Tuesday 15 May 2007

जिसकी जितनी संख्या भारी...

मायावती की जीत लोकतंत्र की जीत है। इस राय से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इस जीत ने हमारे लंगड़े लोकतंत्र के कुछ ऐसे पहलुओं को उजागर किया है, जिन पर गौर करना और सच्चे लोकतंत्र के लिए उन पर अमल करने का मन बनाना जरूरी है। मैंने आनुपातिक प्रतिनिधित्व की बात इसलिए भी की क्योंकि खुद बीएसपी का नारा रहा है - जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी। जाहिर है कि किसी एक राज्य की सत्ता पर कब्जा करके मायावती चाहकर भी इस नारे पर अमल नहीं कर सकतीं। लेकिन पूरे देश में अभियान चलाकर देश में ऐसा लोकतंत्र लाने की कोशिश जरूर की जा सकती है क्योंकि ये कोई हवाई अवधारणा नहीं है, बल्कि जर्मनी समेत यूरोप के कई देशों में यह व्यवस्था सालोंसाल से लागू है।
जर्मनी की चुनाव व्यवस्था* पर सरसरी नजर डालते हैं। वहां के निचले सदन बुंडेसटाग के चुनावों में मतदाता को दो वोट डालने होते हैं। एक अपने क्षेत्र के व्यक्तिगत उम्मीदवार को और एक अपनी पसंदीदा पार्टी को। इस तरह 328 चुनाव क्षेत्रों में बंटे जर्मनी में सीधे-सीधे 328 उम्मीदवार चुने जाते हैं। मतदाता के दूसरे वोट से तय होता है कि किस पार्टी के साथ कितने फीसदी लोग हैं। पार्टी को मिले मत-प्रतिशत के आधार पर तय होता है कि बुंडेसटाग में उसकी कुल कितनी सीटें होंगी। अगर सीधे चुने हुए उम्मीदवारों की संख्या पार्टी के मत-प्रतिशत से ज्यादा हुई तो सदन में सीटें बढ़ा दी जाती हैं। आमतौर पर जर्मन सदन के आधे 328 सदस्य सीधे चुने जाते हैं, जबकि इतने ही सदस्य पार्टियां खुद को मिले वोट प्रतिशत के आधार पर मनोनीत करती हैं। यहां एक बात गौर करनी जरूरी है कि जर्मनी में मतदान का प्रतिशत बहुत ज्यादा घटने पर भी 75 फीसदी से ऊपर ही रहता आया है।
हम अपने देश में चुनाव की ये सानुपातिक पद्धति अपनाने के बारे में बहस चला सकते हैं। लेकिन इसके साथ शर्त रहेगी कि पहले लोगों के बीच फैली राजनीतिक उदासीनता को तोड़ना होगा। इस सोच को खत्म करना होगा कि हर पार्टी सत्ता में आने पर एक जैसी लूट-खसोट करती है, फिर किसी को वोट देने से क्या फायदा। इसके लिए राजनीतिक पार्टियों के चाल-चरित्र और चेहरे में स्पष्ट विभाजन रेखा खींचनी होगी। दूसरे, लोगों तक इस हकीकत को पहुंचाना होगा कि राजनीति ही निजी और सामाजिक जिंदगी को बदलने का सबसे कारगर माध्यम है।
अगर अपने यहां सानुपातिक प्रतिनिधित्व की चुनाव पद्धति लागू हो गई तो सदन में पार्टियों के सही समर्थन का प्रतिनिधित्व हो सकेगा और पार्टियां उम्मीदवारों को जिताने के लिए जोड़तोड़ करने के बजाय जन-समर्थन बढ़ाने पर जोर देंगी।
* वैधानिक चेतावनी - ये जानकारी सृजन शिल्पी जैसे ज्ञानवान चिट्ठाकारों के लिए नहीं है। पिछली बार शिल्पी जी ने अपनी टिप्पणियों से मुझे इतना डरा दिया था कि मुझे ये वैधानिक चेतावनी लिखनी पड़ रही है।

1 comment:

परमजीत बाली said...

अनिल रघुराज जी, आप सही कह रहे हैं।
"पार्टियां उम्मीदवारों को जिताने के लिए जोड़तोड़ करने के बजाय जन-समर्थन बढ़ाने पर जोर देंगी।"
यह एक प्रजातंत्र देश के लिए अच्छा भी है।