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एक-दूजे में समाए थे पीपल और जामुन

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मतीन की आवाज़ में तल्खी थी और उलाहना भी। - अब्बू, आप ही बताओ। आठ पीढ़ियां पहले हम क्या थे? एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण, जिनके भाई-बंधु अब भी कन्नौज के किसी इलाके में जहां-तहां बिखरे हुए हैं। जाने क्या हादसा हुआ होगा, जाने किस बात पर तकरार बढ़ी होगी कि हमारे पुरखों ने खून का रिश्ता तोड़ दिया होगा। कैसी बेपनाह नफरत या मजबूरी रही होगी कि घर ही नहीं, धर्म तक बांट लिया। ज़रा सोचिए, मन का तूफान थमने के बाद वो अपनों से ज़ुदा होने पर, खून के रिश्तों के टूटने पर कितना कलपे होंगे। सालोंसाल तक एक टीस उन्हें सालती रही होगी। फिर, धीरे-धीरे वो वक्त आ गया कि अगली पीढ़ियां सब भूल गईं। जो कभी अपने थे, वे पराये होते-होते एक दिन काफिर बन गए। अब्बू, भाइयों का बंटवारा एक बात होती है। लेकिन जेहन बंट जाना, मजहब बंट जाना बेइंतिहा तकलीफदेह होता है। - मतीन बेटा, खून के रिश्तों में वक्त के साथ फासलों का आना, बेगानापन आना बेहद आम बात है। फिर, सदियों पुरानी इन बातों को आज उधेड़ने से क्या फायदा? - बात इतनी पुरानी भी नहीं है अब्बू। ज़रा याद करो, दादीजान कैसे अपनी कोठी से सटे पीपल के पेड़ में छत पर जाकर जल दिया करती थीं। ...

मतीन बन गया जतिन

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जतिन गांधी का न तो गांधी से कोई ताल्लुक है और न ही गुजरात से। वह तो कोलकाता के मशहूर सितारवादक उस्ताद अली मोहम्मद शेख का सबसे छोटा बेटा मतीन मोहम्मद शेख है। अभी कुछ ही दिनों पहले उसने अपना धर्म बदला है। फिर नाम तो बदलना ही था। ये सारा कुछ उसने किसी के कहने पर नहीं, बल्कि अपनी मर्जी से किया है। नाम जतिन रख लिया। उपनाम की समस्या थी तो उसे इंदिरा नेहरू और फिरोज खान की शादी का किस्सा याद आया तो गांधी उपनाम रखना काफी मुनासिब लगा। वैसे, इसी दौरान उसे ये चौंकानेवाली बात भी पता लगी कि इंदिरा गांधी के बाबा मोतीलाल नेहरू के पिता मुसलमान थे, जिनका असली नाम ग़ियासुद्दीन गाज़ी था और उन्होंने ब्रिटिश सेना से बचने के लिए अपना नाम गंगाधर रख लिया था। वैसे, आपको बता दें कि मतीन के लिए धर्म बदलना कोई बहुत ज्यादा सोचा-समझा फैसला नहीं था। यह एक तरह के झोंक में आकर उठाया गया अवसरवादी कदम था। हां, इतना जरूर है कि वह अपनी पहचान को लेकर लंबे अरसे से परेशान रहा करता था। वह सोचता - ये भी कोई बात हुई कि पेशा ही उसकी पहचान है। एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर। इत्ती-सी पहचान उसके लिए काफी तंग पड़ती थी। हिंदुस्तानी होने की पह...

मैं मूर्ख हूं क्योंकि मैंने ताज को...

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मैं ताज को वोट देने की मूर्खता करने का दोषी हूं। इसलिए नहीं कि ताज को दुनिया के सात अजूबों में नहीं शुमार किया जाना चाहिए, बल्कि इसलिए कि मैं नए अजूबों के नाम पर मुनाफा बटोरने वाली एक निजी संस्था के झांसे का शिकार हो गया। मैंने तो ताज को वोट देकर अपनी राष्ट्रवादी भावना का इजहार किया था। लेकिन मुझे क्या पता था कि अब राष्ट्रवाद की भावना के भी सौदागर पैदा हो गए हैं। हकीकत ये है कि दुनिया के नए सात अजूबों को चुनने का जो अभियान चल रहा है, उसका संचालक है स्विटजरलैंड का एक संगठन, न्यू ओपन वर्ल्ड कॉरपोरेशन (एनओडब्ल्यूसी) जिसका मकसद इससे लाभ कमाना है। इसके लिए मुझ जैसे कुछ मूर्ख लोग मुफ्त में वोट दे रहे हैं, लेकिन इसके लिए वोट खरीदे भी जा रहे हैं। एनओडब्ल्यूसी निजी डोनेशन जुटाता है और कप व शर्ट जैसी चीजों के साथ ही ब्रॉडकास्टिंग अधिकार भी बेचकर मुनाफा बटोरता है। इसे एक स्विस बिजनेसमैन बर्नार्ड वेबर ने प्रमोट किया है और यूनेस्को के पूर्व डायरेक्टर जनरल फेडेरिको मेयर इससे निजी हैसियत से जुड़े हैं। लेकिन यूनेस्को या किसी दूसरी विश्व संस्था से इसका कोई लेनादेना नहीं है। दूसरा आंखें खोल देनेवाला सच...

तुम देर से क्यों आने लगी, पांखी!

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कल अपने चंदू ने ऐसा मार्मिक संस्मरण लिख दिया कि दिमाग में तरंगें उठने लगीं। बारिश के मौसम में गांव के घरों में पांखी उधिराने की बात याद आ गई। लेकिन यह याद आते ही मुझे याद आ गया कि बचपन में पांखियों के आते ही बाबूजी कहा करते थे, जाओ घड़ी देख लो, ठीक आठ बजे होंगे। वाकई उस समय घड़ी में आठ ही बज रहे होते थे। तीस-चालीस साल पुरानी इस बात को मैं भूल ही चुका था कि तीन साल पहले गांव गया। बारिश का मौसम था। अचानक एक दिन उधिरा गईं पांखियां। किसी रिफ्लेक्स एक्शन की तरह मेरी आंख अपनी घड़ी पर चली गई और मैं चौंक गया कि उस समय आठ नहीं, आठ बजकर दस मिनट हो रहे थे। मेरी घड़ी एकदम सही थी, आकाशवाणी के समय से मिली हुई थी। मैं फेर में पड़ गया कि या तो पांखियों की बायोलॉजिकल क्लॉक दस मिनट स्लो हो गई है या हमारे समय की घड़ियां दस मिनट फास्ट हो गई हैं। ये बात मैं कह रहा हूं, इसलिए इसकी कोई अहमियत नहीं है। लेकिन यही बात कोई कीट या भू-वैज्ञानिक या भौतिकशास्त्री कह रहा होता तो जरूर इस पर गौर किया जाता। सालों-साल तक पांखियों या दूसरे कीट-पतंगों के व्यवहार की मॉनीटरिंग की जाती। पता लगाया जाता कि बायोलॉजिकल क्लॉक और...

निर्मोही बलमुआ को देहाती बहुरिया की पाती

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पंडोही के दूसरे नंबर के बेटे तीरथ को शहर आए सात महीने से ज्यादा बीत चुके हैं। उसे हाल ही में एक नई बिल्डिंग में कारपेंटरी का काम मिला है। इसके फौरन बाद उसने ग्रामसभा के फोन पर बात करके अपने भतीजे कृष्णा को भी शहर बुला लिया। कृष्णा कल ही तीरथ के पास पहुंचा है। वह अनाज-पिसान के अलावा साथ लाया है अपनी चाची की एक पाती। आप जानते ही हैं कि गांव की औरतें संयोग में भी गाती हैं और विरह में भी। विदाई के वक्त तो वो क्या गाते हुए रोती हैं!! तो ये पाती भी पूरी लय-ताल में है। अपने जेठ की बड़ी बेटी मुन्नी से अवधी में लिखवाई गई इस पाती में तीरथ की बहुरिया, सुखदा ने लिखा है... सब इहां कुसल मंगल बाटय, हम तोहरै कुसल मनाई थय। तुलसी माई के चौरा पै संझवा कै दिया जराई थय।। दिन सात महीना कय गुजरा, एक्कौ चिट्ठी तू न भेज्या। होइ गया तूं एइसन निर्मोही, हमहूं का तूं-तौ भूलि गया।। आउब तौ घर कय दूरि रहा, संदेश जबानिव ना भेज्या। खोज-खबर कुछ ना लेत्या, गेदन कय याद भुलाय दिह्या।। बड़कई मदरसा जाय लागि, छोटकई अब सरकय परे-परे। तोहरी माई कय पिराय हाथ, कहरैं खटिया पय पड़े-पड़े।। अबकी अगहन की दसमीं कां, नन्हकू कय गंवना लय आ...

जाता ब्राह्मणत्व, आता क्षत्रियत्व

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राजनीति कहती है कि हमारे यहां जातियां मजबूत हो रही हैं, जातीय समीकरण निर्णायक होते जा रहे हैं। लेकिन बाज़ार कहता है कि जातियों का मामला गड्डम-गड्ड होता जा रहा है, जाति की दीवारें टूट रही हैं, खासकर ब्राह्मणवाद तो विलुप्त होने की कगार पर है। ज्ञान, सामंजस्य, संतोष, सादगी और संयम ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिन्हें भारतीय संस्कृति के पवित्र संस्कारों से, ब्राह्मणत्व से जोड़कर देखा जाता रहा है। सादा जीवन, उच्च विचार इसी का पर्याय था। लेकिन आज इन मूल्यों पर चलकर जिंदगी में कोई कामयाब नहीं हो सकता। वह महज उपहास और दया का पात्र ही बन सकता है। इसकी जगह ले रहा है क्षत्रियत्व, जिसके लक्षण हैं एक्शन, कामयाबी, जीत, शोहरत और नायकत्व। आज कोई भी साधारण नहीं रहना चाहता। असाधारण बनने, सेलेब्रिटी बनने की चाहत से आज की युवा पीढ़ी लबालब भरी हुई है। गौतम बुद्ध से लेकर भर्तहरि और राहुल सांकृत्यायन तक के जमाने में लोग घर से भागकर योगी और साधू बनते थे। शंकराचार्य के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने आठ साल की उम्र में ही अपनी मां से खुद को धर्म और समाज के लिए त्याग देने की मिन्नत की थी। खुदीराम बोस ने मां से देश के ...

आत्मा जैसे होते हैं विचार

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जिस तरह आत्मा अजर-अमर होती है, उसी तरह विचार भी कभी नहीं मरते। क्यूबा के राष्ट्रपति फिडेल कास्त्रो का आत्मा के बारे में तो नहीं, लेकिन विचारों के बारे में यही मानना है। दस दिन पहले 23 जून 2007 को नौजवानों से अपने संदेश में उन्होंने ऐसा ही कुछ कहा था। उनके संदेश के कुछ अंश... विचारों के बिना जीवन का क्या मूल्य है? मारती (क्यूबा के स्वाधीनता आंदोलन के नेता और कवि) ने एक बार कहा था, मुट्ठी भर विचार पत्थरों की खदान से ज्यादा कीमती होते हैं। क्या विचार किसी इंसान के साथ जन्मते और मर जाते हैं? मानव जाति के पूरे इतिहास के दौरान विचार पैदा होते रहे हैं और जब तक मानव जाति रहेगी, तब तक वो कायम रहेंगे। लेकिन मानव जाति इस समय समाज के अल्प राजनीतिक विकास और प्रौद्योगिकी के आत्मघाती इस्तेमाल के चलते अभूतपूर्व संकट से गुज़र रही है। जिधर देखो, उधर जनसंहारक युद्ध, जलवायु परिवर्तन, भूख, प्यास और असमानता ही नज़र आती है। हम मानव जाति के सुंदर भविष्य के प्रति आशावान हैं और हमारी उम्मीदों को पूरा करने में विज्ञान हमारा मददगार होगा। हमें यकीन है कि कल की दुनिया में उस भयंकर अन्याय की कोई जगह नहीं होगी, जिसका...