Monday 2 December 2013

मुसलमानी बिंदी के बिना ज़लील होगी जलील हिंदी



जहां तक याद पड़ता है यह 1992-93 की बात है। तब मैं अमर उजाला कानपुर में दिल्ली से साल भर के लिए नौकरी करने गया था। दफ्तर में चपरासी से लेकर संपादकों तक में ब्राह्मण और उनमें भी त्रिपाठियों का बोलबाला था। वहां पानवाले चौरसिया जी हम सभी को संपादक ही कहकर बुलाते थे। पत्रकारिता के पेशे में पांव छूने का रिवाज़ भी वहीं मैने पहली बार देखा। वहीं पर किन्हीं त्रिपाठी जी ने मुझे ख़ास उर्दू शब्दों के नीचे लगाए जानेवाले नुक्ते को मुसलमानी बिंदी बताया था। शुरू से ही कंप्यूटर पर लिखने की आदत थी तो हम लोग अक्सर इस नुक्ते को फालतू की जहमत मानकर छोड़ दिया करते थे।
बाद में 1999 से 2001 तक जर्मनी के कोलोन शहर में रेडियो डॉयचे वेले में काम करने गया तो कुछ सीनियर टाइप कमीने बुढ्ढों ने सही उच्चारण का भान कराया तो नुक्ते की अहमियत समझ में आई। यह भी कि जैसा बोलना है वैसा ही लिखा जाए। जैसे वॉशिंगटन को चूंकि वॉशिंग्टन बोला जाता है, इसलिए उसे वॉशिंग्टन ही लिखा जाए। फिर 2003-05 तक एनडीटीवी इंडिया से जुड़ा तो नुक्ते के बारे में असली टोकाटाकी पंकज पचौरी की तरफ से आई। वही पंकज पचौरी जो इस समय प्रधानमंत्री कार्यालय में मीडिया सलाहकार हैं।
पंकज जी चूंकि बीबीसी से आए थे तो उनके संस्कार में नुक़्ता ऐसा घुलमिल गया था कि वे अक्सर ख और ख़ ही नहीं, फ और फ़ का अंतर भी समझाते थे। बताते थे कि फ़ूल और फूल में कितना फर्क आ जाता है। खैर उनकी बातें ज्यादा भेजे में नहीं घुसीं तो हमारी तरह बहुतों ने खुद को ज और ज़ तक सीमित रखा। वह भी इसलिए चूंकि जलील को ज़लील लिख या बोल दो तो अर्थ का कैसा अनर्थ हो जाता है। जहां जलील मतलब बुद्धिमान है, वहीं ज़लील का मतलब है किसी की फजीहत करना, अपमानित करना।
बाद में इस मुसलमानी बिंदी के पीछे की राजनीति कुछ-कुछ मसिजीवी की 2007 में लिखी एक ब्लॉग-पोस्ट से समझ में आई। लेकिन अभी हाल में रविवार को आनेवाली इंडियन एक्सप्रेस की eye मैगज़ीन में सीमा चिश्तीका एक लेख पढ़ा तो लगा कि बाप रे बाप! इस छोटे से नुक्ते के पीछे तो भयंकर राजनीति है। वह भी यह सिलसिला नया नहीं, बल्कि अंग्रेज़ों के ज़माने से भी पहले से चला आ रहा है।
इस लेख के मुताबिक देश में नुक्ते की शुरुआत 17वीं सदी में तब हुई, जब देवनागिरी का विकास हो रहा था। फारसी और अरबी भाषा की ध्वनियों को हिंदी/हिंदुस्तानी में शामिल करने की कोशिशें चल रही थीं ताकि इसका शब्द भंडार बढ़ाया जा सके। तब भी पराई भाषा के शब्दों को वैसा ही तोड़ा-मरोड़ा, ढाला जा रहा था जैसे आज अंग्रेज़ी के साइकल को हिंदी में हम साइकिल कर चुके हैं और बिस्किट को बिस्कुट बोलनेवाले बहुतायत से मिल जाएंगे। लैनटर्न तो कब की लालटेन हो चुकी है। हालांकि शुद्ध हिंदी या संस्कृत के शब्दों को लोकभाषाओं में हमेशा से तोड़ा-मरोड़ा जाता रहा है। जैसे, मेरी अनपढ़ आजी विक्षिप्त को न जाने कहां से सुनकर ताज़िंदगी बाउछिपित बोलती रहीं। संदर्भवश बता दूं कि हमारे अवध के इलाके में बड़ी महिलाओं को सलाम बोलते रहे थे और बड़े पुरुष संबंधियों को जयराम या रामराम कहने का रिवाज़ था। जय श्रीराम आने के बाद रामराम और जयराम असमय काल के गाल में समा गए।
वैसे नुक्ते के विध्वंस का असली क्रम बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में हिंदू राष्ट्रवाद के उभार के साथ शुरू हुआ। हिंदी बनाम उर्दू बनाम हिंदुस्तानी की बहस छिड़ गई। मदन मोहन मालवीय ने 1930 में अपनी पत्रिका अभ्युदय में सवाल उठाया कि, हिंदी में बिंदी क्यों?” बाद में विभाजन की गहमागहमी मची तो एक तरफ हिंदी का परचम पकडा गया तो दूसरी तरफ उर्दू का। इनके बीच में अमीर खुसरो और कबीर के ज़माने से विकसित हो रही हिदुस्तानी पिसती रही। केवल महात्मी गांधी ने हिंदुस्तानी की तरफदारी की और कहा कि शुद्ध हिंदी या उर्दू को छोड़कर हिंदुस्तानी को ही अपनाना श्रेयस्कर होगा। लेकिन नफरत की राजनीति ने गांधी को ही लील लिया तो हिंदुस्तानी की क्या बिसात!
नतीज़तन, हिंदी-उर्दू का वही पुराना झगड़ा जारी रहा। हिंदुओ की हिंदी, मुसलमानों की उर्दू। असुरक्षा पर टिकी वोट बैंक की राजनीति के तवे पर रोटियां सेकी जाती रहीं। हां, आम जीवन और फिल्मों में ऐसा कोई भेद नहीं था। वहां धड़ल्ले से हिंदुस्तानी का इस्तेमाल होता रहा। हमारे आकाओं को यह रास नहीं आया। हुआ यह कि आकाशवाणी पर 1952-57 तक फिल्मी संगीत को यह कहते हुए बैन कर दिया गया कि इससे आम जनमानष भ्रष्ट/दूषित होता है। लेकिन एक गुजराती खोजा मुसलमान अमीन सायनी ने रेडियो सिलोन से प्रसारित बिनाका गीतमाला में हिदुस्तानी भाषा का ऐसा बेहतरीन प्रयोग किया कि आकाशवाणी को अंततः उसे टक्कर देने के लिए विविध भारती की शुरुआत करनी पड़ी।
इस बीच जयप्रकाश नारायण की अगुआई में चले आंदोलन ने पूरे उत्तर भारत को आगोश में ले लिया तो हिंदी का भदेसपन हर तरफ हावी होने लना। जयघोष हुआ कि सिंहासन खाली करो, जनता आती है। लोकभाषाओं से लबरेज हिंदी लोकप्रिय राजनीति की संवाहक बन गई। लालू की हिंदी और अंग्रेज़ी सबने सुनी है। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर अंग्रेज़ी को भी बलियाटिक अंदाज़ में बोलते थे। जयप्रकाश आंदोलन के दौर में अखबारों में अपभ्रंश का बोलबाला हो गया। शुद्धता को संभ्रांतता का पर्याय मान लिया गया। ख़ानदान और ज़बरदस्ती के खानदान और जबरदस्ती बन जाने से किसी भी एतराज़ नहीं था।
यह सिलसिला जयप्रकाश के जाने और जनता सरकार के पिटने के बाद भी जारी रहा। ज्ञानी ज़ैल सिंह को अखबार बराबर जैल सिंह ही लिखते रहे। अस्सी और नब्बे के दशक में हिंदी लोकभाषाओं के करीब होती गई। लेकिन 1991 में आर्थिक उदारवाद और 1992 में बाबरी ढांचे के ध्वंस के साथ ही फिर एक शुद्धता की लहर चल निकली। हिंदू-मुस्लिम बंटवारे की सियासत ने नुक्ते को फिर ज़िंदा कर दिया। भाषा का भदेसपन शुद्धता की तरफ बढ़ने लगा।
साल 2000 से जैसे-जैसे न्यूज़ चैनलों का ज़ोर बढ़ा, बोलचाल की भाषा और उच्चारण की शुद्धता की मांग होने लगी। ज़मीन को जमीन कहने पर एतराज़ उठे। ज़मीन को भूमि बोलने पर हंगामा होने लगा। चूंकि आम बोलचाल में या तो हिंदुस्तानी/उर्दू या अंग्रेज़ी का प्रचलन ज्यादा है, इसलिए चैनलों में दृष्टिकोण की जगह नज़रिया, समाचार की जगह ख़बर और दिल के दौरे की जगह हार्ट अटैक जैसे शब्दों का इस्तेमाल बढ़ता गया। इस बीच फिल्मों के साथ-साथ हिंदी सीरियल भी हिंदुस्तानी को सहजता से अपनाते गए। युवा पीढ़ी भी सूफी व निर्गुण संगीत में ऐसी मस्त हुई कि उसे अल्ला-हो, अल्ला-हो सुनने या गाने में कोई दिक्कत नहीं आई। भारत से लेकर पाकिस्तान और अरब देशों तक यह साझा संस्कृति मुक्त भाव से बह रही है।
आखिर क्या देशी है क्या विदेशी, यह सोचने की जहमत क्यों उठाई जाए! क्यों परवाह की जाए कि क्या तत्सम है, शुद्ध है और क्या तद्भव है, अपभ्रंश है! जीवन का प्रवाह तमाम बनावटी दीवारों को ढहाता जा रहा है। भाषा भ्रष्ट नहीं, संस्कारित हो रही है। नुसरत फतेह अली खां और कैलाश खेर के गीतों ने उस संत और सूफी परंपरा को ज़िंदा कर दिया है जहां से हिदुस्तानी जुबान से अपना सफर शुरू किया था। अंत में मदन मोहन मालवीय के सवाल, हिंदी में बिंदी क्यों, का जवाब यह है कि इस बिंदी के बिना जलील हिंदी को ज़लील होना पड़ेगा। हिंदी को हिंदुस्तानी के रूप में ही बचाया और बढ़ाया जा सकता है। मोहनदास कर्मचंद गांधी की सोच तब भी प्रासंगिक थी और आज भी प्रासंगिक है।
[लेख के ऐतिहासिक तथ्य सीमा चिश्ती के लेख से लिए गए हैं। इन्हें अपने स्तर पर पुष्ट करने की फुरसत नहीं थी तो इन्हें ज्यों का त्यों पेश कर दिया गया। आप टिप्पणी में नए तथ्य जोड़ सकते हैं]

3 comments:

रामजी राय said...

रामजी राय - "बिंदी के बिना जलील हिंदी को ज़लील होना पड़ेगा।"
अच्छी टिप्पणी है अनिल। रघुराज न कहें तो चल जाएगा न!
लेकिन बात केवल बिंदी तक नहीं है, न शुद्धता का राग अलापने तक की। त्रिलोचन की जी एक बात याद रहती है हमेशा। वे कहते थे कि उर्दू जाने बगैर आप हिन्दी-उर्दू क्षेत्र के ज्ञाता नहीं हो पाएंगे। मुझे यह बात सही लगती है। संस्कृत तो किसी तरह हमारे पास आ जाती है उर्दू तो जानना ही पड़ेगा। न लिपि सही उर्दू साहित्य (केवल कविता-कहानी नहीं सम्पूर्ण वङ्ग्मय) हिन्दी मे ज्यों-का-त्यों आ जाए तो भी उर्दू-हिन्दी शब्दकोश से उसे पढ़ा जा सकता है। लेकिन परवाह किसे है - ड्योदी तो परवत भयो, आँगन भयो बिदेश... रामजी राय

अनिल रघुराज said...

रामजी भाई, कमेंट के साथ ईमेल का लिंक नहीं है। नहीं तो सीधे में आपके मेल पर लिखता। यहां पता नहीं कब आकर आप देखेंगे। यकीन मानिए 30-33 साल बाद आपकी कोई बात सुनकर लगा कि कहीं से आशीर्वाद बरस रहा है। आप लोगों ने हम जैसे तमाम लोगों को मुक्त मन से सोचने का नया तरीका सिखाया, नए तरह की देशभक्ति सिखाई, और भी बहुत कुछ... मैं इन सबके लिए आपका शुक्रिया अदा करना चाहता हूं।

Sudhanshu said...

अनिल भाई .... आप के बहुत से लेखों को पढ़ा और सिख है। हम कुछ मित्रों ने एक ब्लॉग के माध्यम से मोदीमय हो चले इस देश में एक झरोखा खोलने का प्रयास किया है। आप एक नज़र देख लेंगे और अगर आप की राय जानने को मिलेगा तो हमें अपने प्रयास की सार्थकता का आंकलन करने में थोड़ी सहुलियत होगी। http://ek-aur-inquilab.blogspot.in/2014/04/part-i.html