Sunday, 30 March, 2008

भारतीय ब्लॉगिंग की दुनिया, जहां हिंदी बस 4/500 है

नौ घंटे का बारकैम्प मुंबईस्टाइल पूरी ‘इश्टाइल’ से कल आईआईटी मुंबई में संपन्न हो गया। रजिस्ट्रेशन, नाश्ता, शुरुआती रूपरेखा, लंच और चाय-पानी वगैरह का समय निकाल दिया जाए तो इस कैंप में पांच घंटे तक ब्रेनस्टॉर्मिंग बातचीत हुई। शुरू में थोड़ी निराशा यह देखकर ज़रूर हुई थी कि कोई भी हिंदी ब्लॉगर इसमें नहीं पहुंचा था। फोन किया विकास आए और बताया कि हिंद-युग्म के पंकज तिवारी भी शिरकत के लिए आए हुए हैं। पंकज के साथ उनके सहयोगी साकेत चौधरी भी थे। थोड़ा ढांढस बंधा कि चलो अब अकेले नहीं, हिंदी के हम चार बंदे हो गए हैं। लेकिन इस कैंप में उमड़े तकरीबन 500 लोगों में चार की गिनती हिंदी और हमें गायब करने के लिए पर्याप्त थी। अफसोस इस बात का रहा कि युनूस भाई तक किसी फंसान या थकान के चलते नहीं आ पाए जबकि उन्होंने ही तरुण चंदेल का वह मेल बहुतों को फॉरवर्ड किया था जिसमें तरुण की दिली पेशकश थी कि, “हमें हिन्दी ब्लॉगिंग पर एक चर्चा करनी चाहिए ब्लॉग कैम्प में। ज़रूरी नही है कि ये चर्चा powerpoint slides के साथ की जाए, हम ‘चाय पर दो बातें’ जैसी चर्चा भी कर सकते हैं।”

विषय तय करने की प्रक्रिया के दौरान मैं और विकास (लाल गोले में)
कोई तो कम्युनिकशन गैप रह गया होगा कि मुंबई के हिंदी ब्लॉगर्स इसमें नहीं आ पाए। खैर, दिलचस्प बात यह रही कि जब पंकज तिवारी ने अपने विषय के बारे में बताया कि वे हिंदी ब्लॉगिंग की दशा और दिशा के बारे में बोलेंगे तो आयोजन में आए लोगों ने ऐसी तालियां बजाईं जैसी किसी के लिए नहीं बजी थीं। 500 से ज्यादा लोगों में कुछ लोग शुद्ध तकनीक या मार्केटिंग से जुड़े थे तो तकरीबन एक तिहाई सीधे-सीधे ब्लॉगिंग से ताल्लुक रखते थे। लोगों को तीन हिस्सों में बांट दिया गया और फिर तीन हॉल में चले गए लोग आपसी अनुभवों को आपस में बांटने के लिए।

जाहिर है मैं, विकास, पंकज और साकेत ब्लॉगिंग वाले हॉल में जाकर डट गए। ब्लॉग से कमाई से लेकर उनको लोकप्रिय बनाने की ऐसी-ऐसी तकनीकी जुगत कि माथा भन्ना जाए!! अंग्रेज़ी के लोग थे तो सब कुछ अंग्रेज़ीमय था। फिर भी बहुत सारी चौंकानेवाली बातें सामने आईं। जैसे, अपनी 200 वेबसाइट्स (इसमें से 10% ब्लॉग) से फरवरी में 53,500 डॉलर (21.40 लाख रुपए) कमा चुके और मार्च में 60,000 डॉलर (24 लाख रुपए) की अनुमानित कमाई करनेवाले पुणे के ब्लॉगर करमवीर ने डंके की चोट पर बताया कि उन्हें कमाई और ट्रैफिक से मतलब है, बाकी किसी चीज़ से नहीं। तो, कैंप के आयोजकों में शुमार तरुण चंदेल ने कहा कि उनके लिए काम के दस पाठक ही पर्याप्त हैं, दस हज़ार के जुगाड़ू ट्रैफिक की तुलना में। कुछ ने बताया कि ब्लॉगिंग ने दोस्तों का दायरा पेशे और परिवार से बाहर तक फैला दिया है तो कुछ ने कहा कि आज ब्लॉगिंग कैसे एक emotional safety net बन गई है।

लंच के बाद पंकज तिवारी ने अपनी बात रोचक अंदाज़ में रखी। सभी ने गौर से सुना। लेकिन बात उठी कि हिंदी ही नहीं, देश की कन्नड़, तमिल, तेलुगू, मलयालम जैसी 18 क्षेत्रीय भाषाओं में लिखकर हम केवल एक भाषा तक सिमट जाते हैं, जबकि अंग्रेज़ी में लिखकर हम देश में सभी भाषाएं बोलनेवालों तक पहुंच सकते हैं। मुझे लगा कि यह देश का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि संविधान की धारा 343 के तहत देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी को केंद्र सरकार की राजकीय भाषा मानने के बावजूद अब भी अंग्रेज़ी का इतना प्रभुत्व है। इसमें दोष हमारा-आपका या इनका-उनका नहीं है। दोष उनका है जो आज़ादी की लड़ाई के दौरान और उसके बाद भी विकास की बाध्यकारी औपनिवेशिक संरचना से हमें बाहर नहीं निकाल सके।

वैसे तो बारकैम्प एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन है और इसके तार दूर-दूर तक जुड़े हैं। Flickr पर barcamp की फोटो खोजिए तो एक ही जैसे logo के साथ आपको सेंट्रल एशिया से लेकर मायामी तक की तस्वीरें मिल जाएंगी। लेकिन कल के आयोजन में आए किसी भी शख्स में हिंदी को हीन मानने या हिकारत की निगाह से देखने की सोच लेशमात्र भी नहीं नज़र आई। लेकिन इतना ज़रूर समझ में आया कि भारत में अंग्रेज़ी ब्लॉगरों की अलग दुनिया है। उनकी दुनिया और हमारी दुनिया में चंद अमूर्त भावनाओं और इच्छाओं के अलावा शायद कुछ भी कॉमन नहीं है। हम दोनों mutually disjoint entities हैं। अंग्रेज़ी वाले हिंदी ब्लॉगर को किसी संत और त्यागी-महात्मा जैसा सम्मान ज़रूर दे सकते हैं, लेकिन उसके साथ उनका संवाद संभव नहीं है। बीसवें माले का आदमी दूसरे माले के आदमी से बात करेगा भी तो कैसे। वैसे, शायद कुछ हिंदवालों ने भी हिंदी के उद्धार का एनजीओ-मार्ग अपना रखा है। मुझे नहीं लगता कि इस ऑफलाइन-ऑनलाइन फेनोमेना से हम हिंदी वालों का कोई स्थाई भला होनेवाला है।

Wednesday, 26 March, 2008

कैसी कर्जमाफी कि मरते ही जा रहे हैं किसान?

जो देखना चाहते थे, उनके लिए तो किसानों के लिए 60,000 करोड़ रुपए की कर्ज-माफी की घोषणा का सच बजट के दिन ही सामने आ गया था। उसी दिन साफ हो गया था कि खुदकुशी कर रहे विदर्भ के किसानों का रुदन इससे थमने वाला नहीं है। अब इसका प्रमाण भी मिलने लगा है। इसी हफ्ते रविवार से मंगलवार तक के तीन दिनों में ही विदर्भ के 14 किसानों ने आत्महत्या की है। इसके साथ 29 फरवरी को बजट के आने के बाद से विदर्भ में खुदकुशी करनेवाले किसानों की संख्या 61 पर पहुंच गई है।

अकोला ज़िले के बाभुलगांव के रहनेवाले 48 साल के श्रीकृष्ण कलम्ब ने इसलिए खुदकुशी कर ली क्योंकि उन्होंने कृषक को-ऑपरेटिव सोसायटी से 37,000 रुपए का कर्ज ले रखा था, लेकिन पांच एकड़ से ज़रा-सी ज्यादा ज़मीन होने के कारण वे कर्जमाफी के हकदार नहीं थे। उनकी पांच बेटियां है, जिनमें से दो की शादी के लायक हो चुकी है। कलम्ब ने अपने सुसाइट नोट में अचानक लिए गए इस फैसले की तुलना पिछले हफ्ते की बेमौसम बरसात से की है जिससे पूरे विदर्भ में फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। उन्होंने अपनी आत्महत्या को भगवान का चढ़ावा बताया है।

वरधा जिले के सेलु-मुरपद गांव के किसान सुधारक पोटे ने सोमवार को फांसी लगा ली। उन्होंने भी भारी कर्ज ले रखा था। लेकिन 16 एकड़ के काश्तकार होने के कारण उन्हें सरकारी दरियादिली का लाभ नहीं मिलनेवाला था। अकोला ज़िले के हिंगना-बावापुर गांव के शंकर तायडे और जमथा के विजय आक्रे ने रविवार को अपनी जान ले ली। हालांकि उनके पास क्रमश: ढाई और चार एकड़ ज़मीन थी। इसलिए वो कर्जमाफी के हकदार थे। लेकिन उन्होंने बैंकों या को-ऑपरेटिव सोसायटी से नहीं, साहूकारों से कर्ज ले रखा था। इनके अलावा रविवार और सोमवार को विदर्भ के दस और किसानों से खुदकुशी की है। विदर्भ के इलाके में इस साल जनवरी में 80, फरवरी में 86 और मार्च में अब तक लगभग 60 किसान खुदकुशी कर चुके हैं।

गौरतलब है कि पूरे विदर्भ का इलाका वर्षा-आधारित यानी असिंचित है। सोनिया गांधी तक कह चुकी हैं कि इस तरह के असिंचित इलाकों में पूरी कर्जमाफी के लिए जोत की सीमा 5 एकड़ से बढ़ाई जाएगी। लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है। ऊपर से महाराष्ट्र सरकार के नए साल के बजट ने विदर्भ के कपास किसानों को काफी निराश किया है। विदर्भ जन आंदोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी का कहना है कि सोनिया गांधी के अलावा और कांग्रेस व एनसीपी ने भी 2004 में अपने चुनाव घोषणापत्र में कपास के लिए 2700 रुपए प्रति क्विंटल का गारंटी मूल्य देने का वादा किया था, लेकिन नए साल का बजट पेश करते हुए राज्य के वित्त मंत्री जयंत पाटिल ने इस बारे में एक शब्द भी नहीं बोला है। सरकार के वादे और इरादे का यह फासला सच्चाई को सामने लाने के लिए काफी है।

अंत में बस एक बात और। बजट के तीन-चार दिन बाद तक पारंपरिक मीडिया कर्ज माफी के पैकेज पर तालियां बजा रहा था। लेकिन ब्लॉग पर बजट के दिन ही इसका खोखलापन उजागर कर दिया था। साथ ही विदर्भ के किसानों की खुदकुशी की खबर पहले ब्लॉग पर आई, उसके एक दिन बाद मीडिया में। इससे ब्लॉगिंग की अहमियत अपने-आप साबित हो जाती है।
फोटो सौजन्य: crazyc78

अनाम को ब्लॉक करें ताकि बना रहे आपसी भरोसा

छोटा था तो पिताजी एक बार बैल खरीदने के लिए सुल्तानपुर ज़िले में पड़नेवाले गुप्तारगंज के मशहूर मेले में साथ ले गए। वहीं मुझे पता कि बैल के दांत, कद-काठी या मोटा-तगड़ा होने के साथ ही उसे चलाकर देखना ज़रूरी होता है। नहीं तो पूरी असलियत पता नहीं चलेगी। ब्लॉगिंग की दुनिया में भी चलते रहने से ही नए-नए सच सामने आ रहे हैं। आपके नाम से कोई भी किसी के ब्लॉग पर टिप्पणी कर सकता है और आपको पता भी नहीं चलेगा। जब तक पता चलेगा, तब तक सामनेवाला आपके बारे में जल-भुनकर एक राय कायम कर चुका होगा। आप कहां तक और किस-किसको सफाई देते फिरेंगे।

अच्छी बात यह हुई कि कल के प्रकरण पर पहले तो Ghost Buster ने कुछ जानकारियां दी। प्रमोद ने उसमें कुछ और नुक्ते निकाले तो आखिर में Ghost Buster ने बड़ी मुकम्मल सी राय रखी है, जिस पर मुझे लगता है कि सब ब्लॉगरों को गौर करना चाहिए। उनके दो सुझाव है:
एक, अगर सभी ब्लागर एकमत होकर कमेंट्स के लिए anonymous का ऑप्शन हटा दें तो कोई आपके ब्लॉग पर किसी और के नाम से फर्जी टिप्पणी नहीं कर पाएगा।
दो, सभी ब्लागर्स को अपने प्रोफाइल में अपना चित्र जरूर शामिल करना चाहिए जो कि कमेंट के साथ दिखता है क्योंकि फ्रॉड लोग झूठे कमेंट के साथ ये फोटो नहीं लगा पाएंगे।

मुझे तो ये सुझाव बड़े काम के लगते हैं। लेकिन अकेले के मानने से मुश्किल आसान नहीं होगी क्योंकि मान लीजिए मैंने anonymous का ऑप्शन ब्लॉक कर दिया। लेकिन अगर आपने नहीं किया है तो आपके ब्लॉग पर कोई मेरे फर्जी नाम से कमेंट कर सकता है जिसमें मेरा ही प्रोफाइल दिखाई देगा। इसलिए अगर यह काम सभी ब्लॉगर एक साथ करेंगे, तभी किसी के भी नाम और प्रोफाइल के गलत इस्तेमाल को रोका जा सकता है।

कमेंट में anonymous के कमेंट रोकने का तरीका बड़ा आसान है। आप लॉग-इन करने के बाद सेटिंग्स में जाइए, वहां से कमेंट्स में। इसमें दूसरे नंबर पर दिखेगा – Who can comment? आप इसमें User with Google Accounts या Registered Users – includes OpenID में से कोई एक विकल्प चुन सकते हैं। Registered Users – includes OpenID का विकल्प चुनने से फायदा यह होगा कि वर्डप्रेस, टाइपपैड, एओएल पर खाते वाले लोग भी कमेंट कर पाएंगे। दोनों में से एक विकल्प चुनने के बाद save settings कर दीजिए तो फर्जी नाम से की जानेवाली टिप्पणियों पर रोक लग जाएगी। ब्लॉगर पर यह सुविधा है। वर्डप्रेस वाले कैसे कर सकते है, ये मुझे नहीं पता।

तो अंत में मेरा यही कहना है कि क्यों न हम सभी हिंदी ब्लॉगर मिलकर एक सामूहिक पहल करें और अपने ब्लॉग पर anonymous/अनाम/बेनाम टिप्पणियों का विकल्प ब्लॉक कर दें। इससे हमारा आपसी भरोसा कायम रह सकता है। कोई उसमें सेंध नहीं लगा पाएगा, एक-दूसरे के प्रति अविश्वास नहीं पैदा कर पाएगा। नहीं तो जानते ही हैं आज की दुनिया में भरोसा बड़ी भंगुर-सी चीज़ होता है। ज़रा-सा झटके से भर-भराकर टूट जाता है और एक बार टूट गया तो फिर से उसका जुड़ना बेहद मुश्किल होता है।

Tuesday, 25 March, 2008

मेरे नाम से की गई टिप्पणी फ्रॉड है

आज तबीयत थोड़ी नासाज थी तो न सुबह कुछ लिख सका और न ही शाम को कुछ लिखने का मन हो रहा था। लेकिन औरों को पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर सका। पहुंच गया ब्लॉगवाणी पर और वहां सबसे ज्यादा पढ़ी गई पोस्ट पर क्लिक किया तो विमल की अतीत-यात्रा की आखिरी किश्त पढ़कर मन खुश हो गया। लेकिन लेख के अंत में टिप्पणियों पर पहुंचा, तो मैं चौंक गया। पहली ही टिप्पणी मेरी है जिसमें लिखा गया है कि, “अविनाश के मोहल्‍ले को इस संस्‍मरण में आपने भी लिंक रहित करके एक सुखद काम किया है। अब साइडबार से भी उसको बेदखल करें।” और, मजे की बात है कि अजित भाई ने गंभीरता से लेते हुए तुरंत इसका जवाब भी दे डाला।

मैंने तुरंत अजित भाई को फोन मिलाया, लेकिन उनका फोन नहीं मिला। मुझे उन्हें यह बताना था कि यह टिप्पणी मेरी नहीं है। टिप्पणी की तिथि 24 मार्च और समय 10:00 PM लिखा है, जबकि उस समय मैं लोकल ट्रेन से घर जा रहा था। यकीन मानिए, मैं अंदर से हिल गया हूं कि इस तरह का फ्रॉड ब्लॉग-जगत में चलने लगा तो किसी की भी छवि मिनटों में बरबाद की जा सकती है।

मैं अपनी तरफ से साफ कर दूं कि मैंने कल ही शपथ ली है कि आगे से अविनाश और मोहल्ला के बारे में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कुछ नहीं लिखूंगा। न उनके ब्लॉग पर कोई टिप्पणी करूंगा। हुआ यह कि मेरी कल की पोस्ट पर दिल्ली में एनडीटीवी के आईपी एड्रेस से किसी राघव आलोक नाम के सज्जन ने बिना सिर-पैर की टिप्पणी की, जिसे मैंने मॉ़डरेशन में देखने के बाद रिजेक्ट कर दिया। मुझे लगता है कि वही सज्जन व्यथित होकर आज मेरे नाम से विवादास्पद टिप्पणी करके मेरी छवि बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

मेरा उनसे अनुरोध है कि कृपया ऐसा न करें। यह फ्रॉड है। देर-सबेर कानून भी इसे फ्रॉड मानेगा और आप फंस सकते हैं। बाकी आप सभी बंधुओं से गुजारिश है कि जब भी टिप्पणी में मेरे नाम पर क्लिक करने से मेरे प्रोफाइल के बजाय मेंरा ब्लॉग खुले तो आप समझ लीजिएगा कि वह टिप्पणी मैंने नहीं, किसी फ्रॉड ने की है। अजीब बात है। पहले इस खुराफात की गुंजाइश वर्डप्रेस के ब्लॉग पर थी, अब ब्लॉगर पर भी भाई लोगों ने इसका रास्ता खोज लिया है। इसे रोकना होगा। कैसे, मुझे नहीं पता। ब्लॉगिंग के तकनीकी गुरु इसका रास्ता खोजे, वरना ऐसे ‘चरित्र-हनन’ से किसी को भी कभी भी अविश्वसनीय बनाया जा सकता है।

Monday, 24 March, 2008

बड़ी हत्यारी और बेरहम है तुम्हारी दिल्ली

बीस साल की दालिया बीवी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उसके ये शब्द अब भी दिल्ली की हवाओं में, फिज़ाओं में गूंज रहे हैं। उसने मरने के कुछ ही घंटे पहले एम्स में अपनी देखभाल कर रही नर्स से ठेठ देहाती बांग्ला में कहा था – बड़ी बेरहम और हत्यारी है तुम्हारी दिल्ली। लेकिन जो लोग कुरुक्षेत्र में अब भी गीता के श्लोकों की गूंज सुनने का दावा करते हैं, उनके कान दालिया के दिल से निकली आवाज़ को नहीं सुन सकते क्योंकि वे मिथकीय सिज़ोफ्रेनिया के शिकार हैं। गाज़ा में हो रही मौतों पर आंसू बहानेवाले दिल्ली के लोगों के लिए भी दालिया के ये शब्द मायने नहीं रखते क्योंकि वे दिमागी हाइपरमेट्रोपिया के शिकार हैं।

पश्चिम बंगाल की दालिया बीवी अपने शौहर के साथ दिल्ली आई थी नई ज़िंदगी और भविष्य का ख्वाब लेकर कि जहां लाखों लोगों को रोज़ी-रोज़गार का ज़रिया मिल ही जाता है, वहां वह भी अपना कुनबा बसा लेगी। लेकिन चार दिन में ही दिल्ली ने अपना असली जौहर दिखा दिया। पहले तो उतरते ही सारा माल-असबाब कोई लेकर भाग गया। फिर जहां भी गई, गिद्धों की निगाहें उसके जवान जिस्म को नोंचने के फिराक में लगी रहीं। हद तो तब हो गई जब बेरहम दिल्ली ने उसके शौहर की ही जान ले ली। अब तो एकदम तन्हा हो गई वह। इनकी तन्हा कि गोद के तीन महीने के बच्चे रज़ीबुल का भी ख्याल नहीं आया। बाथरूम के फर्श पर रज़ीबुल को रोता छोड़कर उसने खिड़की से लटककर फांसी लगा ली।

चार दिन पहले ही वह जलपाईगुड़ी से कोलकाता और फिर कोलकाता से ट्रेन पकड़कर अपने शौहर अवकीद और तीन महीने के बच्चे के साथ दिल्ली पहुंची थी। अवकीद आठ साल पहले दिल्ली में सोहना रोड की एक फैक्टरी में काम कर चुका था। लेकिन दालिया पहली मर्तबा दिल्ली आई थी। उन्होंने सोचा था कि चंद रोज़ अवकीद के छोटे भाई मस्तूल के यहां रुक लेंगे। फिर कोई काम धंधा मिलते ही अलग बंदोबस्त कर लेंगे। लेकिन स्टेशन पर ही किसी ने उनके बक्से पर हाथ साफ कर दिया। ये तो कहिए कि नकद पैसे कंधों पर रखे थैलों में थे, नहीं तो बच्चे को दूध पिलाना तक दूभर हो जाता। खैर, सामान चोरी हो जाने के बाद उन्होंने मस्तूल के यहां जाने का इरादा छोड़ दिया क्योंकि हो सकता था कि मस्तूल कहता कि आते ही सामान चोरी का बहाना बनाकर गले पड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

फिर दालिया और अवकीद दो दिन तक बच्चे को गोद में उठाए जहां-तहां काम के सिलसिले में भटकते रहे। नई-नई बिल्डिंगों के आसपास मंडराते। खुदी सड़क के इर्दगिर्द भटकते। शायद कहीं काम मिल जाए। काम नहीं मिला। उल्टे लोगों की घूरती आंखों से दालिया एकदम बिदक गई। अवकीद से कहने लगी – मैं दिल्ली में नहीं रह सकती। यहां तो हर कोई आपको जिंदा निगलने की घात लगाए बैठा है। अवकीद ने किसी तरह उसे शांत कराया। दो दिन किसी तरह जहां-तहां भटकते, फुटपाथ या पार्क में सोते बीत गए। अंटी में रखे 300 रुपए अब आधे हो चुके थे। वो निजामुद्दीन इलाके में सड़क के किनारे खड़े थे। अकरीद थोड़ा बेचैन था। थोड़ा आगे खड़ा था। तभी रफ्तार से आती एक ब्लू लाइन बस उसको उड़ा ले गई। अवकीद ने मौके पर ही दम तोड़ दिया।

दालिया का सारा संसार अब दिल्ली की सड़क पर खून बनकर बिखर चुका था। आधे घंटे में पुलिस आई। अवकीद की लाश को उठाकर ले गई। सदमे की शिकार दालिया को उसके तीन महीने के रज़ीबुल के साथ दिल्ली के मशहूर अस्पताल एम्स के ट्रामां सेंटर में पहुंचा दिया गया। वह बेहद डरी-सहमी हुई थी। नर्स से बार-बार यही कहती, “मैं दिल्ली में नहीं रह सकती। यहां का हर दूसरा आदमी मुझे खाना चाहता है। ये लोग मुझे बेच डालेंगे दीदी, मुझे बचा लो सिस्टर।” नर्स और डॉक्टर उसे समझाते रहे। लेकिन उसका मन अशांत रहा। दिक्कत यह भी थी कि वह सिर्फ बांग्ला ही बोल और समझ सकती थी। कुछ भी समझ में नहीं आया तो वह मर गई। तीन महीने का रज़ीबुल अपने चाचा के साथ वापस जलपाईगुड़ी अपनी दादी के पहुंच चुका है।
नोट - इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं असली हैं, लेकिन तस्वीर किसी और की है।
तस्वीर साभार: ozymiles

Sunday, 23 March, 2008

देश का असली शहीद दिवस तो आज है

सरकार के नियम-धर्म से सारा देश 30 जनवरी को शहीद दिवस मनाता है। क्यों? क्योंकि 30 जनवरी 1948 को मोहनदास कर्मचंद गांधी को नाथूराम गोंडसे नाम के एक हिंदूवादी देशभक्त ने गोली मार दी थी। गोंडसे कुछ भी था, लेकिन उसे हम देश का दुश्मन नहीं कह सकते। बहुत हुआ तो गुमराह कह सकते हैं। इसका मतलब महात्मा गांधी की हत्या देश के किसी दुश्मन ने नहीं की थी। मेरा सवाल यह है कि अगर गांधीजी ने 30 जनवरी 1948 को बंद कमरे में खुदकुशी की होती तब भी क्या हम देश में 30 जनवरी को शहीद दिवस मनाते?

दूसरी तरफ ब्रिटिश हुकूमत ने आज के दिन 23 मार्च 1931 को देश के तीन सपूतों भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर लटका दिया था। ये तीनों पवित्रतम देशभक्ति की मिसाल थे। ज़रा-सा भी राजनीतिक खोट नहीं था इनकी समझ में। इन्होंने असेम्बली में बम फेंका था तो किसी को मारने के लिए नहीं, बल्कि बहरों को सुनाने के लिए। ये चाहते तो माफी मांग कर आसानी से फांसी से बच सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा करना ज़रूरी नहीं समझा क्योंकि भगत सिंह के शब्दों में, “दिलेराना ढंग से हंसते-हंसते फांसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरजू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी ताकतों के बूते की बात नहीं रहेगी।”

भगत सिंह ने यह बात 22 मार्च 1931 को अपने साथियों को लिखे आखिरी खत में कही थी। अदालती आदेश के मुताबिक भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च 1931 को फांसी लगाई जानी थी, सुबह करीब 8 बजे। लेकिन 23 मार्च 1931 को ही इन तीनों को देर शाम करीब सात बजे फांसी लगा दी गई और शव रिश्तेदारों को न देकर रातोंरात ले जाकर ब्यास नदी के किनारे जला दिए गए। असल में मुकदमे की पूरी कार्यवाही के दौरान भगत सिंह ने जिस तरह अपने विचार सबके सामने रखे थे और अखबारों ने जिस तरह इन विचारों को तवज्जो दी थी, उससे ये तीनों, खासकर भगत सिंह हिंदुस्तानी अवाम के नायक बन गए थे। उनकी लोकप्रियता महात्मा गांधी को मात देनी लगी थी।

कांग्रेस तक में अंदरूनी दबाव था कि इनकी फांसी की सज़ा कम से कम कुछ दिन बाद होनेवाले पार्टी के सम्मेलन तक टलवा दी जाए। लेकिन अड़ियल महात्मा ने ऐसा नहीं होने दिया। चंद दिनों के भीतर ही ऐतिहासिक गांधी-इरविन समझौता हुआ जिसमें ब्रिटिश सरकार सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राज़ी हो गई। सोचिए, अगर गांधीजी ने दबाव बनाया होता तो भगत सिंह भी रिहा हो सकते थे क्योंकि हिंदुस्तानी जनता सड़कों पर उतरकर उन्हें ज़रूर राजनीतिक कैदी मनवाने में कामयाब रहती। लेकिन अहिंसा के पुजारी पुण्यात्मा महात्मा दिल से ऐसा नहीं चाहते थे क्योंकि तब भगत सिंह के आगे इन्हें किनारे होना पड़ता। खैर, इतिहास में किंतु-परंतु नहीं चलते। जो होना था, वह हो चुका है। अब समय के चक्र को पीछे नहीं मोड़ा जा सकता।

लेकिन आज तो हम इतिहास की गलती को सुधार सकते हैं। इतना तो साफ है कि तीन क्रांतिकारी नौजवान भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव आज के दिन देश के लिए लड़ते हुए अंग्रेज़ों के अन्याय का शिकार हुए थे, जबकि महात्मा गांधी अपनी करतूतों के चलते देश के ही एक नागरिक के हाथों मारे गए थे। गांधी ने हमेशा अंग्रेज़ों से दोस्ती निभाई। पहले विश्वयुद्ध में उनके लिए सैनिकों की भर्ती कराई और 15 अगस्त 1947 के बाद भी माउंटबेटन से कुछ साल और भारत में रहने का आग्रह किया। स्पष्ट है कि गांधी का मरना इन तीनों नौजवानों की फांसी के सामने पासंग बराबर भी नहीं है। इसलिए मेरा मानना है कि देश में 30 जनवरी के बजाय 23 मार्च को शहीद दिवस मनाया जाना चाहिए।

Saturday, 22 March, 2008

रंगों के त्यौहार पर थोड़ा रंगभेद हो जाए तो!!!

चमड़ी पर लगा रंग धुल जाता है, लेकिन चमड़ी का रंग कभी नहीं धुलता। अमेरिका में लोकतंत्र की स्थापना को दो सौ साल से ज्यादा हो गए हैं। लेकिन आज भी वहां गोरों और कालों के विभेद की बात हो रही है। राष्ट्रपति चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के काले उम्मीदवार बराक ओबामा के भाषण का एक अंश पेश कर रहा हूं जो उन्होंने चंद दिनों पहले फिलाडेल्फिया में दिया था। मुझे तो इससे अमेरिकी राजनीति को समझने में मदद मिली है और मैं पहले से ज्यादा ओबामा का समर्थक बन गया हूं। शायद आपके साथ भी ऐसा ही कुछ हो...

एक तरफ कहा जा रहा है कि मेरी उम्मीदवारी एफरमेटिव एक्शन जैसा कुछ है, जो बड़ी सस्ती किस्म की जातिगत मेलमिलाप की उदारवादी इच्छा पर आधारित है; दूसरी तरफ मेरे पूर्व धर्मगुरु रीव जेरेमियाह राइट ऐसे भड़काऊ बयान दे रहे हैं जिससे जातिगत फासले न केवल बढ़ सकते हैं, बल्कि हमारे राष्ट्र की महानता और अच्छाई दोनों ही गर्त में जा सकती हैं। गोरे और काले इससे समान रूप से आहत हुए हैं। लेकिन मैं उनको (पूर्व धर्मगुरु) छोड़ नहीं कर सकता जैसे मैं काले समुदाय को नहीं छोड़ सकता। मैं उनका परित्याग नहीं कर सकता जैसे मैं अपनी गोरी दादी को नहीं छोड़ सकता – वह महिला जिसने मेरा लालन-पालन किया, वह महिला जिसने बार-बार मेरे लिए कुर्बानी दी, वह महिला जो मुझे इस दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करती है, लेकिन वह महिला जिसने एक बार काले लोगों से अपने डर का इकरार किया था जो गली में उस पर छींटाकशी करते थे और जिसने कई बार ऐसी रंगभेदी या जाति से जुड़ी रूढिवादी बातें भी कही थीं, जिनसे मैं झल्ला जाता था। ये सारे लोग मेरा हिस्सा हैं। और वे हिस्सा हैं अमेरिका के, वह देश जिसे मैं प्यार करता हूं।

आज हम एक ऐसी राजनीति अपना सकते हैं जो विभाजन को, लड़ाई को और निंदा को बढ़ावा देती है। हम चाहें तो रीव राइट के प्रवचन हर चैनल पर हर दिन दिखा सकते हैं। उस पर तब तक बातें कर सकते हैं, जब तक चुनाव पूरे नहीं हो जाते। इसे चुनाव प्रचार का इकलौता सवाल बना सकते हैं कि अमेरिकी जनता ये मानती है कि नहीं कि राइट की बेहद आक्रामक बातों से मेरा इत्तेफाक है या नहीं। हम हिलेरी (क्लिंटन) के समर्थकों की छिटपुट बातों का हवाला देकर कह सकते हैं कि वह जाति का कार्ड खेल रही है। हम अटकलें लगा सकते हैं कि सारे के सारे गोरे लोग इस आम चुनाव में जॉन मैक्कैन (रिपब्लिकन उम्मीदवार) की नीतियों की परवाह किए बगैर उनके साथ जाएंगे या नहीं। हम ऐसा कर सकते हैं।

लेकिन अगर हम ऐसा करते हैं तो मै आपको बता सकता हूं कि अगले चुनाव में हम फिर इसी तरह के किसी और निरर्थक मुद्दे की चर्चा कर रहे होंगे। ऐसे अनर्गल मुद्दों का सिलसिला चुनाव-दर-चुनाव चलता जाएगा और कुछ नहीं बदलेगा। हम चाहें तो ऐसा कर सकते हैं। या, इसी वक्त, इस चुनाव में हम एक साथ एक आवाज़ में कह सकते हैं, “अबकी बार नहीं।” इस बार हम ढहते स्कूलों की चर्चा करना चाहते हैं जो भविष्य छीन रहे हैं काले बच्चों का, गोरे बच्चों का, एशियाई बच्चों का और हिस्पानिक (लैटिन अमेरिकी मूल के) बच्चों का और मूल अमेरिकी (रेड इंडियन) बच्चों का। इस बार हम उस खब्तीपने को खारिज करना चाहते हैं जो कहता है कि ये बच्चे पढ़ नहीं सकते; और वो बच्चे जो हम जैसा नहीं दिखते, वे किसी और की समस्या हैं। अमेरिका के बच्चे कोई वो बच्चे नहीं हैं। वे हमारे बच्चे हैं और हम उन्हें 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था में पीछे नहीं रहने देंगे।

इस बार हम बात करना चाहते हैं कि अस्पतालों के इमरजेंसी वार्ड में किस तरह लाइन से गोरे, काले और हिस्पानिक लोग भरे रहते हैं जिनके पास हेल्थकेयर की सुविधा नहीं है; जिनके पास वाशिंग्टन की सत्ता पर असर डालने के लिए किसी लॉबी की ताकत नहीं है। लेकिन हम साथ आ जाएं तो उनकी आवाज़ बन सकते हैं। इस बार हम बंद पड़ी उन मिलों की बात करना चाहते हैं जिसने कभी हर जाति के पुरुषों और महिलाओं को खूबसूरत ज़िंदगी दी थी। हम उन बिकाऊ घरों की बात करना चाहते हैं जो हर जाति, धर्म और हर किस्म के पेशे के अमेरिकियों का आशियाना हुआ करते थे। इस बार हम इस हकीकत के बारे में बात करना चाहते हैं कि असली समस्या यह नहीं है कि वह शख्स जो आप जैसा नहीं दिखता, आपका काम छीन सकता है। असली समस्या यह है कि जिस कॉरपोरेशन में आप काम करते हैं, वह महज मुनाफे के लिए इसे विदेश ले जाना चाहता है।

इस बार हम हर रंग व जाति के पुरुषों और महिलाओं के बारे में बात करना चाहते हैं जो एक ही गौरवपूर्ण झंडे के नीचे साथ-साथ जीते हैं, साथ-साथ लड़ते हैं, साथ-साथ खून बहाते हैं। हम बात करना चाहते हैं कि उन लोगों को ऐसे युद्ध से कैसे वापस घर लाया जाए जो कभी लड़ा ही नहीं जाना चाहिए था। हम बात करना चाहते हैं कि हम उनकी और उनके परिवारों की देखभाल करके और उनका अर्जित देय उनको अदा करके कैसे अपनी देशभक्ति जतला सकते हैं।...
(दोनों ही तस्वीरों में ओबामा अपनी मां के साथ हैं। एक में बालक, दूसरे में किशोर)

Friday, 21 March, 2008

होली गांवों का कार्निवाल थी, अब शहरी त्यौहार है

कल सोचा था कि आज भूमि के राष्ट्रीयकरण के भारी-भरकम विषय की थाह लगाऊंगा, लेकिन आज लिखने बैठा तो लगा कि होली के माहौल में चट्टान से टकराना वाजिब नहीं होगा। जुबान से तो आप सभी को होली मुबारक कह रहा हूं, लेकिन जेहन में सालों-साल की छवियां उसी तरह सिकुड़ कर घनी हो गई हैं, जैसे भांग के नशे में दूरियों और समय के फासले सिमट जाया करते हैं। होली से जुड़ी पुरानी छवियां बिना सांकल बजाए दाखिल हो रही हैं और माथे में धम-धम करने लगी हैं।

गांव के बाहर होलिका सजाई जा चुकी है। खर-पतवार और गन्ने की पत्तियों से लेकर सूखे पेड़ की डालियां तक उसमें डाल दी गई होती हैं। शाम होते-होते हर घर के आंगन में बच्चों को उबटन (पिसे हुए सरसों का लेप) लगाकर उसका चूरा इकट्ठा कर लिया जाता है। चूरे में थोड़ा पानी और गोबर मिलाकर टिकिया जैसी बना ली जाती हैं। फिर उनके बीच अलसी के पौधों के तने डालकर लड़ी जैसी बना ली जाती है। बड़ों के साथ बच्चे भी मुकर्रर वक्त पर होलिया दहन के लिए जत्थे बनाकर पहुंचते हैं।

गांव का कोई निर्वंश (निरबसिया, अविवाहित अधेड़) आदमी या पंडित होलिका के फेरे लगाकर आग लगाता है। फिर शुरू होता है गालियों का दौर, जिन्हें कबीर या कबीरा कहते थे। अलसी के पौधे समेत हम लोग उबटन के चूरे और गोबर की टिकियों की लड़ी होलिका में फेंक देते थे। बाद में होलिका की आग शांत होने पर सभी कोई न कोई लड़ी लेकर घर लौटते थे, जो अगली होली तक घर के किसी आले या छत के किसी कोने में पड़ी रहती थी।

अगले दिन बड़ों की हिदायत रहती कि दोपहर तक घर से बाहर नहीं निकलना है क्योंकि उस वक्त कहीं से नाली या पंडोह का कीचड़ फेंका जा सकता था। दोपहर के बाद रंगों की बाल्टियां भर-भर के नौजवानों के जत्थे निकल पड़ते। हर घर के बाहर रुकते। फलाने की मां, फलाने की भौजी के नाम से गालियां लय-ताल में बोली जातीं और ऐसे-ऐसे प्रतीक कि लगता भूचाल आ गया हो। हर दरवाज़ें पर सूखे मेवे के साथ गुझिया, मालपूआ वगैरह रखा रहता है, जिसे चखकर जत्था आगे बढ़ जाता। जत्थे में और लोग जुड़ जाते। धीरे-धीरे रंगों की जगह अबीर-गुलाल ले लेता। शाम ढलते-ढलते कम से कम दो-तीन ठिकानों पर फगुआ गाया जाता। भांग और ठंडई का खास इंतज़ाम होता। गाना-बजाना कम से कम 9 बजे रात तक चलता। फिर सभी अपने-अपने घर। अगला दिन होली की खुमारी उतारने में चला जाता।

साल बीतते गए। होली में गालियां कम होती गईं। एक बार एक जत्थे के लोग काकी को गालियां सुना रहे थे तो फौजी काका ने कट्टा निकाल लिया और चला दी गोली। मौके पर ही एक की मौत हो गई। चार घायल हो गए। फिर तो होली पर दुश्मनी के ऐसे विस्फोट की वारदातें बढ़ती गईं। अब तो बताते हैं कि गांव में होली पर मातम-सा माहौल रहता है। जिनकी औकात है वो लोग अब भी गुझिया और मालपूआ बनाकर खा लेते हैं। बच्चे अबीर-गुलाल लगा लेते हैं। लेकिन रंग सूख चुके हैं। कीचड़ अब नालियों और पंडोहों में ही सड़ता रहता है। एक और बदलाव हुआ है कि पहले दलित समुदाय होली के जश्न से बाहर दक्खिन पट्टी में ही शांत बैठा रहता था। अब वहां भी होली मनाई जाती है। कुछ हद तक गाली-गलौच और मारपीट वहां भी होती है।

आज मुंबई में बैठे-बैठे मुझे लगता है कि गांवों में पहले होली का त्यौहार विदेशों के कार्निवाल की तरह हुआ करता था, जिसमें दबे हुए जज्बात और कुंठाएं फूटकर बाहर निकलती थीं। रबी की फसल कटकर घर आने के बाद कई महीनों का सुकून रहता था और इस सुकून में साल भर में मन और तन पर जमा हुई गंदगी बाहर निकाल दी जाती थी। लेकिन अब होली ही नहीं, दीवाली जैसे सामूहिक त्योहारों ने कस्बों, शहरों और महानगरों का रुख कर लिया है। आज मैंने टीवी पर देखा कि आशाराम बापू कहीं सूरत में मंच से मशीनी पिचकारी के जरिए दसियों हज़ार की भीड़ पर रंग-गुलाल बिखेर रहे थे। चैनलों पर होली के रंग बिखरे हैं। बाज़ार और बाबाओं ने होली को हथिया लिया है।

जो होली कभी हमारा देशी कार्निवाल हुआ करती था, वह अब शहर क