एक-दूजे में समाए थे पीपल और जामुन
मतीन की आवाज़ में तल्खी थी और उलाहना भी। - अब्बू, आप ही बताओ। आठ पीढ़ियां पहले हम क्या थे? एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण, जिनके भाई-बंधु अब भी कन्नौज के किसी इलाके में जहां-तहां बिखरे हुए हैं। जाने क्या हादसा हुआ होगा, जाने किस बात पर तकरार बढ़ी होगी कि हमारे पुरखों ने खून का रिश्ता तोड़ दिया होगा। कैसी बेपनाह नफरत या मजबूरी रही होगी कि घर ही नहीं, धर्म तक बांट लिया। ज़रा सोचिए, मन का तूफान थमने के बाद वो अपनों से ज़ुदा होने पर, खून के रिश्तों के टूटने पर कितना कलपे होंगे। सालोंसाल तक एक टीस उन्हें सालती रही होगी। फिर, धीरे-धीरे वो वक्त आ गया कि अगली पीढ़ियां सब भूल गईं। जो कभी अपने थे, वे पराये होते-होते एक दिन काफिर बन गए। अब्बू, भाइयों का बंटवारा एक बात होती है। लेकिन जेहन बंट जाना, मजहब बंट जाना बेइंतिहा तकलीफदेह होता है। - मतीन बेटा, खून के रिश्तों में वक्त के साथ फासलों का आना, बेगानापन आना बेहद आम बात है। फिर, सदियों पुरानी इन बातों को आज उधेड़ने से क्या फायदा? - बात इतनी पुरानी भी नहीं है अब्बू। ज़रा याद करो, दादीजान कैसे अपनी कोठी से सटे पीपल के पेड़ में छत पर जाकर जल दिया करती थीं। ...