Saturday 24 January 2009

दशानन के चेहरे चिढ़ते बहुत हैं

रावण की लंका सोने की थी। बहुत सारा निवेश आया होगा तभी तो बनी होगी सोने की लंका। उसके हित-मित्र, चाटुकार बड़े मायावी थे। स्वर्ण-मृग बनकर अपने यार के लिए वनवासियों की बीवियों को रिझाकर छल से उठा लिया करते थे। दशानन चिढ़ता बहुत था। निंदा तो छोड़िए, अपनी जरा-सा आलोचना भी बरदाश्त नहीं कर पाता था। इसी बात पर अपने भाई विभीषण को निकाल फेंका। पौराणिक आख्यान गवाह हैं कि रावण का सर्वनाश हो गया। विभीषण को लंका का राजपाट मिला। लंका सोने की ही रही। लेकिन उस सोने पर राजा का ही नहीं, प्रजा का भी हक हो गया। लंका में रामराज्य आ गया।

एडोल्फ हिटलर, रहनेवाला ऑस्ट्रिया का। आगे नाथ, न पीछे पगहा। अंदर से बड़ा ही भीरु किस्म का शख्स। अपने अलावा और किसी को कुछ नहीं समझता था। मंच पर ऐसा बमकता था कि लगता था कि धरती और आकाश के बीच उसके अलावा कुछ है ही नहीं। सत्ता लोलुप और शातिर इतना कि पराए मुल्क में जाकर राष्ट्रवाद का नारा दे दिया। यहूदियों को निशाना बनाया। उनके खिलाफ नफरत भड़का कर बाकियों को अपने पीछे लगा लिया। जर्मन लोग उसके दीवाने हो गए। लेकिन जर्मनी के वही लोग आज उससे बेइंतिहा नफरत करते हैं।

वहां किसी को हिटलर कह दो तो वह आपके खिलाफ मानहानि का मुकदमा ठोंक देगा। मुट्ठी भर सिरफिरों को छोड़ दें तो जर्मनी का बच्चा-बच्चा हिटलर से नफरत करता है। अपने इतिहास से हिटलर को मिटाने के लिए अभी साल भर पहले उस नगरपालिका ने पुराने रजिस्टर से हिटलर का नाम काट दिया जिसने इस ऑस्ट्रिया-वासी को जर्मन नागरिकता दी थी। हिटलर का भी सबसे बड़ा दोष यही था कि वह चिढ़ता बहुत था। अपनी किसी भी तरह की आलोचना को बरदाश्त नहीं कर पाता था। इतिहास गवाह है कि एक सुनसान बंकर में उसका मृत शरीर पाया गया।

कहने का मंतव्य यह है कि आलोचना न सह पाना, मामूली बात पर चिढ़ जाना बहुत बड़ा दुर्गुण है। इतना बड़ा कि आपका सत्यानाश तक कर सकता है। अपने यहां राजा जनक को सबसे बड़ा योगी इसीलिए माना गया है कि वे सब कुछ के बीच रहते हुए भी असंपृक्त रहते थे। राग-द्वेष, वैर-प्रीति, यश-अपयश से ऊपर थे। गीता में योगिराज कृष्ण ने स्थितिप्रज्ञता का बखान किया है। तो, अपने पंगेबाज टाइप बंधुओं से मैं विनती करना चाहता हूं कि दशानन के चेहरे मत बनो। यह मत साबित करो कि उसमें और तुम में नाभिनाल संबंध है क्योंकि उसकी नाभि को भेदकर कोई भी राम उसका विनाश कर सकता है। तुम और हम आम नागरिक हैं भाई जो अपने देश, अपनी माटी और अपनी परंपरा से बेपनाह मोहब्बत करते हैं। हम उस मायावी का पाप अपने ऊपर क्यों लें?

आखिर में एक बात और। नाम पंगेबाज रखा है तो उसकी मर्यादा का पालन करो। पंगेबाज नाम का मतलब है कि वह बड़े संयत भाव से, शांत मन से पंगा लेगा। चिढ़ेगा नहीं। अरे, मेरी बात का जवाब देना ही था तो आलोक नंदन की तरह देते। चिढ़ जाने से बुद्धि और विवेक का नाश हो जाता है। बंधुवर, मर्यादा पुरुषोत्तम राम की परंपरा को अपनाओ। दशानन का दसवां चेहरा मत बनो।

14 comments:

संजय बेंगाणी said...

आपकी सदगुण वाली पोस्ट जिसे लुहार का हथौड़ा भी कहा गया था, क्या वह खीज में लिखी गई नहीं थी? कम से कम मुझे ऐसा लगा.

मेरी पोस्ट का असली हेतु सम्भावित प्र.म. की असलियत लिखना था, किसी का स्तुतिगान करना नहीं था. मगर मोदी का नाम आते ही होश खो देना समझ में नहीं आता.

रही बात रावण की तो क्षमा करें, रावण की तुलना नमो से करना करई सही नहीं है. न व व्यवस्थाएं है, न वह सनय है. रावण उच्च कोटि का ज्ञानी, भक्त, संगीतज्ञ, योद्धा था. वह हारता नहीं तो इतिहास में अलग तरह से जगह पाता. सही है फिलहाल तो वह बुराई का प्रतिक है.

लालू, मायावती, पासवान, मुलायम, ज्योतिबसु, भट्टाचार्य... इन जैसों ने तो राम राज्य ला दिया है :) हमें हमारा रावण मुबारक.

Pak Hindustani said...

परम आदरणीय बंधुवर

आपका लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा, आपने बहुत सही परिप्रेक्ष्य में रावण, हिटलर आदि का नाम लिया, व खत्म भी एकदम सही परिप्रेक्ष्य में हिटलर की मौत का उल्लेख करके किया. इसी मौके का फायदा उठाकर निम्न बातों का एकदम बिना चिढ़े जिक्र करना चाहूंगा.

1. व्लादिमीर लेनिन सिफलिस से मरे. (वो कैसे होती है, कृपया पता करें).

मतलब मौत अगर किसी के चरित्र का निर्णायक हो तो यकीनन हिटलर से बुरी मौत लेनिन को मिली.

आगे गुजरात में निवेश की सोने की लंका से तुलना तो और भी सामयिक है. चलिये इसी पर बात कर लेते हैं.

-- क्या गुजरातियों ने रावण की तरह स्वर्ग आदी राज्यों पर चढ़ाई कर सोना पाया है? अगर ऐसी जानकारी हो तो कृपया बतायें.
-- निवेश जिन लोगों के किया, खुद आकर, अपनी मर्जी से किया, ताकी वो और आगे बढ सकें. ऐसा नहीं हो, तो कृपया बतायें.

बाकी जहां तक चिढ़ने का सवाल है तो श्री जी, आपने किस भावना के वशीभूत होकर अपने लेख की रचना की थी वो किसी से छिपी नहीं है.

आगे भी आशा है आप से ऐसे ही श्रीवचन सुनने को मिलते रहेंगे ताकी आपकी वि़चारधारा, और क्रिया-कलापों से हमारा मनोरंजन हो सके.

हमारी सुबह में हंसी भरने के लिये धन्यवाद.

(आशा है आप इस बिना चिढ़े लिखी गयी टिप्पणी को बिना चिढ़े मोडरेट कर देंगे.)

Gyan Dutt Pandey said...

कौन है दशानन? और इस उथली राजनीति में राम कौन है? कौन है रघुराज?!
शायद सबसे महत्वपूर्ण गुण - बुश जी की तरह जूता डक करना आना चाहिये।
नरेन्द्र के मुखौटों का दशाननीय इम्प्लीकेशन वे बतायें जो पाक-साफ-मुखौटाहीन हैं। कौन हैं वे?

पंगेबाज said...

हे हे हे हे
पर उपदेश कुशल बहुतेरे
हमे पता है सब गुण तेरे

सुमो said...

"हिन्दुस्तानी डायरी वाले भाई, निसंदेह आप गलती पर है
अपनी आलोचना बर्दाश्त न करने सबसे ज्यादा अवगुण वाममार्गियों में हैं, दुनियां के सारे वाममार्गी देशों में जबान पर ताला लटका दिया जाता है और वो सिर्फ वही देखते हैं तो सरकार दिखाती है.
जिस तरह हिटलर का नाम मिटाया जा रहा है उसी तरह लाल चीन से माओ और रूस से स्टालिन के कुकर्मों पर स्याही फेरी जा रही है. हिटलर बुरा था लेकिन उसके असली वारिस कम्युनिष्ट और सेकूलरिये और भी अधिक निष्कृष्ट हैं. रामराज्य, रावण और हिटलर जैसे मिथक और उपमानों से लोग बच्चे बहकाते रहे हैं, सबसे ज्यादा उपमान और मिथक जबान पर तालाजड़ने वाले कम्युनिष्ट और सेकूलरिये करते हैं. आपके बंगाल के क्या हाल है? बुद्ददेव और ज्योति बासु के गुंडो ने क्या क्या नहीं किया? क्या आप एसा गुजरात में होता देख सकते हैं? रामराज्य क्या है भाई? एक पार्टी के गुंडे जहां चाहें वहां लूट पाट मचायें, क्या वही आपका रामराज्य है?
जब आप वाममार्गियों को मुसलमानों को साधना होता है तो राम और सीता को गालियां देते हैं, हिन्दू देवताओं को गरियाते हैं और जब खुद को कमजोर पाते हैं तो रावण की बुराई, राम और रामराज्य की बातें करने लगते हैं, इसे क्या कहें? यहां तक कि जब उपमान चाहिये तो अपने लिये गौ-हत्या की कसमें खाने लगते हैं!
मेरे पिछले कमेन्ट में क्या बुराई थी, उस पर माडरेशन का ताला जड़कर क्यों बैठ गये थे?
चलते चलते सच्ची सच्ची बताना,
मोदी का नाम सुनते ही आपके मुंह से झाग क्यों निकलने लगते हैं, चेहरा लाल क्यों हो जाता है?"

Shiv Kumar Mishra said...

उद्धृत करने के लिए सबके अपने-अपने रावण है. आपके पास शायद एक रावण है. पंगेबाज जी के अनुसार उनके पास ढेर सारे रावण हैं.

सात वर्षों से आप जैसे बहुत सारे लोगों के पास एक ही रावण है. लेकिन इनलोगों की समस्या यह है कि वे इस रावण के बारे लिखकर और बोलकर आँख पर पट्टी बाँध लेते हैं ताकि सामने वाला जब बीस रावण आगे कर दे तो इन्हें दिखाई न दे.

नरेन्द्र मोदी नाम का रावण आपके पास है. वैसे ही संजय बेंगानी जी के पास लू यादव, यावती, योति बसु, द्धदेव भट्टाचार्य, र्जुन सिंह वगैरह हैं. पाक हिन्दुस्तानी के पास लेनिन हैं.

ऐसे में ये रावण को आगे रखकर कितने दिनों तक लड़ाई लड़ी जाती रहेगी?

Alok Nandan said...

इतिहास सत्ता की रखैल है,जिसके हाथ में सत्ता उसी का इतिहास। रावण युद्ध में पराजित होता है और सत्ता पर राम का कब्जा हो जाता है,और इस तरह इतिहास पर भी। इसके बाद रावण को दस मुख वाला राक्षस का अलंकार दिया जाता है और विभिषण को रामभक्त की उपाधि। दुर्योधन की टोली की कहानी भी कुछ यही है। इस टोली का सिर्फ इतना कसूर है कि वह युद्ध हार जाती है। इतिहास पर पांडवो का कब्जा हो जाता है।
एडोल्फ हिटलर के साथ भी यही बात है। सेकेंड वल्ड वार हार जाता है और इतिहास पर एक्सिस पावर का कब्जा हो जाता है। सत्ता पर काबिज लोग वैसे इतिहासकारों को चुनचुन कर खड़े करती है,जो उनके गुणगान में पन्ने काले करे। एडोल्फ हिटलर के समय जर्मनी में ओलंपिक खेल का ओयोजन हुआ था, उसमें देखिये जर्मनी को कितने पदक मिले थे...हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी के विकास की गति का वह मापदंड हो सकता है। आणविक मामलों में भी जर्मनी में उस वक्त तेजी से काम हो रहे थे। उस समय के रिपोर्टों को उलटिये पता चल जाएगा कि इस क्षेत्र में जर्मनी कहां पर खड़ा था। चीन में तुंग ने सांस्कृति क्रांति के नाम पर इतिहास को आग के हवाले कर दिया था और इतिहास की नई किताबों की रचना करवाई। इतिहास को बदलने के लिए सत्ता चाहिये और सत्ता संसद में है, और संसद जनता से जुड़ा हुआ.....नेता राम है या रावण बाद में फैसला हो जाएगा....पहले तो संसद का जादुई अंक चाहिये..लबे समय से जिसके लिये देश की सभी पार्टियां तरस रही हैं और संसद में सरकार बचाने के लिए नोट तक उड़ाये जा रहे हैं।

संजीव कुमार सिन्हा said...

गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी पर आप चाहे जितना कीचड उछालने का षड्यंत्र रचिए, श्री मोदी तो सूर्य की तरह हमेशा चमकते ही रहेंगे। आप नरेंद्र मोदी को जनतंत्र विरोधी करार देते रहिए, क्‍या फर्क पडता हैं, गुजरात की जनता ने दो-दो बार उन्‍हें प्रचंड बहुमत से गुजरात के मुख्‍यमंत्री होने का जनादेश सुना दिया।

सुविदित है कि 1925 में दुनिया को लाल झंडे तले लाने के सपने के साथ शुरू हुआ भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन आज दर्जनों गुटों में बंट कर अंतिम सांसें ले रहा है। इनके विपरीत नागपुर की गलियों से 1925 में शुरू हुआ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बीबीसी के मुताबिक, विश्‍व का सबसे बडा स्‍वयंसेवी संगठन बन गया हैं।

आपने हिटलर का जिक्र किया हैं। तो हिटलर राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ का स्‍वयंसेवक नहीं था, वरन समाजवादी था जोसेफ स्‍टालिन की तरह, तभी तो हिटलर को यहूदियों के नरसंहार का विचार स्टालिन की बर्बरता से प्राप्त हुआ था। स्टालिन ने हिटलर से उस समय दोस्ती की थी जब सारी दुनिया हिटलर के खात्मे के लिए जुटी हुई थी। स्टालिन को जब लगा कि हिटलर सोवियत संघ पर कब्जा कर लेगा तो वह हिटलरविरोधी हो गया। स्‍टालिन ने करोडों लोगों को किस कदर मौत के घाट उतारा, इससे तो आप अवगत ही होंगे।

और स्‍टालिन ही क्‍यों, पोल-पोट तो और ज्यादा क्रूर था।

साम्‍यवादी नेता माओ-त्से तुंग को 20 वीं सदी का एक ऐसा निर्मम नेता माना जाता है जिसने अहम तथा सत्ता लिप्सा के चलते न केवल 7 करोड़ लोगों की हत्या करवाई बल्कि 'किसानों की क्रान्ति' के नाम पर चीन को दमन चक्र की चक्की में बुरी तरह से पीसा।

माओ के लिए मानवीय जीवन का कोई मूल्य नहीं था। 1959-61 के मध्य जो भीषण अकाल पड़ा उसे माओ निर्मित माना जाता है तथा इसमें 3.80 करोड़ लोग भूख से मरे। जब लोग भूख से मर रहे थे तब माओ कमसिन लड़कियों के साथ रंगरलियां मनाने में व्यस्त था।

इससे शायद कम्‍युनिस्‍टों को शर्म आ जाए। पर कम्‍युनिस्‍टों की तो आदत है गलतियाँ करना और भूल जाना - शर्म मगर इनको नहीं आती! कम्युनिस्ट और आदमी में यही फर्क है कि आदमी अपने कुकर्म पर शर्माता है, कम्युनिस्ट अपनी शर्मिंदगी को भी बौध्दिकता का जामा पहना जस्टीफाई करता है।

vikas pandey said...

Anilji Namaste,

Kaise hain aap? You have given a fitting reply. Hindi blogging has still to learn a great deal. One should air his views in a controlled language. It really disillusions me from Hindi-blogging.

But as they say learning come from mistakes, we will get there someday. A sigh...

GJ said...

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रावण की तुलना नमो से करना सही नहीं है

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अनूप शुक्ल said...

हम तो भी लेख और टिप्पणियों का आनंद ले रहे हैं! कोई एतराज तो नहीं न!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

देवों और दानवों की बात की जा रही है, मनुष्य कहाँ है?

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

गणतँत्र दिवस सभी भारतियोँ के लिये नई उर्जा लेकर आये ..

और दुनिया के सारे बदलावोँ से सीख लेकर हम सदा आगे बढते जायेँ ..

बदलाव के लिये व नये विचारोँ मेँ से,
सही का चुनाव करने की क्षमता भी जरुरी है ..

आलोक जी,

इतिहास सत्ता के अधिकार मेँ रहे फिर भी ,

रावण द्वारा राम की पत्नी,
सीता जी का अपहरण
किस तरह से सही हुआ ????

किसी भी इतिहास मेँ
किसी भी सता के अँतर्गत
ये गलत ही होगा --

और हीटलर का लाखोँ
निर्दोष यहूदीयोँ को भठ्ठी मेँ झोँक कर
जला देना
किस तरह से सही होगा ???


कम्युनिस्ट या बीजेपी,
वामपँथ या कोँग्रेस
या अन्य कोई भी दलवाले
कब भारत के प्रति समर्पित होकर
भारत का भविष्य उज्ज्वल करने की सोचेँगेँ???? -- यही देखने और सोचने की बात है --
- लावण्या

SHASHI SINGH said...

बहुत देर से पढ़ा... मगर बड़ा मजगर चरचा है गुरू!!!

वैसे आजकल आटा-दाल का का भाव चल रहा है?