Thursday 30 April 2009

नेता को नुमाइंदा नहीं, आका मानते हैं हम

एक तरफ हम राजनीति में पढ़े-लिखे काबिल लोगों के अभाव का रोना रोते हैं, दूसरी तरफ पढ़े-लिखे काबिल लोग चुनावों में खड़े हो जाते हैं तो उनकी जमानत जब्त हो जाती है। साफ-सी बात है कि ‘हम’ चुनावों में किसी की जीत-हार का फैसला करने की स्थिति में नहीं हैं। गांवों ही नहीं, शहरों में भी। एक तो किसी भी संसदीय या विधानसभा क्षेत्र में मध्य वर्ग के हम जैसे लोगों की संख्या मुठ्ठी भर होती है। ज्यादा से ज्यादा दस हजार, बीस हजार। दूसरे, हम शक्तिसंपन्नता हासिल करने के लिए नहीं, बल्कि नैतिक आग्रह के चलते राजनीति के बारे में सोचते हैं। राजनीति को गर्त से निकालने के लिए सोचते हैं।

पहले तो हम वोट तक देने नहीं जाते थे। इस बार स्थिति थोड़ी बदली है। टाटा टी जैसी कंपनियों से लेकर तमाम एनजीओ और आमिर खान जैसे अभिनेता तक हमें इस बार वोट डालने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। मैं भी इस बार पहली बार वोट डालने जा रहा हूं। अब से चंद घंटे बाद मेरी भी उंगली पर पहली बार काली स्याही का निशान लगा होगा। होता यह रहा कि गांव की वोटर लिस्ट में मेरा नाम तो है। लेकिन गांव से शहर, फिर इस शहर से उस शहर, किराए के मकान में जब भी जहां रहा, वहां का मतदाता नहीं बन पाया। इस बार भी मतदाता पहचान पत्र नहीं बना है। लेकिन स्थाई निवास हो जाने के कारण एक प्रक्रिया चल निकली और मैं मतदाता बन गया। तो, यकीनन वोट भी डालूंगा।

मुश्किल यह है कि वोट डालूं तो किसको? मुंबई उत्तर-पूर्व से शिवसेना-बीजेपी के प्रत्याशी हैं किरीट सोमैया। साफ-सुथरी छवि। इतने आम कि बोलते समय हकलाते हैं। अवाम से जुड़े मुद्दे उठाते रहते हैं। सांप्रदायिकता या क्षेत्रीयता को हवा नहीं देते। इनके मुकाबले में खड़े हैं कांग्रेस-एनसीपी के संजय पाटिल। विभाजन की राजनीति करनेवाला एक प्रत्याशी है महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का शिशिर शिंदे। लेकिन पाटिल और शिंदे दोनों के नाम काफी खोजने पर मिले हैं तो आप उनके प्रचार-प्रसार और साख का अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं। सोमैया ने दस बड़े स्थानीय किस्म के वादे किए हैं। छह लेन का ट्रेन कोरिडोर, हर तीन मिनट पर लोकल ट्रेन, लोड शेडिंग की समाप्ति, जगह-जगह फ्लाईओवर, साल्ट कमिश्नर की 1200 एकड़ जमीन पर एक लाख घरों का निमार्ण आदि-इत्यादि।

अगर स्थानीय निकाय का चुनाव होता तो मैं आंख मूंदकर सोमैया को ही वोट देता। लेकिन क्या राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी को गलत मानने के बावजूद उसके लोकसभा प्रत्याशी को वोट देना इसलिए सही होगा क्योंकि स्थानीय स्तर पर उसने अच्छे काम किए हैं? ये माया किसलिए, यह छलावा किसलिए? कोई दादी की साड़ी पहनकर छल कर रहा है, कोई दलालों की बूढ़ी पार्टी का युवा चेहरा बनकर। कोई अंग्रेजी को गाली देकर तो कोई अभिनेताओं, अभिनेत्रियों का मजमा जमाकर। अरे भाई, खुलकर क्यों नहीं सामने आते? नकाब क्यों लगाकर आते हो?

परसों ही टाइम्स ऑफ इंडिया में जाने-माने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज का एक लेख पढ़ा जिसमें उन्होंने बीजेपी के घोषणापत्र में छिपे ‘धोखा दो-राज करो की नीति’ के रहस्य की परतें खोली हैं। सोचता हूं तो पाता हूं कि कांग्रेस से लेकर बीजेपी और समाजवादियों का छल इसीलिए चल रहा है क्योंकि हम नेता को अपना नुमाइंदा नहीं, बल्कि आका मानते हैं, माई-बाप समझते हैं। हम में से हर कोई मौका पाते ही जताने लगता है कि किस एमपी या मंत्री या बड़े नेता की उसकी खास पहचान या रिश्तेदारी है। काम निकलवाने के लिए हम भी ‘आका’ के आगे खीस निपोर देते हैं। मुश्किल यही है कि नेता को आका मानने की यह मानसिकता खत्म कैसे की जाए? नहीं तो हम दलित की बेटी, प्राइमरी स्कूल की बहनजी को मुख्तार अंसारी जैसे खूंखार अपराधी को गरीबों का मसीहा बताने से कभी नहीं रोक पाएंगे। तब तक हमारे नेतागण ऐसा ही मायाजाल फैलाकर हमें फांसते रहेंगे और हित साधते रहेंगे अपराधियों, दलालों और देश व अवाम के दुश्मनों का।

7 comments:

श्यामल सुमन said...

ठीक कहा आपने। सामूहिक सोच में अक्सर यह दिखता है कि-

बने भगत सिंह पड़ोसी घर में,
छुपी ये चाहत सभी के मन में।
इसी द्वंद ने उपवन के सब,
कली सुमन को जला दिया।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Ravi Singh said...

किरीट सोमैया बहुत अच्छे व्यक्ति है और ये सर्वसुलभ भी हैं और काम करने वाले भी

JEAN DREZE को आप जाने माने अर्थशास्त्री किस आधार पर कह रहे हैं, मुझे तो ये संकुचित और पूर्वाग्रह से ग्रस्त लगे, जो अंग्रेजों के आगमन से पूर्व भारत को रो-मिल्ला थापर जैसे मायोपियाये हुये इति-हास कारों के टूटे चश्मे से देखते हैं जिनकी नज़र में अंग्रेजों के आने से पहले भारत भूख और अकालग्रस्त था!. JEAN DREZE की नज़र में तो गांधी भी गलत हैं और गांधी जी के शिक्षा के आंकड़े गलत हैं,

यदि आप किरीट सोमैय्या को वोट नही देगें तो क्या कांग्रेस-एनसीपी के संजय पाटिल या कांग्रेस-एनसीपी प्रायोजित महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का शिशिर शिंदे को वोट देंगे?

आपने अपने लेख की शुरूआत "एक तरफ हम राजनीति में पढ़े-लिखे काबिल लोगों के अभाव का रोना रोते हैं:" शब्दों से की है. क्या आपको किरीट सोमैया जैसे पढ़े-लिखे काबिल लोगों के अभाव और संजय पाटिल और शिशिर शिंदे जैसे घुटेघुटाये राजनीतिज्ञों का प्रभुत्व चाहिये?

बेहिचक किरीट सोमैया को वोट दीजिये.

अनूप शुक्ल said...

बहुत दिन बाद दिखे वोट के बहाने। वोट के अधिकार का प्रयोग करें।

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

मताधिकार का प्रयोग सभी को करना चाहिए.

अनिल कान्त : said...

हमारे शहर फिरोजाबाद में स्थानीय चुनावों में तो वहां के मेयर के पद के लिए निर्दलीय उम्मीदवार जीत जाते हैं जिन्होंने बहुत काम कराया ...हर जगह हर किसी के लिए ...किन्तु जब बात लोक्सबह जैसे चुनाव की आती है ...तब वो नहीं जीत पाते ...क्योंकि लोगों को आदत पद चुकी है अपनी जाती और अपने समाज के लोगों को vote देने की कोई किसी को अपनी party manta है तो कोई किसी को

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

यही तो इस लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी है. सबसे पहली ज़रूरत इस बात की है कि हम राजनेताओं को आका मानना छोड़ें. सिर्फ़ राजनेता ही नहीं, नौकरशाह, तीसरे-चौथे खंबे से जुड़े लोग - सभी को. लिकेन ऐसा सिर्फ़ पढ़े-लिखे लोगों के वोट देने भर से नहीं होगा. हमें-आपको बाहर निकलना होगा. जिन्हें हम अनपढ़ मानते हैं उन्हें समझाना होगा कि ऐसा मानना छोड़ दें.

Kashif Arif said...

यही तो परेशानी है हमारे देश के लोगो की, जिन लोगो को हमारे लिए काम पर रखा गया है, जिनको हमारी सेवा करने की तनख्वा मिलती है वो ही हमारे मालिक बने घूम रहें है....यह सब क्योँ होता है ?