Thursday 12 April 2007

कौन है ये भारत भाग्यविधाता?

इधर इनफोसिस के चीफ मेंटर नारायण मूर्ति और भूतपूर्व मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर की राष्ट्रभक्ति पर सवाल उठाए जा रहे हैं। मूर्ति पर आरोप है कि उन्होंने एक समारोह में जानबूझकर राष्ट्रगान की केवल धुन बजने दी, जबकि सचिन पर आरोप है कि वेस्ट इंडीज में दौरे के दौरान उन्होंने अपने जन्मदिन पर ऐसा केक काटा, जो तिरंगे की शक्ल में बनाया गया था। नारायण मूर्ति और सचिन दोनों ही सफाई दे चुके हैं कि उनका मसकद कहीं से भी किसी की राष्ट्रीय भावना को चोट पहुंचाना नहीं था। लेकिन ये मुद्दा उठा तो मेरे जेहन में एक पुराना सवाल कौंध गया। वो यह कि जनगण अधिनायक जय हे...में भारत का भाग्यविधाता कौन है। वो कौन है जिसकी प्रशस्ति विंध्य हिमाचल यमुना गंगा और सागर की लहरें गाती हैं और जिससे ये सभी आशीष मांगते हैं।
इतिहास साक्षी है कि ये गान 1911 में इंडियन नेशनल कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में सबसे पहले गाया गया था। एक दिन बाद ही गुलाम 'भारत के भाग्यविधाता' किंग जॉर्ज पंचम भारत आए थे। इसलिए कुछ लोग कहने लगे कि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे जॉर्ज पंचम के स्वागत में लिखा था। जॉर्ज पंचम के स्वागत में ही उसी साल मुंबई का गेटवे ऑफ इंडिया भी बनाया गया था। हालांकि बाद में टैगोर ने सफाई दी कि जॉर्ज पंचम की सेवा में लगे एक अधिकारी (जो गुरु टैगोर का मित्र भी था) ने उनसे इस तरह का स्वागत गीत लिखने को कहा था, लेकिन उनके लिखे गीत में भाग्य विधाता का अर्थ ईश्वर से है जो भारत के सामूहिक मानस का अधिनायक है और कोई भी जॉर्ज पंचम या षष्टम उसकी जगह नहीं ले सकता।
इसके बाद विवाद को सुलझा हुआ मान लिया गया। लेकिन जहां बच्चे प्रार्थना गाते हों कि जिस जाति धर्म में जन्म लिया, बलिदान उसी पर हो जाएं, जहां अधिकांश लोग अपनी जातिगत या सांस्कृतिक पहचान से आबद्ध हों, वहां कितने लोग हैं जो सचमुच राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ने के लिए खाली हैं? शायद इंडिया के करीब तीस करोड़ लोगों के लिए इस अस्मिता की जरूरत है। यकीनन इन तीस करोड़ लोगों में से भी बहुत से लोग अपनी पुरातन जड़ों की तरफ लौटने की चाहत रखते हैं क्योंकि समृद्धि ने उन्हें पहचान के लिए बेचैन कर दिया है। बाकी 70 करोड़ से ज्यादा लोगों के लिए ये अस्मिता सीमा पर बलिदान हो जाने की भावना भर है। यहीं पर मुझे काफी पहले सुना गया एक शेर याद आता है। मुलाहिजा फरमाइए :
दुर्घटना में मरे शख्स की कब्र पर लिख दिया।
वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हुए।।

2 comments:

संजय बेंगाणी said...

शेर मजेदार है.
गीत हमारे भाग्यविधाता अंग्रेज राजा के लिए ही लिखा गया था.
क्या वजह की जन-गण-मन में वो बात नहीं जो वन्दे मातरम में है.

Shrish said...

बड़े-बूड़े तो यही बताते हैं कि गीत हमारे भाग्यविधाता अंग्रेज राजा के लिए ही लिखा गया था। लेकिन जिस मर्जी के लिए लिखा गया हो, अब यह हमारा राष्ट्रगान है और हमें इसका सम्मान करना ही चाहिए।

हाँ संजय भाई ने यह बात सही कही कि जन-गण-मन में वो बात नहीं जो वन्दे मातरम में है।