Wednesday, 28 February, 2007

शाम पर एक कविता

शाम ढलते थके सूरज ने समेटा जाल फैला सात रंगों का
चिनारों की फुनगियों पर जो उलझकर रह गई थी सोनपंखी किरन मछली
उसे पंजे में दबाकर कुतरती है एक घायल चील दोनों पंख फैलाए।
परछाइयां सिमटीं, ओझल हुई और मिट चलीं
बचपना दुबका, खांसते बूढ़े...

खामोश खपरैलों को ढंकने लगी चादर अंधेरे की।
हर तरफ वीरानगी है गजब का सुनसान
है जो आहट बस यही कि...
गूंजता रहता फिज़ा में मातमी का पारदर्शी एक धीमा स्वर
आदमी की खाल से मढ़ते मृदंगों का।

(यह कविता मुझे कागज के एक ठोंगे पर लिखी हुई मिली थी, आधी-अधूरी। जहां कमजोरी झलके, समझिएगा कि वे लाइनें मैंने लिखी हैं। कवि का नाम पता हो तो जरूर बताइएगा)

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