Wednesday 21 February 2007

चलता रहा सिलसिला

काश ऐसा हो जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कैसे नहीं हुआ, इसकी भी बड़ी दिलचस्प कथा है। लेकिन आगे बढ़ने के पहले इस 'वो-उसने-उसका' कोई नाम रख लेते हैं, क्योंकि भ्रम से बचने के लिए जरूरी है कि वो मैं नहीं हूं। वैसे, सच ये भी है कि नाम और चेहरे में क्या रखा है। बस, इतना समझ लीजिए कि वो अस्सी के दशक का कोई भी ऐसा शख्स हो सकता है, जो देश से एकदम गंवई अंदाज में प्यार करता रहा हो, जिसमें जिंदगी में नया कुछ करने का जुनून रहा हो और जिसमें भर्तहरि की तरह जोगी बनने की तमन्ना रही हो। चलिए सुविधा के लिए उसका नाम रख लेते हैं - राजकिशोर
राजकिशोर का मन बल्लियों उछल रहा था। उसे लगा कि जिस मध्यवर्गीय गलाजत से निकलने के लिए वो शरीर और मन का हर मैल धो रहा था, अगर मल्लाह की वो लड़की उसकी संगिनी बन गई तो उसकी ये कोशिश कामयाब हो जाएगी। साथ ही रागात्मक संबंधों का उसका रीतापन भी मिट जाएगा। ऐसा हो गया तो वह वैज्ञानिक सोच को जड़वादियों के जबड़ों से निकालकर अपनी सामाजिक हकीकत की जमीन तक ले ही आएगा।
लेकिन मजे की बात ये रही कि पार्टी के राज्य प्रमुख राजकिशोर की शादी एक वकील की बेटी से करवाना चाहते थे। वो बराबर पार्टी साहित्य देने के बहाने उसे वकील साहब के घर भेज देते, जहां उसका स्वागत एकदम दामाद की तरह होता। इसी दरम्यान एक बैठक हुई, जिसके खत्म होने के बाद तराई के साथी के सार्वजनिक प्रस्ताव रख दिया कि क्या हमारा कोई साथी उस लड़की से शादी करने को तैयार है। किशोर ने अलग लेकर जाकर उनसे हां कर दी, जिस पर उन्होंने कहा कि मैंने तुम्हें लक्ष्य करके ही ये बात कही थी।
इसके बाद सब अपने-अपने इलाके में चले गए। लेकिन कुछ महीने बाद पता चला कि पार्टी के एक बुजुर्ग होचीमिन टाइप नेता ने राजकिशोर के प्रस्ताव पर वीटो लगा दिया। उनका तर्क था कि सामंती पृष्ठभूमि का ये छोकरा कब पार्टी छोड़कर चला जाए, इसका कोई भरोसा नहीं है और तब तो इस लड़की की जिंदगी बरबाद हो जाएगी।
किशोर इससे बेहद आहत हुआ। जिसे वो अपनी पुरानी पृष्ठभूमि से मुक्त होने की मजबूरी बनाना चाहता था, उसे ठुकरा दिया गया, उसकी सामाजिक प्रतिबद्धता पर सवाल उठा दिया गया। उसे ये बात भी समझ में नहीं आई कि वकील की बेटी से शादी करना कैसे क्रांतिकारी कदम हो सकता है और गरीब मल्लाह की बेटी से शादी करने का प्रस्ताव कैसे उसकी सामंती सोच का परिचायक था। खैर, इसके बाद उसने पार्टी प्रमुख के कहने के बावजूद वकील साहब के घर जाना पूरी तरह बंद कर दिया। (वक्त है ब्रेक का)

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