Sunday, 15 September, 2013

रणभेरी में राष्ट्रद्रोह की बारूद!


इसे रेवाड़ी से उठी मोदी की रणभेरी बताया जा रहा है। लेकिन बीजेपी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किए जाने के दो दिन बाद ही नरेंद्र मोदी ने जिस तरह सेना को सरकार के खिलाफ भड़काया है, वैसी बातें कोई और कहता तो उसे राष्ट्रद्रोह मान लिया जाता। यह सच है कि मोदी पूर्व सैनिकों की रैली में बोल रहे थे। इसलिए सैनिकों के पक्ष में बोलना सहज और स्वाभाविक माना जा सकता है। लेकिन उन्होंने अपने भाषण में कई जगह वो लक्ष्मण रेखा पार की है, जहां सरकार की आलोचना सत्ताद्रोह नहीं, राष्ट्रद्रोह में तब्दील हो जाती है।
अपने यहां सेना आज़ादी के छासठ साल बाद भी पूरी तरह अराजनीतिक रही है। यही वजह है कि भारत का हश्र कभी पाकिस्तान जैसा नहीं हो सकता। लेकिन मोदी ने रविवार को अपने भाषण में सेना के राजनीतिकरण की जघन्य कोशिश की है। इसके भीतर एक तानाशाह का एजेंडा छिपा हो सकता है जो प्रधानमंत्री बनने के बाद पार्टी और कार्यकर्ताओं की बदौलत नहीं, सेना की ताकत के बल पर ताकतवर होना चाहता है, राज करना चाहता है। अभी तक भारतीय सेना देश के आंतरिक मामलों में दखल करने से बचती रही है। लेकिन मोदी ने जिस तरह माओवादियों और आतंकवादियों को एक तराजू पर ला खड़ा किया है, उसमें कल को वे माओवाद प्रभावित इलाकों में सीआरपीएफ की टुकड़ियों के साथ सेना को भी उतार सकते हैं। ऐसा हुआ तो इससे देश में सेना के राजनीतिकरण की घातक शुरुआत हो जाएगी। मोदी अगर ईमानदार होते तो स्वीकार करते कि माओवाद सुशासन के अभाव का नतीजा है। आप आदिवासी इलाकों में प्रशासन को जवाबदेह बना दो, माओवाद अपने-आप खत्म हो जाएगा। लेकिन मोदी को तो माओवाद और आतंकवाद के नाम पर भावनाएं भड़कानी हैं, न कि सार्थक समाधान खोजना।
इतिहास गवाह है कि भावनाओं के आवेग में देश कभी मजबूत नहीं होता। बल्कि इसे देशवासियों को तोड़ने का ही काम किया गया है। एक तबके को दूसरों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए किया जाता है। और, यह सब होता है कि राष्ट्रवाद के नाम पर। नरेंद्र मोदी की दो खतरनाक आदतें हैं जो उनके खून में रच-बस गई हैं। एक तो लोकतंत्र की परवाह न करना। दो, बड़े से बड़ा झूठ बड़ी सफाई से बोल जाना।
मोदी भले ही मुंह से लोकतंत्र की बात करें। लेकिन उनकी हरकतें इस बात का साक्ष्य पेश करती हैं कि वे अपने सामने किसी भी कद्दावर नेता को बरदाश्त नहीं कर सकते। आज वे खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करने को बीजेपी का आंतरिक लोकतंत्र बता रहे हैं। लेकिन जिस तरह उन्होंने गुजरात में अपने बराबर के नेता संजय जोशी को फर्जी सीडी फैलवा कर किनारे लगवाया और अपने ही गृह मंत्री हरेन पंड्या की हत्या करवाई, उससे उनकी लोकतंत्र-विरोधी फितरत की पोल खुल जाती है। उन्होंने बीजेपी में राजनाथ से लेकर अरुण जेटली तक को बौना बनाकर रख दिया है। अपने ही गुरु लालकृष्ण आडवाणी को धता बता दी है। सत्ता-लोलुप शख्स इसी तरह गुरु ही नहीं, अपने तमाम सगे लोगों से द्रोह करता है। और, यह सब लोकप्रियता के नाम पर।
यह महज संयोग नहीं है कि हाल ही मिंट अखबार के एक लेख में नरेंद्र मोदी और औरंगज़ेब का अद्भुत साम्य दिखाया गया। लेख का कुछ पंक्तियां, गुजरात के इस राजकुमार को बड़े कठिन दिन देखने पड़े। उसकी उपलब्धियां काफी बड़ी थीं। उसका प्रशासनिक रिकॉर्ड अच्छा था। राज्य के प्रति उसकी भक्ति अद्वितीय थी। वहीं, भारत के सत्ता प्रतिष्ठान में ऐसा कुछ नहीं था। वह बाहर खड़ा देखता रहा। उसकी धर्मनिरपेक्षता संदिग्ध थी या उसमें थी ही नहीं। धार्मिक लोग सत्ता के इस उत्तराधिकारी को लेकर गंभीर चेतावनी देते थे कि गुजरात के इस शख्स को गद्दी के नज़दीक न आने दिया जाए। लेख की अगली पंक्तियां हैं, आप इतना पढ़कर निश्चित रूप से नरेंद्र मोदी के बारे में सोच रहे होंगे। लेकिन ऐसा नहीं है। वो शख्स था औरंगजेब जो गुजरात के दाहोद में जन्मा था।
मोदी हर कमज़ोर नब्ज को टटोलकर निशाना साध रहे हैं। सरकार ही नहीं, अवाम की भी। इस बार करीब डेढ़ करोड़ मतदाता पहली बार वोट देंगे। मोदी ने उनसे अपना नाम वोटर लिस्ट में दर्ज कराने की अपील इसलिए नहीं की कि वे चाहते हैं कि 2014 के लोकतंत्र के महायज्ञ वे भी शिरकत करें, बल्कि इसलिए यह तबका बड़ा कच्चा होता है। भावनाओं में बह जाता है। प्रचार की आंधी उसे उड़ा ले जाती है। मोदी इस भावुक जोश को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाहते हैं।
मोदी के झूठ के जखीरे को बेनकाब करने के लिए बड़ी गहन छानबीन की जरूरत है। यूपीए सरकार चाहे तो ऐसा कर सकती है। लेकिन वोट बैंक की राजनीति में लगी इस सरकार की अग्रणी पार्टी कांग्रेस खुद झूठ से सराबोर है। वो ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकती जिसमें वो भी फंस जाए। कांग्रेस में दूसरे तरह का अलोकतंत्र है। मोदी में दूसरे तरह का। इसलिए कांग्रेस न तो मोदी के अलोकतांत्रिक तौरतरीकों पर सवाल उठाती है और न ही मोदी के सफेद झूठ को बेनकाब करती है। हो सकता है कि चुनावों के अंतिम दौर में नरेंद्र मोदी यह भी कह दें कि वे 2002 के गुजरात दंगों के लिए देश से माफी मांगते हैं। लेकिन यह एक सत्तालोलुप व्यक्ति की अवसरवादिता होगी, न कि ईमानदारी। इसलिए सावधान! वंदे मातरम्!!

2 comments:

सुरिन्दर सिंह said...

Well said...

Malaya said...

माओवादी आतंक के प्रति सहानुभूति रखने वाले लेखक की कलम से मोदी के बारे में और क्या विचार प्रस्फुटित हो सकते हैं?

राजनीतिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर अच्छा भला आदमी खराब तर्क गढ़ने लगता है।

आपके अनुसार डेढ़ करोड़ युवकों को मिला वोट का अधिकार जैसे गलत हाथों में दे दिया गया हथियार हो गया है जिसका मोदी के पक्ष में दुरुपयोग हो सकता है। माओवाद के नारे के साथ कच्ची उम्र के लड़कों को हथियार थमा देने और नागरिक प्रशासन पर खूनी हमले की ट्रेनिंग देना “सुशासन के अभाव” को दूर करने की कोशिश है। वोट की ताकत से सुशासन तो लाया ही नहीं जा सकता। लोकतंत्र के प्रति आपकी आस्था इसी से परिलक्षित होती है।