Thursday 22 January 2009

देखो, टूट रही हैं राष्ट्रवाद की सरहदें

बराक ओबामा को अमेरिका का 44वां राष्ट्रपति बनते दुनिया के करोड़ों लोगों ने टीवी पर लाइव देखा। मैंने भी सपरिवार देखा। शायद आपने भी देखा होगा। मेरी पत्नी ने इस समारोह को देखने के बाद सहज भाव से पूछा – क्या मार्केटिंग और नेटवर्किंग के इस युग में ओबामा जैसे साधारण आदमी के रूप में पूरी दुनिया में नई आशा और उम्मीद का पैदा होना चमत्कार नहीं है? यह एक भावना है जो युद्ध और आर्थिक मंदी के संत्रास से घिरे अमेरिका के लोगों में नहीं, सारी दुनिया के लोगों में लहर मार रही है। बराक जब चुने गए थे, तभी हमारे देश में भी पूछा जाने लगा था कि अपने यहां कोई बराक ओबामा नहीं हो सकता। बहुतों के भीतर अपने देश में किसी बराक ओबामा के न होने की कचोट सालने लगी। ओबामा का कहा हुआ वाक्य – yes we can, सबकी जुबान और मानस पर चढ़ गया। इसी माहौल में कुछ मीडिया पंडितों और कॉरपोरेट हस्तियों ने राहुल गांधी से लेकर नरेंद्र मोदी में भारतीय ओबामा की शिनाख्त शुरू कर दी।

सच यही है कि सारी दुनिया के लोग अंदर ही अंदर बराक को अपना नेता मानने लगे हैं। कहने का मौका मिले तो वे कह भी सकते हैं कि अमेरिका का राष्ट्रपति हमारा राष्ट्रपति है। इसी बात पर मुझे साठ के दशक के आखिरी सालों की सुनी-सुनाई बात याद आ गई, जब देश के लाखों तो नहीं, लेकिन हज़ारों नौजवानों ने नारा दिया था – चीन के चेयरमैन हमारे चेयरमैन। लेकिन सत्तर और अस्सी का दशक आते-आते यह नारा उलाहना और हिकारत का साधन बन गया। हिंदू राष्ट्रवाद के चोंगे में सतरंगी राष्ट्र की कंबल परेड करनेवाले स्वयं-सेवक जवाब मांगने लगे – चाओ माओ कहते तो भारत में क्यों रहते हो। लेकिन वही लोग आज ओबामा को अपना नेता माननेवालों से हिकारत की इस जुबान में बात नहीं कर सकते।

उस समय के दौर के बारे में मैं अपने अनुभव से यही कहना चाहता हूं कि चीन के चेयरमैन को अपना चेयरमैन कहनेवाले अपनी मातृभूमि से बेइंतिहा प्यार करते थे। वे अपनी मातृभूमि की मुक्ति का स्वप्न देखनेवाले समर्पित नौजवान थे। इंजीनियरिंग संस्थानों से लेकर विश्वविद्यालयों के मेधावी छात्र थे। वे गीत गाते थे – हे मातृभूमि, तुम्हारी मुक्ति का दिन अब दूर नहीं है। देखो, पूर्व के समुद्र के पार लाल सूरज उग रहा है। उसकी लाल आभा में, लाल आलोक में सारा जग जगमग हो रहा है। वे गीत गाते थे – तोहार बाड़ी सोने के बाड़ी, तोहार बाड़ी रुपे के बाड़ी, हमार बाड़ी हे हो नक्सलबाड़ी। जी हां, मैं नक्सलबाड़ी के संघर्ष से उठे मुक्तिकामी योद्धाओं की बात कर रहा हूं, बलिदानी नौजवानों की बात कर रहा हूं। ये सच है कि उन्होंने भारतीय परिस्थितियों की विशिष्टता को नहीं समझा। लेकिन उनकी भावना पर शक करना, उन्हें चीन का दलाल बताना, उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाना गौ-हत्या या ब्रह्म-हत्या से भी बड़ा पाप है।

मुझे तो ऐसा ही लगता है। आप कुछ भी मानने-सोचने के लिए आज़ाद हैं। इतिहास के पहिए को वापस नहीं मोड़ा जा सकता। लेकिन आज वे हज़ारों नौजवान होते तो हज़ारों के हज़ारों भारत का ओबामा बनने की संभावना लिए होते। वैसे, दिक्कत यह है कि परछाइयों के पीछे भागने के आदी हो गए हैं। किसी बाहरी उद्धारक या अवतार की बाट जोहने में लगे रहते हैं। यह नहीं देखते कि एक साधारण-सा शिक्षक ओबामा कैसे बन जाता है। ओबामा को राष्ट्रपति बनने पर हम मुदित हैं। लेकिन यह नहीं समझते कि डेमोक्रेटिक पार्टी का तंत्र नहीं होता तो ओबामा को इतना उभार नहीं मिलता।

क्या अपने यहां कोई भी ऐसी पार्टी है जिसमें ओबामा जैसे आम आदमी को उभारनेवाला आंतरिक लोकतंत्र है? कांग्रेस की तो बात ही छोड़ दीजिए, बीजेपी में किसी नए नेता की तारीफ होते ही प्रधानमंत्री की कुर्सी के दावेदार बुजुर्ग घबरा जाते हैं। सीपीएम तक गुजरात के विकास कार्यक्रमों को समझने की कोशिश में लगे नेता को निकाल बाहर करती है। नैतिकता की अलंबरदार पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके नेता अपनी प्रिया और प्रिय पुत्र के लिए धृतराष्ट्र बन जाते हैं, मातृघात कर डालते हैं। हमारी पार्टियों में आतरिक लोकतंत्र का अभाव है तो ओबामा की तलाश में लगे हमारे कॉरपोरेट जगत में कॉरपोरेट गवर्नेंस का। कंपनियों के प्रबंधन में न तो कर्मचारियों और न ही बाहरी स्वतंत्र निदेशकों की आवाज़ सुनने की व्यवस्था है। अभी तो एक सत्यम का खुलासा हुआ है, न जाने कितनों का सत्य अभी सामने आना बाकी है। राजनीतिक पार्टियों के खातों का स्वतंत्र ऑडिट हो जाए तो लेफ्ट के अलावा सारी की सारी पार्टियां सत्यम की अम्मा निकलेंगी।

ऐसे में मेरा बस इतना कहना है कि राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र की स्थापना के बगैर भारत में कोई ओबामा नहीं उभर सकता। हमारे यहां आज भी ओबामा की कमी नहीं है। लेकिन एक सच्ची लोकतांत्रिक पार्टी के विकास के बिना ऐसे ओबामा अपनी-अपनी चौहद्दियों में चीखते-चिल्लाते, बाल नोंचते, पैर पटकते मिट जाने को अभिशप्त हैं। अच्छी बात यह है कि यह बात अब महज बात नहीं रही है। कहीं-कहीं, धीरे-धीरे एक सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है। देखो, रंग बदल रहा है आसमान का..
फोटो साभार: tsevis

4 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

राजनैतिक दलों का आंतरिक लोकतंत्र महत्वपूर्ण है। उस के बिना राजनैतिक लोकतंत्र के कोई मायने नहीं हैं। खास तौर पर साम्यवादी दलों में वह निहायत जरूरी है। उस के बिना वे दल साम्यवादी बने नहीं रह सकते।

Gyan Dutt Pandey said...

लेकिन उनकी भावना पर शक करना, उन्हें चीन का दलाल बताना, उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाना गौ-हत्या या ब्रह्म-हत्या से भी बड़ा पाप है।
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ये देशभक्त(?) क्या गौ-हत्या/बह्म-हत्या को पाप मानते हैं!
लगता है यह वैचारिक मतभेद की खाई बहुत बड़ी है!

स्वाति said...

राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र की स्थापना के बगैर भारत में कोई ओबामा नहीं उभर सकता। हमारे यहां आज भी ओबामा की कमी नहीं है।

बिल्कुल सही कहा, एकदम सटीक , हर भारतीय को इस पर मनन करना ही चाहिए

जोशिम said...

उम्मीद है रंग बदले .. मुझे तो लगता है कि आसमान इतना ऊंचा और महँगा हो गया है की पहुँचते पहुँचते सब पंछी चीटियाँ और चीनी ही देखते है..