विषय तय करने की प्रक्रिया के दौरान मैं और विकास (लाल गोले में)कोई तो कम्युनिकशन गैप रह गया होगा कि मुंबई के हिंदी ब्लॉगर्स इसमें नहीं आ पाए। खैर, दिलचस्प बात यह रही कि जब पंकज तिवारी ने अपने विषय के बारे में बताया कि वे हिंदी ब्लॉगिंग की दशा और दिशा के बारे में बोलेंगे तो आयोजन में आए लोगों ने ऐसी तालियां बजाईं जैसी किसी के लिए नहीं बजी थीं। 500 से ज्यादा लोगों में कुछ लोग शुद्ध तकनीक या मार्केटिंग से जुड़े थे तो तकरीबन एक तिहाई सीधे-सीधे ब्लॉगिंग से ताल्लुक रखते थे। लोगों को तीन हिस्सों में बांट दिया गया और फिर तीन हॉल में चले गए लोग आपसी अनुभवों को आपस में बांटने के लिए।
जाहिर है मैं, विकास, पंकज और साकेत ब्लॉगिंग वाले हॉल में जाकर डट गए। ब्लॉग से कमाई से लेकर उनको लोकप्रिय बनाने की ऐसी-ऐसी तकनीकी जुगत कि माथा भन्ना जाए!! अंग्रेज़ी के लोग थे तो सब कुछ अंग्रेज़ीमय था। फिर भी बहुत सारी चौंकानेवाली बातें सामने आईं। जैसे, अपनी 200 वेबसाइट्स (इसमें से 10% ब्लॉग) से फरवरी में 53,500 डॉलर (21.40 लाख रुपए) कमा चुके और मार्च में 60,000 डॉलर (24 लाख रुपए) की अनुमानित कमाई करनेवाले पुणे के ब्लॉगर करमवीर ने डंके की चोट पर बताया कि उन्हें कमाई और ट्रैफिक से मतलब है, बाकी किसी चीज़ से नहीं। तो, कैंप के आयोजकों में शुमार तरुण चंदेल ने कहा कि उनके लिए काम के दस पाठक ही पर्याप्त हैं, दस हज़ार के जुगाड़ू ट्रैफिक की तुलना में। कुछ ने बताया कि ब्लॉगिंग ने दोस्तों का दायरा पेशे और परिवार से बाहर तक फैला दिया है तो कुछ ने कहा कि आज ब्लॉगिंग कैसे एक emotional safety net बन गई है।
लंच के बाद पंकज तिवारी ने अपनी बात रोचक अंदाज़ में रखी। सभी ने गौर से सुना। लेकिन बात उठी कि हिंदी ही नहीं, देश की कन्नड़, तमिल, तेलुगू, मलयालम जैसी 18 क्षेत्रीय भाषाओं में लिखकर हम केवल एक भाषा तक सिमट जाते हैं, जबकि अंग्रेज़ी में लिखकर हम देश में सभी भाषाएं बोलनेवालों तक पहुंच सकते हैं। मुझे लगा कि यह देश का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि संविधान की धारा 343 के तहत देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी को केंद्र सरकार की राजकीय भाषा मानने के बावजूद अब भी अंग्रेज़ी का इतना प्रभुत्व है। इसमें दोष हमारा-आपका या इनका-उनका नहीं है। दोष उनका है जो आज़ादी की लड़ाई के दौरान और उसके बाद भी विकास की बाध्यकारी औपनिवेशिक संरचना से हमें बाहर नहीं निकाल सके।
वैसे तो बारकैम्प एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन है और इसके तार दूर-दूर तक जुड़े हैं। Flickr पर barcamp की फोटो खोजिए तो एक ही जैसे logo के साथ आपको सेंट्रल एशिया से लेकर मायामी तक की तस्वीरें मिल जाएंगी। लेकिन कल के आयोजन में आए किसी भी शख्स में हिंदी को हीन मानने या हिकारत की निगाह से देखने की सोच लेशमात्र भी नहीं नज़र आई। लेकिन इतना ज़रूर समझ में आया कि भारत में अंग्रेज़ी ब्लॉगरों की अलग दुनिया है। उनकी दुनिया और हमारी दुनिया में चंद अमूर्त भावनाओं और इच्छाओं के अलावा शायद कुछ भी कॉमन नहीं है। हम दोनों mutually disjoint entities हैं। अंग्रेज़ी वाले हिंदी ब्लॉगर को किसी संत और त्यागी-महात्मा जैसा सम्मान ज़रूर दे सकते हैं, लेकिन उसके साथ उनका संवाद संभव नहीं है। बीसवें माले का आदमी दूसरे माले के आदमी से बात करेगा भी तो कैसे। वैसे, शायद कुछ हिंदवालों ने भी हिंदी के उद्धार का एनजीओ-मार्ग अपना रखा है। मुझे नहीं लगता कि इस ऑफलाइन-ऑनलाइन फेनोमेना से हम हिंदी वालों का कोई स्थाई भला होनेवाला है।

कमेंट में anonymous के कमेंट रोकने का तरीका बड़ा आसान है। आप लॉग-इन करने के बाद सेटिंग्स में जाइए, वहां से कमेंट्स में। इसमें दूसरे नंबर पर दिखेगा – Who can comment? आप इसमें User with Google Accounts या Registered Users – includes OpenID में से कोई एक विकल्प चुन सकते हैं। Registered Users – includes OpenID का विकल्प चुनने से फायदा यह होगा कि वर्डप्रेस, टाइपपैड, एओएल पर खाते वाले लोग भी कमेंट कर पाएंगे। दोनों में से एक विकल्प चुनने के बाद save settings कर दीजिए तो फर्जी नाम से की जानेवाली टिप्पणियों पर रोक लग जाएगी। ब्लॉगर पर यह सुविधा है। वर्डप्रेस वाले कैसे कर सकते है, ये मुझे नहीं पता।








अगर आप मुंबई या महाराष्ट्र के किसी भी शहर में नौकरी करते होंगे तो आपकी तनख्वाह से हर महीने 200 रुपए प्रोफेशनल टैक्स कटता होगा। फरवरी में यह रकम 300 रुपए हो जाती है। इस तरह महाराष्ट्र में नौकरी करनेवाले हर शख्स को साल भर में 2500 रुपए का टैक्स देना पड़ता है। लेकिन क्या आपको पता है कि इस टैक्स से कौन-सा काम किया जाता रहा है? हो सकता है आपको पता हो, लेकिन कुछ महीने पहले तक मुझे नहीं पता था।


नेट पर बैठ जाओ तो पूरा चेन रिएक्शन शुरू हो जाता है। यहां से वहां, वहां से वहां। कल दिन में नेट पर ऐसी ही तफरी कर रहा था कि मुंबई के तीन नए ब्लॉगरों से पाला पड़ गया। और, यकीन मानिए, इनका लिखा मैंने पढ़ा तो कॉम्प्लेक्स से भर गया। मुझे लगा कि साढ़े पांच सौ किलो का जो वजन उठाने का मंसूबा मैं बांध रहा था, उसे तो ये लोग अभी से बड़ी आसानी से उठा रहे हैं। मैं पहले पहुंचा 



कविगण माफ करेंगे। उनके मोहल्ले पर कंकड़ फेंक रहा हूं। इधर दो कवियों ने भिखारियों पर कविताएं लिखीं। एक ने 



वैसे अमरेश की इस किताब की समीक्षा
पहले कृषि मंत्री शरद पवार ने सारे देश के 


इन मेढकों में मैं भी शुमार हूं। शायद आप भी हों, गारंटी के साथ नहीं कह सकता। इसीलिए तीन हज़ार हिंदी ब्लॉगरों, ज्यादा से ज्यादा तीन लाख पाठकों और एनजीओ, वाम व अतिवाम संगठनों में कार्यरत ज्यादा से ज्यादा 27 लाख जागरूक लोगों को हटाकर बाकियों की बात कर रहा हूं। जी हां, मैं यहां हिंदुस्तानी मध्यवर्ग के तकरीबन तीस करोड़ लोगों की बात कर रहा हूं जो अपने तय दायरे में हाथ-पैर मारते हुए एक साथ चिंतित और मस्त बने रहते हैं। दोतरफा तनावों में नसें शिथिल हो चुकी होती हैं तो अक्सर ऑस्ट्रेलिया पर भारत की शानदार जीत जैसा राष्ट्रीय उन्माद इनके लिए ज़रूरी हो जाता है। बाकी सब कुछ तो चलता ही रहता है।

