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कुरान पर हाथ रखकर झूठी गवाही

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हमारे धर्म-ग्रंथ सत्ता में बैठे लोगों के लिए किस तरह मजाक बन गए हैं, इसका सबूत है सरबजीत के मामले के मुख्य गवाह शौकत सलीम की ये स्वीकारोक्ति कि, “सरकारी वकील ने मुझे बताया कि इस आदमी ने विस्फोट किए और वह दोषी है। वकील ने मुझसे कहा कि मुझे भी ऐसा ही कहना है और मैंने कह दिया।” शौकत सलीम लाहौर का रहनेवाला वो शख्स है जिसके पिता और एक अन्य रिश्तेदार उस विस्फोट में मारे गए थे जिसका दोष सरबजीत पर लगाया गया है। एजेंसी की खबर के मुताबिक सलीम ने एक भारतीय टीवी चैनल से बातचीत में कहा है कि उस पर सरबजीत के खिलाफ गवाही देने के लिए दबाव बनाया गया था और अदालत में सरबजीत के खिलाफ बोलने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं था। शौकत सलीम का कहना है कि उसने अदालत में पेशी से पहले न तो सरबजीत को कभी देखा था और न ही उसे यह भरोसा था कि वह विस्फोटों में शामिल हो सकता है। शौकत सलीम ने यहां तक कहा कि पाकिस्तान में तमाम ताकतवर लोग तक पुलिस से डरे रहते हैं। सलीम ने बताया कि जब उसको अदालत में लाया गया तो उसने न्यायाधीश को बताया कि सरबजीत ने ही विस्फोट किए थे। सलीम के मुताबिक न्यायाधीश ने उसे सुना और जाने दिया। सलीम का...

जिंदगी एक मचमच है, मचमच!!!

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इस दुनिया में मेरा मकसद क्या है? यह सवाल अभय के ही नहीं , अलग-अलग समय पर बहुतों के, हम सभी के मन में आता होगा। इसी सवाल का समानार्थी सवाल है कि मेरे जीवन का मकसद क्या है? मैं इसके जवाब को लेकर गुन ही रहा था कि कल स्टेशन से घर आते वक्त ऑटो-रिक्शा में गजब का वाक्य सुनने को मिला। जिंदगी मचमच है, मचमच है। ऑटो में पीछे तीन और आगे ड्राइवर के बगल में बैठी एक और सवारी। ड्राइवर की जान-पहचान का लगता था। दोनों ज्यादातर मराठी में बात कर रहे थे। लेकिन बीच-बीच में हिंदी भी बोल रहे थे, जैसे हम लोग हिंदी में बातचीत के दौरान अंग्रेज़ी में बोल लिया करते हैं। पूछा – रिक्शे ने तो तेरी जिंदगी बना दी, क्यों? बना दी कहां, ज़िंदगी बिगाड़ दी। अब मैं कभी रिक्शे को हाथ नहीं लगाऊंगा। ऊपरवाले ने वेल्डिंग मशीन पर लगा दिया है, वही अपुन का सब कुछ है...माई-बाप। फिर मराठी में थोड़ी गिटिर-सिटर। अचानक वेल्डिंग मशीन वाला फक्कड़ बोल पड़ा – ज़िंदगी मचमच है, मचमच। एक-दो वाक्य मराठी के। फिर ड्राइवर बोला – अभी तेरा खून गरम है, इसलिए ऐसा बोलता है। वो बोला – ठडे खून से अपुन को जीने का नहीं। जिस दिन खून ठंडा होगा, उसी दिन किसी पे...

लिखें तो ऐसा कि दूसरे लोग जुड़ते चले जाएं

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वैसे तो टेक्नोराती की अथॉरिटी का हम हिंदी ब्लॉगरों के लिए फिलहाल कोई विशेष मतलब नहीं है। फिर भी आपकी औकात ज्यादा आंकी जाए तो भला किसको अच्छा नहीं लगता। लेकिन इधर हफ्ते-दो हफ्ते से टेक्नोराती की अथॉरिटी में तेज़ गिरावट आ रही है। कभी 92 तक जा चुकी मेरी अथॉरिटी घटते-घटते अब 74 पर आ गई है और हो सकता है जब आप यह पोस्ट पढ़ रहे हों तब तक वह 1-2 सीढ़ी और नीचे गिर गई हो। टेक्नोराती के सहायता फोरम में झांककर देखा तो कइयों के साथ यही समस्या नज़र आई। मुझे लगा कि शिकायत वगैरह करने का कोई फायदा नहीं है तो अथॉरिटी की मूल धारणा ही समझ ली जाए। टेक्नोराती अथॉरिटी उन ब्लॉगों की संख्या है जिन्होंने पिछले छह महीने (180 दिन) में आपके ब्लॉग का लिंक दिया है, चाहे ब्लॉगरोल में या किसी पोस्ट में। जितने ज्यादा से ज्यादा लोग आपको लिंक करेंगे, आपके ब्लॉग की अथॉरिटी उतनी ही बढ़ती जाएगी। इसमें एक बात और गौर करने लायक है कि 180 दिन होते ही अथॉरिटी में पिछले लिंक्स की अहमियत शून्य हो जाती है। साथ ही कोई ब्लॉग अगर आपको 180 दिन में सौ बार भी लिंक करे तब भी टेक्नोराती अथॉरिटी में उसका योगदान केवल एक का रहेगा। मतलब साफ है...

घट रहे हैं हिंदी न्यूज़ चैनलों के दर्शक

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हिदी न्यूज़ चैनलों में खली-बली, सांप-छछूंदर, राम-रावण, शिव-पार्वती और सास-बहू से लेकर भूत-प्रेत का जो नाटक चलता है, जो अपराध और सनसनी फैलाई जाती है, जिस तरह अंधविश्वासों को सच बताया जाता है, उसके पीछे का तर्क है कि बाज़ार में खड़े हैं तो बिकाऊ नहीं होंगे तो कैसे काम चलेगा। टीआरपी के लिए भागमभाग लाज़िमी है। लेकिन क्या आपको पता है कि टेलिविजन के कुल दर्शकों में हिंदी न्यूज के दर्शक कितने हैं? इस साल के पहले हफ्ते (30 दिसंबर 2007 से 5 जनवरी 2008) में यह आंकड़ा था 5.1 फीसदी। यानी हिंदी न्यूज़ चैनलों को 100 में से केवल पांच दर्शक मिले थे। चौंकानेवाली बात यह है कि साल के 15वें हफ्ते (8 से 12 अप्रैल 2008) में यह आंकड़ा घटकर 4 फीसदी रह गया है। ज़ाहिर है कि गुजरे साढ़े तीन महीनों में हिंदी चैनलों ने अपने 20 फीसदी दर्शक गवां दिए हैं। टैम मीडिया रिसर्च के मुताबिक इस समय दर्शकों में सबसे बड़ा हिस्सा हिंदी के मनोरंजन चैनलों का है। इन्हें लगभग 22 फीसदी दर्शक देखते हैं। अब चूंकि ज्यादातर न्यूज़ चैनल इनफोटेनमेंट चैनल होते जा रहे हैं, इसलिए शायद दर्शकों को लगने लगा है कि जब इंटरटेनमेंट ही देखना है तो ...

ठाकुर तो पिछड़े नहीं, फिर पिछड़ों के नेता क्यों हैं?

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आज तक कभी भी, मतलब कभी भी, अपनी जाति को लेकर नहीं सोचा। हो सकता है सब कुछ पका-पकाया मिलता रहा। मान-सम्मान, आगे बढ़ने के मौके। कभी जातिगत उत्पीड़न नहीं झेला तो कभी जाति पर अलग से सोचने की ज़रूरत ही नहीं महसूस हुई। लेकिन इधर देख रहा हूं तो कुछ लोग जाति को लेकर बराबर सुगबुग-सुगबुग करते जा रहे हैं। हालांकि यह बात तो मेरे दिमाग में दो हफ्ते पहले ओबीसी कोटे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही आ गई थी और मैं पहली बार ठाकुर जाति पर सोचने लगा। सोचने लगा कि नौकरियों में पिछड़ों के लिए 27 फीसदी आरक्षण एक ठाकुर ने लागू करवाया, जिसका नाम है विश्वनाथ प्रताप सिंह। अब उच्च शिक्षा में 27 फीसदी आरक्षण लागू हुआ तो एक दूसरे ठाकुर, अर्जुन सिंह की हठ के चलते। मज़े की बात है कि वी.पी. और अर्जुन सिंह दोनों ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोडक्ट हैं। ऐसा क्यों है कि सामाजिक न्याय के इस ज़रूरी अभियान के नेता पिछड़े या दलित तबके से आए लालू यादव, मुलायम यादव, शरद यादव या रामबिलास पासवान नहीं, बल्कि अगड़ों में भी रजवाड़ों से आए विश्वनाथ प्रताप सिंह और अर्जुन सिंह बने? जो अपनी जाति के नेता नहीं बन सके, वे दूसरी जाति...

अनिश्चितता अनंत है तो डरना क्या? बिंदास जीने का

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दुनिया में दो तरह के लोग हैं। एक वो जो मूर्खों की तरह कोई परवाह किए बगैर गिरते-पड़ते बिंदास जिए जाते हैं। ऐसे मूर्खों की श्रेणी में मुझ जैसे बहुतेरे लोग आते हैं। दूसरे वो लोग हैं जो मूर्खों की तरह डर-डरकर ज़िंदगी जीते हैं; हर छोटे-बड़े फैसले से पहले जितनी भी उल्टी बातें हो सकती है, सब सोच डालते हैं। फिर या तो घबराकर चलने ही इनकार कर देते हैं या चलते भी हैं तो सावधानियों का क्विंटल भर का पिटारा कंधे पर लाद लेते हैं, अविश्वास का काला कंटोप दिमाग की आंखों पर चढ़ा लेते हैं। दिगम्बर जैनियों की तरह मुंह पर कपड़ा बांध लेते हैं। हर कदम फूंक-फूंककर रखते हैं। मन को हर आकस्मिकता की आशंका से भर लेते हैं। लेकिन क्या ऐसा संभव है कि हम आगे जो होनेवाला है, उसे प्रभावित करनेवाले सारे कारकों को पहले से जान लें, उनके असर का हिसाब-किताब लगा लें? शायद नहीं क्योंकि ऐसे बहुत से न दिखनेवाले कारक अचानक पैदा हो जाते हैं, जिनकी कल्पना तक हमने नहीं की होती है। हम सब कुछ कभी नहीं जान सकते। अनिश्चितता का पहलू हमेशा बना रहता है। जिन अर्जित अनुभवों, उनसे बनी मानव चेतना और दिमाग से हम बाहर की चीजों को जानना चाहते हैं,...

महीने में 25000 तो क्रीमीलेयर, 50000 तो गरीब!!!

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अजीब विभ्रम की स्थिति है। मानव संसाधन मंत्रालय ने कल रात घोषित कर दिया कि आईआईएम और आईआईटी जैसे तमाम केंद्रीय शिक्षण संस्थानों को इसी साल शुरू हो रहे सत्र से 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण लागू करना होगा। यह पहले से अनुसूचित जाति के लिए लागू 15 फीसदी और अनुसूचित जनजाति के लिए लागू 7.5 फीसदी आरक्षण के ऊपर है। इस तरह इन संस्थानों की 49.5 फीसदी सीटें अब कमज़ोर और पिछड़ी जातियों के छात्रों के लिए आरक्षित हो गई हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर को इस आरक्षण से बाहर कर दिया है, जिसके मुताबिक साल में 2.5 लाख रुपए से ज्यादा कमानेवाले परिवारों के बच्चों को यह सुविधा नहीं मिलेगी। यानी अगर किसी परिवार की मासिक आमदनी 25,000 रुपए है तो पिछड़ी जाति का होने के बावजूद उसके बच्चे को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। दूसरी तरफ देश के छह के छह आईआईएम ने अपने पीजी कोर्स की फीस 25 से 175 फीसदी बढ़ा दी है। सबसे ज्यादा फीस आईआईएम अहमदाबाद ने बढ़ाई है। जहां पहले दो साल के इस कोर्स की फीस 4.30 लाख रुपए थी, वहीं अब यह 11.50 लाख रुपए हो गई है। आप ही बताइए कि देश में कितने परिवार हैं जो अपने बच्चे की पढ़ाई...