्र करना चाहूंगा, जिसका ताल्लुक सोनिया गांधी की प्रिय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना से है। इंडिया डेवलपमेंट फाउंडेशन के अध्ययन के मुताबिक आंध्र प्रदेश जैसे जिन राज्यों में ये योजना लागू हुई है, वहां महंगाई की दर सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ी है, जबकि केरल जैसे जिन राज्यों में ये योजना अभी तक लागू नहीं हो पायी है, वहां महंगाई की दर कम रही है। यानी, गरीब को अगर खाने भर की कमाई हो जा रही है तो यह राज्य ही नहीं, पूरे देश के लिए खतरनाक है क्योंकि अगर वो भरपेट खाता है तो खाने की चीजों की मांग बढ़ जाती है और फिर इससे इन चीजों की सप्लाई कम पड़ जाती है, जिससे महंगाई की दर बढ़ जाती है।
ये है आंकड़ों का खेल और हिसाब-किताब। सरकार ने जिस तरह देश के गरीब घटा दिए हैं, उसमें कोई हर्ज नहीं। लेकिन अगर आंकड़ों का नतीजा सही है तो देश के गरीबों के खाने-पीने लायक होते ही हमारी-आपकी पैंट ढीली हो सकती है, जेब में लग सकती है सेंध। इसलिए अपनी खोल में जीनेवाले सभी ब्लॉग-बंधुओं सावधान! गरीब गरीब ही रहें तो अच्छा है। ये मेरा नहीं, सरकार की आंकड़ेबाज़ी का संदेश है।

Wednesday, 21 March, 2007

रिक्तता के राज-कुंवर

दर्द का रिश्तों से गहरा नाता है। आप रिश्ते संभालिए, हम दर्द संभालते हैं। ये स्लोगन है हर तरह के दर्द की निवारक एक आयुर्वेदिक दवा के विज्ञापन का, जो मुंबई की लाइफलाइन लोकल ट्रेनों के तमाम डिब्बों में इन दिनों चस्पा हुआ पड़ा है। लेकिन लगता है ज्यादातर हिंदुस्तानी अवाम ने भी राजनीति से यही रिश्ता बना रखा है। वो अपने रिश्तों के उलझाव को सुलझाने में लगा रहता है और दर्द के निवारण का काम उसने राजनीति पर छोड़ रखा है। कोउ नृप होय, हमैं का हानी की सोच अब भी हावी है। इसी का फायदा उठाकर नेता अपना ढोल बजाकर राजनीति का मजमा लगाए हुए हैं। खानदानी राजनीति के चलते चले जाने की एक बड़ी वजह यही है। ठाकरे से लेकर शरद पवार और गांधी परिवार तक के लोग इसी सोच के चलते राजनीति का खानदानी सफाखाना चला रहे हैं, विज्ञ